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गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

वे बच्चे अब कहाँ हैं ?

वे बच्चे अब कहाँ हैं ?

जो रुक जाया करते थे 

रास्ते में पड़े 

असहाय घायल को उठाकर 

यथासंभव मदद करने

वक़्त ज़ाया होने 

कपड़े ख़ून से सन जाने की 

फ़िक्र किए बग़ैर

पवित्र विचारों का 

पौधा रोपते थे  

वे तड़पते घायल का 

सिर्फ़ वीडियो नहीं बनाते थे 

संवेदना के गहरे गीत रचते थे।  

© रवीन्द्र सिंह यादव  

सोमवार, 24 मई 2021

गंगा में बहतीं लाशें

लाशों की दुर्दशा के 

अनचाहे मंज़र 

मुझे सोने नहीं देते 

ये लाशें मुझसे पूछतीं हैं 

गुलाबी रातों के हसीं ख़्वाब में 

कब तक सोए रहोगे?

भारत की साख़ पर 

दुनिया को क्या जवाब दोगे?

अभावों में स्वभाव 

ऐसे बदले कि

चिता का सामान न जुटा सके  

अंतिम संस्कार से 

वंचित हुए पार्थिव शरीर

कुछ बहा दिए गंगा में 

कुछ रेत में दबा दिए... 

माँसाहारी पशु-पक्षी 

लाशों को नौंचते दिखे 

वीडियो बनानेवाले 

वीभत्स कृत्य देखते रहे 

आँधी-तूफ़ान भी आकर 

उड़ाकर रही-सही सूखी रेत

रह-रहकर शव उघाड़ते रहे

करोना महामारी की

दूसरी लहर ने 

ढाया ऐसा क़हर 

छाया है मातम ही मातम 

गाँव-शहर!   

© रवीन्द्र सिंह यादव  

  

