मिटकर मेहंदी को
रचते सबने देखा है,
उजड़कर मोहब्बत को
रंग लाते देखा है?
चमन में बहारों का
बस वक़्त थोड़ा है,
ख़िज़ाँ ने फिर अपना
रुख़ क्यों मोड़ा है?
ज़माने के सितम से
न छूटता दामन है,
जुदाई से बड़ा
भला कोई इम्तिहान है?
मज़बूरी के दायरों में
हसरतें दिन-रात पलीं,
मचलती उम्मीदें
कब क़दम मिलाकर चलीं?
दुनिया में वफ़ा की आबरू है
साथ ख़ौफ़-ए-जफ़ा है,
ज़मीं-आसमां किसी बेआसरा से
क्यों इतना ख़फ़ा हैं?
© रवीन्द्र सिंह यादव
रचते सबने देखा है,
उजड़कर मोहब्बत को
रंग लाते देखा है?
चमन में बहारों का
बस वक़्त थोड़ा है,
ख़िज़ाँ ने फिर अपना
रुख़ क्यों मोड़ा है?
ज़माने के सितम से
न छूटता दामन है,
जुदाई से बड़ा
भला कोई इम्तिहान है?
मज़बूरी के दायरों में
हसरतें दिन-रात पलीं,
मचलती उम्मीदें
कब क़दम मिलाकर चलीं?
दुनिया में वफ़ा की आबरू है
साथ ख़ौफ़-ए-जफ़ा है,
ज़मीं-आसमां किसी बेआसरा से
क्यों इतना ख़फ़ा हैं?
© रवीन्द्र सिंह यादव





