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रविवार, 16 दिसंबर 2018

ख़ुशी और ग़म


ख़ुशी आयी

ख़ुशी चली गयी 

ख़ुशी आख़िर 

ठहरती क्यों नहीं ?

आँख की चमक 

मनमोहक हुई 

कुछ देर के लिये 

फिर वही 

रूखा रुआँसापन

ग़म आता है 

जगह बनाता है 

ठहर जाता है 

बेशर्मी से

ज़िन्दगी को 

बोझिल बनाने 

भारी क़दमों से 

दुरूह सफ़र 

तय करने के लिये   

ख़ुशी और ग़म का 

अभीष्ट अनुपात

तय करते-करते 

एक जीवन बीत जाता है  

अमृत-घट रीत जाता है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

संघर्ष


निकाल...
तेरे तरकश में 
जितने तीर हैं
हमारा क़लम 
तेरे लिए  
 चमचमाती 
शमशीर है (?)


जिगर 
फ़ौलादी हो गया है 
हालात से 
लड़ते-लड़ते
नहीं जीना हमें गवारा 
अब मौत से 
डरते-डरते।  


हम नीम को नीम 
और 
आम को आम ही कहेंगे
इसके लिए ज़ालिम  
तेरा 
हर सितम सहेंगे।  


काग़ज़ी शेर नहीं हम 
मिट्टी के 
मिटते-बनते दीये  हैं
रौशनी रहे 
अँधेरी राहों में 
तो 
चराग़ों में 
ख़ून अपना 
जलने को 
भर दिए हैं।  


ख़ामोशी हमारी 
भारी पड़ेगी 
तेरी सब साज़िशों पर
हमारा अंदाज़ है 
हर हाल में 
मुस्कुराना 
रंजिशें हैं बे-असर 
नवाज़िशों पर।  


हमारा मक़्सद  
इंसाफ़ के लिए
सतत संघर्ष है
पथरीली-कटीली 
राहों पर चलना 
रहा मंज़ूर 
हमें सहर्ष है। 
© रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 


शमशीर= तलवार / SWORD 
ज़ालिम  = अत्याचारी, ज़ुल्म ढाने वाला / OPPRESSOR
सितम=अन्याय, अनर्थ / CRUELTY  
नवाज़िश=मेहरबानी, कृपा /KINDNESS, PATRONAGE  



रविवार, 26 अगस्त 2018

भेड़िया और मेमना


भेड़िया 

मेमने से 

कह रहा है 

आप मेरी शरण में 

महफ़ूज़ हैं, सलामत हैं 

मेमना समझ नहीं पाता 

वक़्त की हेरा-फेरी है 

या आयी क़यामत है 

अब शिकारी 

पैंतरे बदल रहा है 

हमदर्द बनकर 

ख़ंजर घौंप रहा है 

मेमने का योजनाबद्ध  

ब्रेन-वाश हो रहा है 

चरवाहा चादर तानकर 

बे-ख़बर सो रहा है 

चरवाहे के वफ़ादार कुत्ते भी 

आजकल भूखे रहने लगे हैं 

मजबूरन दूर-दूर तक 

भोजन तलाशने लगे हैं 

ज़माने की हवा के रुख़ में 

बदलाव का नशा समाया है 

पूछते हैं अब तक 

कैसे और कितना कमाया है?

गाँव-शहर-जंगल तक 

एक ही शोर छाया है

भविष्य की अनिश्चितता का 

ख़ौफ़नाक ख़ामोश ख़तरा क्यों मड़राया है! 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

सोमवार, 20 अगस्त 2018

दीमक



हमारे हिस्से में 
जो लिखा था 
सफ़हा-सफ़हा से 
वे हर्फ़-हर्फ़ सारे 
दीमक चाट गयी
डगमगाया है 
काग़ज़ से 
विश्वास हमारा 
पत्थर पर लिखेंगे 
इबारत नई  
सिकुड़ती जा रही 
सब्र की गुँजाइश 
बिखरने के 
अनचाहे सिलसिले हैं 
इंसाफ़ की आवाज़ 
कहाँ गुम है ?
किसने आज़ाद हवा के 
लब सिले हैं?

© रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
सफ़हा = पृष्ठ,पन्ना / PAGE 
हर्फ़ = शब्द / WORD 
लब = होंठ / LIP(S)  



शनिवार, 4 अगस्त 2018

आहट सुनायी देती है.....?


