करोना-काल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
करोना-काल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 16 मई 2021

एम्बुलेंस

शहर में बद-हवासी का आलम 

अस्पतालों-घरों में मातम ही मातम  

सड़कों पर दौड़तीं एम्बुलेंस

ऑक्सीजन लिए 

साँसों को जूझते करोना मरीज़ लिए   

घर से अस्पताल 

अस्पताल-दर-अस्पताल 

प्रतीक्षा करतीं कतार में 

साँसें थमीं तो दौड़ीं शमशान 

पूरी रफ़्तार में 

फिर प्रतीक्षा लंबी कतार में 

दौलत के भूखों का 

कुरूप चेहरा देखा 

इस लघु सफ़र में 

मानवीय संवेदना के किरदार भी 

लिख रहे हैं क्रूर काल के कपाल पर 

ख़ुद को दाँव पर रख 

साँसों की सच्ची कहानी! 

© रवीन्द्र सिंह यादव


मंगलवार, 19 मई 2020

प्रवासी श्रमजीवी


घर-गांव से 

हज़ारों किलोमीटर दूर

अपनों से बहुत दूर 

तुम चले जाते हो 

फूस-माटी की झोंपड़ी छोड़कर

माँ-बाप,भाई-बहन,भार्या,बच्चों को छोड़कर  
  
जीविका की तलाश में

मीडिया ने नाम दिया है 

प्रवासी मज़दूर तुम्हें हुलास में  

क्रूर करोना को ज्ञात नहीं

हालात के तूफ़ान से 

सतत लड़ने की 

तुम्हारी जद्दोजेहद की ज़िद

तुम लिख रहे हो क्रान्ति-गीत

 जीवन संघर्ष की पावन प्रीत 

लहूलुहान होकर सड़कों पर 

ऐसा कहने लगे हैं वादविद  

देख रहा है भारत 

आज तुम्हारी अंत्येष्टि की दुर्दशा 

सड़ी-गली तुम्हारी लाश की वीभत्स दशा 

अंतिम संस्कार की बदलती मनोदशा

सामाजिक विसंगतियों की दशा-दिशा 

तुम्हारे ख़ून के धब्बों से 

धुँधली हो गई है कहकशाँ!

ये निरपराध थे / हैं  

मैं लिख रहा हूँ सुनो आसमाँ! 

©रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 7 मई 2020

संदेह और विश्वास की गलियों में

बहुत बिछाते हो 

जाल और फंदे 

कैसे हो 

उजड्ड-विवेकवान बंदे?

गिलहरी को 

अब नहीं रहा 

पार्क में 

तुम्हारी मूँगफलियों का इंतज़ार 

वह तो गूलर कुतर रही है

ईर्ष्या, छलावा, हड़बड़ाहट 

बुद्धि में उन्माद की मिलावट 

तुम्हारा ही लिबास कुतर रही है

करोना-काल की कल्पनातीत आँखमिचौनी

संदेह और विश्वास की गलियों में 

प्रतिकूलता से जूझते हुए 

अनगढ़, अनघ, अनन्यचेता की तलाश में 

शहतीर के ढेर-सी

जमावट मुर्दों की

हाहाकार के महासागर में 

नख-शिख डुबोती भौतिकता 

मार्ग की बाधा है क्या?
  
© रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दार्थ 

अनगढ़= जो प्राकृतिक रूप में हो जिसे तराशा, छीला, गढ़ा न गया हो,बे-डौल, अक्खड़  

अनघ = पवित्र, निरापद,निरपराध 


अनन्यचेता = जिसका चित एक में ही लगा हो      

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

कसाईघर

कसाईघर / कसाई-ख़ाने से 

करोना-काल में 

निरीह पशुओं की 

बेबस चीख़ 

अब शांत शून्य में 

नहीं गूँजती होगी

नाली की ग़ाएब लाली 

अर्थ ढूँढ़ती होगी  

मांसाहार के लिए 

दुकानों में सजाकर रखे

पशु-पक्षी / जानवर 

कुछ दिन और सुरक्षित हैं

मनुष्य द्वारा 

लायसेंसशुदा 

मौत का फंदा 

कसने की क्रिया-प्रक्रिया  

अभी अक्रिय है 

हाँ,लॉक डाउन में

कुछ पराधीन परवश जीव 

भूख / बीमारी से

दुनिया छोड़ गए होंगे।  

© रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

युद्ध


अतीत में युद्ध हुए हैं 


महत्त्वाकाँक्षा मुनाफ़ा का

 

मातमी मुकुट धरकर 


या अपमान और कुंठाओं से त्रस्त 


मानवीय प्रकृति की 


बिडंबनाओं में उलझकर 


करोना-काल में स्थगित है


युद्ध-सामग्री क्रय-विक्रय 


संयुक्त युद्धाभ्यास 


परमाणु बम परीक्षण


अवैध हथियारों की खेप


मौन है विप्लवी लय


मानवता को आहत करने 


कैसे रचें महाभीषण   

  

युद्धक-षड्यंत्र


गोपनीय मंत्रणाओं को 


कैसे आयोजित करे 


हलकान शासन-तंत्र 


अलसाई सरहदों पर 


सन्नाटा और शांति


शिद्दत से महसूसकर


प्रबुद्ध मानवता लेती है  


पुरसुकून की सांस


बेज़मीरी इंसान की 


बन गयी है तारीख़ी फांस। 


 ©रवीन्द्र सिंह यादव  


मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

अवसान की अवधारणाएँ

जटिलताएँ जीवन कीं  

सापेक्ष आलोकित हैं 

अस्तित्त्व-वेदना का 
  
पराभवपरायण होना 

अनंत और विस्तृत है

अखिल व्योम में व्याप्त हैं 

अवसान की अवधारणाएँ 

मधु-मालती तो खिल उठी 

दुर्भावनाएँ आशंकाएँ परे रख 

बेरी पर बचा है बस एक बेर

बीतते बूढ़े बसंत का  

डाली झुका स्वाद चख। 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव   

काल-चक्र

पराजयबोध लिए 

बैठा है मानव 

करोना-काल के 

दुष्कर दुर्दिन में 

भोर-बेला में 

शांत है नदी तट 

दोपहर में 

सन्नाटे को 

गले लगाए है 

वयोवृद्ध विशाल वट

विरह वेदना में 

विचलित है 

सिंदूरी संध्या 

झील में डूबता 

रक्ताभ सूरज 

तलाश रहा है 

विस्फारित नेत्रों से 

प्रकृति का 

कुशल चितेरा 

उदासियों का 

गठा गट्ठर लादे 

बीतेगी अपनी गति से 

अतल अवसाद की 

स्याह ओढ़नी ओढ़े 

झुँझलाई यामिनी

काल का कलन करता 

अभिमान को रौंदता

आएगा एक और सबेरा।

© रवीन्द्र सिंह यादव  

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...