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रविवार, 6 अगस्त 2017

मित्रता -दिवस


दोस्त ! 
आपकी ज़िन्दगी 
ख़ुशियों  से 
रहे गुलज़ार 
राहें रौशन हों  सदा 
घर-आँगन रहे बहार। 


मनहर पयाम 
लाती  रहे  पवन 
बग़िया में 
क़ाएम  रहे 
फूल और 
माली-सी लगन
सुदूर तक 
ग़मों का 
साया न हो 
साँसें हैं अपनी 
तब तक 
जुड़ें रहें तार-बेतार । 



पिछला ज़माना 
याद है हमको 
जब उलझे थे 
तूफ़ानों में 
लाये थे हम 
खे कर कश्ती 
है कशिश कितनी 
अपने अफ़्सानों में  
आते हैं याद 
पल वो बार-बार। 


दोस्ती के लिए 
बाज़ारवाद ने 
मुक़र्रर  किया 
एक दिन 
हम करते हैं 
इक़रार 
बाबरा मन 
करता है याद 
सुबह-शाम 
हर घड़ी-पलछिन 
आबाद रहें 
रिश्तों के आशियाँ 
बहती रहे 
भावों की 
कल-कल धार। 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

ख़त


ख़त  मिला
आपके  रुख़्सत  होने के बाद,
काँधा  गया
सर  रखूँ  कहाँ  रोने  के  बाद।


ख़्वाब पहलू से
उठकर चल दिये,
जागती रहेंगी
तमन्नाएँ रातभर सोने के बाद।


नयन के पर्दे से
बाहर आएगी  ख़ामोशी,
पिघलेंगे जज़्बात
अश्क़ों से रुख़सार धोने के बाद।


वीरान राहें
चुपचाप सो गयीं हैं ,
हवाऐं उड़ा ले गयीं वो बीज
ख़ुश थे हम जिन्हें बोने के बाद।


आपकी तस्वीर
बादल में बन रही है ,
तड़प बिजली-सी
बढ़ती जाएगी हमसफ़र खोने के बाद।

@रवीन्द्र सिंह यादव


सूचना - यह रचना "मेरे शब्द -स्वर" (You Tube.com )  चैनल पर सस्वर उपलब्ध है।  


शब्दार्थ / Word Meanings 

ख़त = पत्र ,चिट्ठी ,Letter 

रुख़्सत  =बिछड़ना,चले जाना ,To Leave 

कांधा =कंधा, Shoulder 

सर =मस्तक, Head 

ख़्वाब =स्वप्न,सपना, Dream(s)  

पहलू =पार्श्व ,बग़ल ,Side ,Aspect 

तमन्नाऐं = इच्छाएं ,अरमान ,Desires 

नयन =आँख ,चक्षु ,नेत्र ,Eye 

पर्दे /पर्दा =चिलमन ,आड़,Curtain(s) 

ख़ामोशी =नीरवता,सन्नाटा, Silence 

जज़्बात = भाव ,मनोभाव, Feelings ,Emotions 

अश्क़ों /अश्क़ =आँसुओं /आँसू ,Tear(s)

रुख़सार =गाल ,Cheek(s)  

वीरान =सुनसान ,Deserted ,Lonely 

हमसफ़र = हमराही ,साथी ,Companion, A Fellow Traveller 

बुधवार, 12 जुलाई 2017

ख़ालीपन से दूर .....


     उठो चलो

     जी चुके बहुत

     सहारों में,

     ढूँढ़ो  न आसरा

     धूर्तों-मक्कारों में ।


      सुख के पलछिन

      देर-सवेर

      आते तो हैं,

      पर ठहरते नहीं

      कभी  बहारों में ।


 मतवाली हवाओं

     का आना-जाना

     ब-दस्तूर जारी है,

     ग़ौर  से देखो

     छाई है धुँध  

     दिलकश नज़ारों में।


     फ़ज़ाओं की

    बे-सबब  बे-रुख़ी से

     ऊब गया है मन,

     फुसफुसाए जज़्बात

     दिल की

     दीवारों में।


     रोने से

     अब  तक  भला 

     किसे क्या मिला?

