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शनिवार, 26 नवंबर 2022

फ़ासला

नवोदित पीढ़ी 

कुछ दशकों बाद 

पहचान लेगी

उसके दिल में 

नफ़रत और हिंसा के बीज 

किसने रोपे थे 

उसके भविष्य के लिए 

देश-विदेश में 

काँटे किसने बोए थे

तब तक

हमारे हृदय की तरह  

गंगा के तट 

और सिकुड़ चुके होंगे...

और प्रौढ़ पीढ़ी के लोग  

शर्म से निरुत्तर 

नज़रें झुकाए खड़े होंगे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 


मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

रंजिशों के साथ

सपनों की 

भव्य अट्टालिकाओं को 

ढह जाना होता है

नयनों में उमड़े 

दर्दीले आँसुओं को 

बस बह जाना होता है

उपवन के सौंदर्य में लवलीन

रसिक मन को 

काँटों का चुभना 

सह जाना होता है

चन्द्रिका बिखर जाती है 

अँधेरी राहों को 

रौशन करने 

तब 

जुगनुओं के दिल को 

रंजिशों के साथ 

कृष्णपक्ष तक 

चुप रह जाना होता है।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

    

बुधवार, 13 नवंबर 2019

एहसासात का बे-क़ाबू तूफ़ान







दिल में आजकल 

एहसासात का  

बे-क़ाबू तूफ़ान 

आ पसरा है, 

शायद उसे ख़बर है 

कि आजकल 

वहाँ आपका बसेरा है।



ज़िंदगी में 

यदाकदा 

ऐसे भी मक़ाम आते हैं, 

कोई अपने ही घर में 

अंजान बनकर 

सितम का नाम पाते हैं।



कोई किसी को 

भूलता कहाँ है 

दर्द, गिला, ख़ता

यादों का सिलसिला

 हिज्र में नूर-ए-सहर है,

ज़िंदगी का यक़ीन 

मोहब्बत से ही तो हसीं है 

ज़माना कहता रहा 

कल से आज तक 

इक़रार का एतिबार 

पहर-दर-पहर है।  


ग़ुरूर तो पालो ज़रूर 

वक़्त गुज़रता है 

संग-ए-याद पर 

लिखती जाती है 

मख़मली उल्फ़त की कहानी,

चमन में उम्मीदों के ग़ुंचे

खिलते हैं बहार के इंतज़ार में 

फ़ासले बढ़ जाते हैं 

फ़साना-ए-दिल में ज़िक्र के लिए  

बचती है कसक की निशानी। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 


गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

इश्क़ की दुनिया में ....


इश्क़ की दुनिया में

ढलते-ढलते रुक जाती है रात

हुक़ूमत दिल पर करते हैं जज़्बात

ज़ुल्फ़ के साये में होती  है शाम

साहब-ए-यार  के  कूचे से गुज़रे  तो हुए बदनाम

साथ निभाने का पयाम

वफ़ा का हसीं पैग़ाम

आँख हो जाती है जुबां हाल-ए-दिल सुनाने को

क़ुर्बान होती है शमा जलकर रौशनी फैलाने को

चराग़ जलते हैं आंधी में 

आग लग जाती है पानी में

आये महबूब तो आती है बहार

उसकी महक से महकते हैं घर-बार

सितारे उतर आते हैं ज़मीं पर

होते हैं ज़ुल्म-ओ-सितम सर-आँखों पर   

गुमां-ए-फंतासी में डूबा दिल

कहता है बहककर -

थम जा ऐ वक़्त !

बहुत प्यासा है दिल मोहब्बत का

अफ़सोस ! निष्ठुर है वक़्त

मारकर ठोकर इस याचना को

आगे बढ़ता रहता है

हमेशा की तरह..... 

#रवीन्द्र  सिंह यादव

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