मानवी-झुण्ड 

अपने स्वार्थों की रक्षार्थ 

गूढ़ मंसूबे लक्षित रख 

एक संघ का 

निर्माण करता है 

उसमें भी पृथक-पृथक 

धाराओं को सींचता है 

सुखाता है 

अन्तः-सलिला का 

निर्मल प्रचंड प्रखर प्रवाह

मूल्य स्वाधीनता के 

करता है बेरहमी से तबाह 

गढ़ता है 

नक़ली इतिहास के गवाह 

कहता है- 

मैं हूँ आपका ख़ैर-ख़्वाह......(?) 

जब सामने आता है दर्पण 

भ्रम और भ्रांतियाँ 

चीख़कर सत्य से परे 

भाग नहीं पाती हैं 

एक चेहरे के कई रुख़ 

साफ़ नज़र आते हैं 

तब बचता है 

एक ठगा हुआ 

बेकल अकेला इंसान.......

देखता है 

अपनी शक्ल टुकुर-टुकुर

शर्माता है भोलापन  

सुदूर एक बूढ़े वृक्ष की शाख़ से 

जुदा  होकर 

सूखकर ऐंठा हुआ 

एक खुरदुरा पत्ता 

खिड़की से आकर टकराता है 

तन्द्रा टूट जाती है 

वक़्त के उस लमहे में.....!  

© रवीन्द्र सिंह यादव

शनिवार, 14 जुलाई 2018

एक शरमाया शजर
















वो देखो 

झुका है 

भीगकर 

लचका भी है 

एक शरमाया शजर 

पहली बारिश में तर--तर 

आया कोई  उसके  नीचे 

ख़ुद को बारिश से बचाने 

थमने  लगी  बरसात

माटी की सौंधी गंध 

लगी फ़ज़ा महकाने 

आ गयी चिड़िया भी 

फुदककर बूँदों में नहाने 

बूँदों की सरगम पर 

 
रिमझिम के तराने 

बौराया बादल लगा सुनाने  

जाने किस जानिब से 

लायी किसका सुराग 

आवारा सबा 

सरगोशियों में 

कि  

पनीले पत्तों पर 

सरकती सरसराती 

खनखनाती आती बूँदों से 

उसका भी मन मचल पड़ा

फैलाकर अपना दामन भिगोने।  

© रवीन्द्र सिंह यादव


शब्दार्थ / WORD  MEANINGS 

शजर = पेड़, वृक्ष / Tree 

तर--तर = पूरी तरह भीगा हुआ / COMPLETELY  DRENCHED 

बौराया = पगलाया, भटका हुआ, आम पर बौर आने की स्थिति, मंजरित  / 

जानिब= ओर,तरफ़,दिशा / DIRECTION   

सुराग = रहस्य या अपराध का सूत्र, टोह, खोज, संकेत,सूचना,भनक  / CLUES 

सबा= हवा, सवेरे की हवा / Gentle Breeze 

सरगोशियाँ = कानाफूसी, कान में फुसफुसाना  / WHISPERING, GOSSIP 
  
पनीले = जलयुक्त, पानी से भरे / WATERY 




शनिवार, 7 जुलाई 2018

नदी के किनारे (हाइकु)

 सँकरी नदी 
थे उस पार आप  
गुफ़्तुगू आसाँ 

चलते रहे 
गये दूर तक
चाहा मिलन  

गयी आँधी
बुढ़ऊ नीम गिरा 
पुलिया बना 

ठिठक गया 
आना हुआ आपका
देखा आँखों में  

बिछड़ गये 
सदा के लिये हम 
फ़ैसला था ये। 

© रवीन्द्र सिंह यादव



बुधवार, 4 जुलाई 2018

बचपन




बहुत याद आता है
अल्हड़पन में लिपटा बचपन
बे-फ़िक्री का आलम 
और मासूम लड़कपन  
निकलता था 
जब गाँव की गलियों से 
बैठकर पिता जी के कन्धों पर  
लगता था मानो छू लिया हो 
ऊँचा आकाश किलकारी भरकर   
खेत-हार घूमकर लौटते थे 
सवाल-जवाब के दौर चलते थे 
सुनाते थे पिता जी बोध-कथाऐं  
कैसे लड़ोगे जब आयेंगीं बलाऐं 
दोस्तों के साथ धमाचौकड़ी 
खेल-खेल में धक्कामुक्की   
अमिया इमली जामुन 
सब आपस में साझा करते 
झरबेरी के लाल-पीले बेर 
बाग़ों में मीठे अमरुद खाया करते  
अब तो बस यादों में सिमटा है बचपन 
पुनि-पुनि हम क्यों जीना चाहें बचपन?
© रवीन्द्र सिंह यादव


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जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...