     मिलता है

     जीभर सुकून 

     वक़्त के मारों में।


     हवाएँ  ख़िलाफ़

     चलती हैं

     तो चलने दे,

     जुनून लफ़्ज़ों से

     खेलने का

     पैदा कर 

क़लमकारों  में।


    मझधार की

    उछलती  लहरें

    बुला रही हैं,

    कब  तक

    सिमटे  हुए 

    बैठे रहोगे  

बस किनारों में ।


     परिंदे भी

    चहकते ख़्वाब

    सजाते रहते हैं,

    उड़ते हैं

    कभी तन्हा

    कभी क़तारों में।

    © रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 25 मई 2017

नज़दीकियाँ



ज़रा-ज़रा  सी   बात   पर

रूठना, मचलना  भा गया ,

देखने   चकोर   चाँद   को

नदी   के  तीर  आ  गया। ........ (1)


गुफ़्तुगू    न   सुन    सके

कोई  मिलन  न  देख  ले,

दो    दिलों  के  आसपास

बन  के  शामियाना  कोहरा  छा  गया।

देखने  चकोर  चाँद  को

नदी  के  तीर  आ  गया। ........ (2)


ये     घड़ी     रुकी     रहे

रात    जाए   अब   ठहर,

दीवानगी  का ये  ख़याल

बेताबियों  को  भा  गया।

देखने   चकोर  चाँद  को

नदी  के  तीर   आ  गया। ......... (3)


ज़िन्दगी     की      राहों     में

फूल      हैं     तो     ख़ार    भी  ,

पयाम    एक   फ़ज़ाओं    का  

मरहम ज़ख़्म  पर लगा गया।

देखने      चकोर     चाँद    को

नदी     के    तीर   आ     गया। ........ (4)


तमन्नाऐं    बन  के    रौशनी

जगमगाती  हैं    डगर -डगर ,

बेख़ुदी     के        दौर       में

भूली  राह  कोई  दिखा गया।

देखने   चकोर      चाँद    को

नदी  के    तीर   आ     गया। ........ (5)

@रवीन्द्र सिंह यादव

इस रचना को सस्वर सुनने के लिए लिंक -
https://youtu.be/s0aRSv3IenI

शब्दार्थ / WORD  MEANINGS -

ज़रा = थोड़ी ,थोड़ा ,A  Bit 

चकोर = तीतर की भांति दिखने वाला पक्षी जो साहित्य में चन्द्रमा के प्रेमी के रूप में वर्णित है ,Alectoris          chukar 

तीर = किनारा ,बाण , River Bank 

गुफ़्तुगू =बातचीत ,Speech ,Conversation 

शामियाना = मंडप ,वितान ,छत्र , Canopy  ,Awning 

कोहरा = कुहासा ,Fog,Mist 

घड़ी = पल , moment 

दीवानगी = पागलपन , होश-ओ हवास  खोना -Madness  ,Insanity

ख़याल = विचार ,Thought ,Idea 

बेताबियाँ = बेसब्री,बेचैनी  ,Restlessness 

ख़ार = काँटा  , A Thorn 

पयाम = संदेश , Message 

फ़ज़ाओं =  वातावरण ,Weather, Atmosphere 

तमन्नाऐं = इच्छाएँ ,Desires 

डगर = रास्ता ,Path ,Road 

बे-ख़ुदी = स्वयं को भूल जाना ,Intoxication 


मंगलवार, 16 मई 2017

इंतज़ार



पतंगे   आएंगे  जलने  सीने में

जिनके सुलगती आग है बाक़ी , 

सुनो     संगीत     जीवन    का 

मनोहर  राग  है  बाक़ी।   (1)




भेजा है ख़त  बहार  ने  लिख 

आ          रही         हूँ        मैं,

जहाँ   पहुँची  नहीं    दुनिया  

अभी  एक  बाग़   है    बाक़ी।  

सुनो   संगीत   जीवन    का 

         मनोहर    राग    है     बाक़ी।   (2) 




कभी    मिलते   नहीं   साहिल 

सिमट    जाती     हैं     दूरियाँ,

सूखी       एक      नदिया       है 

    समुंदर  सा  अनुराग  है  बाक़ी।    

सुनो    संगीत    जीवन      का 

   मनोहर    राग    है   बाक़ी।   (3) 




चुरा   लाओ   कहीं  से   तुम

छलकती   आँख   का  पानी,  

धो  सकूँ    दामन  पर  लगा

 एक  गहरा  दाग़  है   बाकी।  

सुनो   संगीत   जीवन    का 

           मनोहर    राग    है   बाक़ी।  (4 )  




सैयाद  की  मर्ज़ी से मायूसियों में 

घिर      जाना     बेहतर       नहीं ,

पहुँचो मक़ाम   तक   महफूज़  है 

रहनुमा   जो   बेदाग़    है    बाक़ी। 

सुनो      संगीत      जीवन     का 

     मनोहर    राग    है     बाक़ी ।    (5)  




अंधेरों  में सन्नाटों  का  निज़ाम 

डराए      जब     कभी     तुमको 

देख  लेना   आँधियों     में     भी  

जल  रहा  एक  चराग़  है  बाक़ी।

सुनो      संगीत     जीवन     का 

    मनोहर   राग    है    बाक़ी।     (6)  

    

बदलेगा   वक़्त  सुहानी  भोर   का  

              सुरमई       संगीत       लेकर,                 

निकलेगा  चाँद    फिर   अरमानों   का 

सहरा में  चमन  का  सुराग  है  बाक़ी। 

सुनो         संगीत         जीवन     का 

 मनोहर   राग     है     बाक़ी।    (7)  

@रवीन्द्र  सिंह यादव



रविवार, 7 मई 2017

सत्ता


जनतंत्र में अब 
कोई राजा नहीं
कोई मसीहा नहीं
कोई महाराजा नहीं
बताने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।  

तेरे दरबार में इंसान 
कुचला पड़ा है,
तेरे रहम-ओ-करम पर
क़ानून बे-बस खड़ा है,
तेरे विराट वैभव की
चमचमाती चौखट की चूलें
हिलाने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं ।  

संवेदना को रौंदकर
बस शोर के ज़ोर को  
आगे बढ़ाती जा रही है तू,
भीड़ को उन्माद का रस  
क्यों पिलाती जा रही है तू,
तेरी औक़ात-ओ -शान को     
दर्पण दिखाने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।   

देखे हैं अब तक मैंने 
तेरे यार-दोस्त सभी,
इनमें होते नहीं शामिल
दुखियारा-दुखियारी कभी,
पूरी जाँघ कट जाने पर 
कमर से लकड़ी बाँधकर
हल जोतते किसान की पीड़ा
सुनाने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।    


मेरा हक़ मारकर 
छकों को दे रही है तू
नाव-पतवार हमारी 
बैठाकर किसे खे रही है तू...?
भूख से व्याकुल औलाद की 
तड़प न सह पाने पर 
एक विवश माँ के आग में 
जल जाने की जलन-तपन
महसूस कराने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।   

बेकारी के दौर में  
दर-दर भटकते
मायूस हैं युवामन,
नैराश्य के ख़ंजर ने 
घायल कर दिए यौवन,
अभावों में मचलते 
स्वभावों का गणित
पढ़ाने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।  

दरिंदों की हवस ने
जीवन तबाह कर डाले हैं कई,
स्त्री-जीवन में क्यों 
रोज़ चुभते हैं भाले कई,
रोज़ मर-मरकर जीने की  
टीस और दर्द का एहसास
सुनाने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।  

राज करने का लायसेंस  
तेरा क़ाएम रहे तो...       
लड़ाती-भिड़ाती है हमें 
आपस में बैर रखने को, 
कहती है होकर ज़ालिम तू
मज़लूम पर पैर रखने को,
अरे! तेरी मर चुकी ग़ैरत 
ज़िंदा कराने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।  

तेरे आत्ममुग्धी फ़ैसलों से 
जनता तकलीफ़ में पड़ती जा रही है,
किसी का घर भर दिया तूने
ग़रीबों से रोज़ी बिछड़ती जा रही है,
तेरी बदमाशियों का कच्चा-चिट्ठा
लटकाने ललाट पर तेरे आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।   


झौंक दिया सारा जीवन 
औरों के सुख की चाह में,
 देश का निर्माण करने 
गढ़ गया हूँ थाह में,
श्रेय लेने की बे-हयाई तुझे मुबारक   
स्वराज के मर्म का परचम
लहराने आ रहा हूँ मैं।
सुख-चैन से  सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।   
© रवीन्द्र सिंह यादव


शब्दार्थ / Word  Meaning 
जनतंत्र   = लोकतंत्र, जनतंत्र / Democracy
 मसीहा  = दुःख - दर्द हरने वाला / Healer
रहम-ओ -करम = मेहरबानी /Grace & favour, MERCY & KINDNESS
बे-बस = शक्तिहीन / Powerless
वैभव=शान-शौकत, भव्यता / Wealth , Grandeur
चौखट = किवाड़ों की चौखट /  Door frame
चूलें = जोड़, Dovetail, Joints
उन्माद = ज़ुनून, सनक, पागलपन / Hysteria, Madness, Mania
औक़ात-ओ -शान = क्षमता और गर्व  / Status /Capacity &Pride
जाँघ  = जंघा / Thigh
छकों = छके हुए, मन भरकर खाए-पीए हुए,तृप्त ,संतृप्त // Fulfillment, Saturated, wealthy persons
ख़ंजर= कटार /  DAGGER
खे = नाव खेने (Moving Boat ) की क्रिया
अभाव = कमी , अनुपलब्धता,Scarcity ,Unavailability
ज़ालिम = दुष्ट ,cruel
मज़लूम = घायल /पीड़ित , Injure ,Oppressed
आत्ममुग्धी = ख़ुद को प्रसन्न करने वाले ,Self pleasant
महरूम = वंचित /Deprived, Prohibited
ललाट = माथा / Forehead
थाह =गहराई ,Depth
बे-हयाई   = बेशर्मी   ,निर्लज्जता ,धृष्टता , Being Shameless
परचम =ध्वज ,झंडा ,Flag

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

आयी राम की अवध में होली



आयी   राम    की

अवध   में    होली ,

छायी  कान्हा  की

बृज    में   रंगोली।



पक   गयी  सरसों

बौराये    हैं   आम,

मनचलों  को  अब

सूझी   है  ठिठोली।

छायी   कान्हा  की


बृज    में   रंगोली।



भाये       मन      को

रंग    अबीर   गुलाल ,

मस्ताने    बसंत    में

कूक  कोयल   बोली।

छायी    कान्हा    की

बृज      में     रंगोली।





मिट     गये    मलाल

मलने     से   गुलाल,                                                                                                                                         
भरी मायूस मन  की

ख़ुशियों   ने   झोली।

छायी    कान्हा   की

बृज     में     रंगोली।













खेलो     होली    बन


राधा     नन्द - लाल ,


पिचकारी    ने    बंद


राह    अब     खोली।


छायी     कान्हा   की


बृज      में      रंगोली।




@रवीन्द्र  सिंह यादव


इस रचना  का यू-ट्यूब पर  (चैनल - MERE SHABD--SWAR) लिंक -https://youtu.be/ufs7srNvtAU

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

ये कहाँ से आ गयी बहार है




ये    कहाँ    से

आ  गयी   बहार   है  ,

बंद     तो

मेरी   गली   का  द्वार  है। ....(1)



ख़्वाहिशें   टकरा   के

चूर   हो    गयीं,

हसरतों   का   दर्द

अभी   उधार   है।

बंद     तो

मेरी  गली   का  द्वार  है।....(2)




नफ़रतों    के    तीर

छलनी  कर   गए    जिगर  ,

वक़्त     लाएगा     मरहम

जिसका      इंतज़ार      है।

बंद    तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।.....(3)




बदल    गए      हैं

इश्क़   के  अंदाज़  अब,

उल्फ़तों    का

सज   गया   बाज़ार   है।

बंद     तो

मेरी   गली   का   द्वार  है।....(4)




अरमान  बिखर  जाएँ  तो

संभाल     लेना         दिल,

छीनता       है           एक

वो      देता      हज़ार    है।  

बंद    तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।.....(5)



टूटते       हैं      रोज़-रोज़

तारे        आसमान      में ,

"रवीन्द्र "        को       तो

ज़िन्दगी    से    प्यार   है।

बंद     तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।...(6)



   @रवीन्द्र  सिंह  यादव

इस  रचना  का  यू  ट्यूब   विडियो  लिंक-  https://youtu.be/6n-Og0O8cTE

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

धीरे - धीरे ज़ख़्म सारे



धीरे -  धीरे     ज़ख़्म       सारे

अब      भरने    को   आ   गए ,

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।



ज़िन्दगी     को     जब     ज़रूरत

उजियारे     दिन   की   आ    पड़ी,

लपलपायीं                 बिजलियाँ

गरजकर  काले  बादल  छा  गए। 

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल  है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




बाँसुरी      की    धुन    पे  थिरका

बृज   के    साथ    सारा   ज़माना,

श्याम   जब    राधा   से   मिलने

यमुना    तट   पर     आ      गए।

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




आज     फिर   आँगन     में    मेरे

नन्हीं      कलियाँ      खिल     रहीं,

गीत     फिर     इनको     सुनाओ

जो     दादी    नाना     गा      गए।

एक   बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




क्या      मनाएं      जश्न       हम

ज़िन्दगी       की     जीत       का,

बाँटने     को    थीं    जो      चीज़ें

हम     उन्हीं     को     खा     गए।

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा     गए।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

इस रचना  को सस्वर  सुनने के लिए  लिंक - https://youtu.be/QdAzRuiZa8

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

दोपहर बनकर अक्सर न आया करो

दोपहर   बनकर

अक्सर  न   आया   करो,

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो।




चिलचिलाती   धूप    में

तपना   है दूर  तक,

कभी  शीतल  चाँदनी

में  भी  नहाया  करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो।



सुबकता है  दिल

यादों  के  लम्बे  सफ़र  में,

कभी  ढलते  आँसू

रोकने  आ  जाया  करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो।




बदलती   है   पल-पल

चंचल   ज़िन्दगानी,

हमें  भी  दुःख-सुख  में

अपने  बुलाया  करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो।



दरिया    का   पानी

हो  जाय   न   मटमैला,

झाड़न   दुखों   की धारा  में

यों   न    बहाया    करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो।
#रवीन्द्र  सिंह  यादव 

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

फूल से नाराज़ होकर तितली सो गयी है



फूल   से  नाराज़   होकर

तितली    सो      गयी     है,

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(1 )




हो   चला   सयाना    फूल  

ज़माने   के    साथ-साथ ,

मुरझाई    हैं    पाँखें  

महक   भी    रो    गयी  है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(2  )





नसीहत  अब  कोई

हलक़   से  नीचे  जाती   नहीं,

दिल्लगी   की   प्यारी  खनक

अब   हमसे   खो  गयी   है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(3  )





आशियाँ    दिलक़श   बने

जो    तेरी   शोख़ियाँ  हों,

ताज़ा  हवा  आँगन  में

बीज-ए -ख़ुलूस  बो  गयी  है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(4 )





यादों   के   आग़ोश   में

बैठा   हुआ  है  बोझिल  दिल,

एक   मुलाक़ात  मैल  मन  का

मनभर   धो     गयी    है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(5 )


 @रवीन्द्र  सिंह  यादव






शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

आजकल



राहत     की    बात  

 हवा       हुई,

     मुश्किल    एक    से        

सवा      हुई।



कमाई   नौ   दो  ग्यारह      

हो    चली,

हथेली    तप-तप    कर     

तवा        हुई। 

मुश्किल     एक      से        

सवा      हुई।



भूख        से        

अब            हुए,

गेंहूँ      की      मिगी     

मैदा  -  रवा      हुई । 

    मुश्किल    एक    से        

सवा      हुई।





चार      बाटी    दबाईं   

अलसाई  आँच   में,

अंगीठी    भड़ककर        

अवा         हुई। 

   मुश्किल    एक     से        

सवा      हुई।



आये  हैं अमीर-फ़क़ीर     

हालात     बदलने,

ख़ुशी    केवल    इनकी     

हमनवा      हुई। 

   मुश्किल     एक     से        

सवा      हुई।



लाख   टके   की  बात  

दो  टके  की  न  करो,

ज़हर    की     गोली     

कब     दवा      हुई?  

   मुश्किल   एक     से        

सवा      हुई।


 @ रवीन्द्र  सिंह  यादव

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...