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

क़ानून के हाथ लंबे होते हैं
























उस दिन 

वह शाम 

काले साये में लिपटती हुई 

रौशनी से छिटकती हुई 

तमस का लबादा लपेटे 

जम्हाइयाँ लेती नज़र आयी थी 

तभी गुलशन से अपने बसेरे को 

लौटती नवयुवा तितली

उत्साही दुस्साहस की सैर  

की राह पर चल पड़ी

राह भटकी तो 

भूखे वीरान खेतों की 

मेंड़ों से होकर जाती 

क्षत-विक्षत पगडंडी पर   

चल पड़ी 

बाँसों के झुरमुट से 

आ रहे थे हवा के अधमरे झोंके 

वाहियात सन्नाटा 

दिमाग़ के किवाड़ों की खड़खड़ाहट 

चंचल हवा की फिसलन से 

डरावना माहौल सृजित कर रहा था 

शहर की तरफ़ आते 

सियार से राब्ता हुआ 

सड़ांध मारते पिंजर को 

मौक़ा पाकर मुँह मारते 

कौए, कुत्ते, सियार और गिद्ध से 

न चाहते मुक़ाबिल हुई 

अपने डैने फैलाकर शिकार पर 

आँखें गढ़ाती बाज़ की हिंसक नज़र   

तोते के बच्चे चहचहाते मिले 

शुष्क ठूँठों के कोटरों से झाँकते

तितली सहम गयी 

जब उसने सुनी 

एक दिल दहलाती चीख़

आक्रोश में सराबोर चीत्कार 

कुछ बहसी दरिंदे 

अपने-अपने सर ढाँपकर 

अप्राकृतिक कृत्य करते मिले 

तितली रुकी और अपना 

विचारों का ख़ुशनुमा रोमाँचक सफ़र 

अधूरा छोड़ / गरिमा से आहत हो 

लौट आयी शहर की ओर 

सीधे पुलिस-थाने पहुँची 

जहाँ चल रही थी दारु-पार्टी 

थकी-हारी अलसाई तितली 

बैठ गयी दीवार पर 

याचना का भाव लेकर 

ख़तरों से चौकन्ना होकर

छिपकली ने छलाँग लगायी

तितली जैसे रंगीन शिकार पर 

औंधे मुँह जा गिरी 

मेवा मिश्रित नमकीन की प्लेट में 

पार्टी का मज़ा किरकिरा हुआ 

दीवार पर सहमी चिपकी 

एक पुलिसमैन की आँखें 

टिक गयीं मासूम तितली पर 

तितली ने भी अपनी दारुण याचना 

उन सच्ची आँखों में उड़ेल दी

सम्मोहित किया पुलिसमैन को 

उसने मोबाइल निकाला 

वीडियो सूट करता हुआ 

तितली का अनुसरण करता हुआ 

पहुँचा घटनास्थल पर 

और ख़ुद को कोसने लगा 

तितली को मन ही मन नमन किया

धन्यवाद किया 

क़ानून के हाथ लंबे होते हैं 

यह जताने के लिये / सोया ज़मीर जगाने के लिये! 

 © रवीन्द्र सिंह यादव 



मंगलवार, 31 जनवरी 2017

ओस और मुनिया



जब

वातावरण में

समाहित  वाष्प  को

सिकोड़   देती  है  सतह  की  ठंडक,

तब

शबनम के दाने / ओस के मोती,

फूल-पत्तियों      पर      आसन     जमाते    हैं,

हमारे  मरने-मिटने  के  भय  को  लजाते   हैं।


मुनिया    समझदार    हुई,

पाँच    बसंत     पार    हुई,

बोली  एक   इतवार  को-

"पार्क  में  मैं  भी  चलूँगी,

कुलाँचें   मैं  भी  भरूँगी...!"


सवालों-जवाबों  के  बीच  पहुँचे  पार्क,

चमका   रही    थीं  ओस-कणों   को,

भोर      की     मनहर      रवीना,

ये  क़ुदरत  के आँसू   हैं  या  पसीना...?

कवितामयी / छोटे  मुँह   बड़ी  बात...!

सीधा  मन-मस्तिष्क  पर लुभावना आघात।


मैंने   कहा-

यह   ओस   है,

उसने कहा-

"ENGLISH  में   बताओ"

"DEW...!" -जवाब  मैंने  दिया,

इसे  तो  मेरे  टीचर  ने  वीडियो  में  दिखाया  था...

सुनकर  मेरे  सपनों  पर  ओस  पड़   गयी!

घर  आते-आते   सारी   ओस  झड़  गयी!!

©रवीन्द्र  सिंह यादव









बुधवार, 11 जनवरी 2017

सैनिक की जली हुई रोटियाँ



सैनिक  ने

अंतर्जाल  पर   वीडियो  अपलोड  कर,

दिखाई  जली  हुईं   रोटियाँ,

सीमा  सुरक्षा  बल  ने  जाँच  कर  खंडन  किया।



सैनिक!

आप   नहीं  जानते,

आपकी   दिखाई

 अधजली   रोटी  ग्लोबल  ट्रेंड  बन  गयी।



हमने  तो  सिर्फ़

अपना  मन  मसोस  लिया,

ख़ुद  को  तिलमिला  लिया,

राष्ट्रीय-सुरक्षा   के  गंभीर  सवालों  से,

ख़ुद   को  खदबदा  लिया।


लेकिन........

जो-

 हमारी  राष्ट्रीय  एकता  और  अखंडता  के  लिए  ख़तरे   हैं,

उनकी   बाँछें     तो   खिल  गयी  होगीं,

अधजली   रोटी  खाने  वाली  सेना  को

दुश्मन   क्या  समझेगा ..?




सैनिक!

हमारी  चैन  की  नींद  न  उड़ाओ,

जो  मिले  वही  खाओ,

स्वदेश   के  लिए  क्या  कुछ  नहीं  सहना  पड़ता  है,

श्रम, लहू   के    साथ   यौवन    भी  वारना  पड़ता   है।



शिकायत-

 ईर्ष्या ,आक्रोश, बदलाभाव 

और  खलबली  पैदा  करती   है,

दुश्मन   को  रणनीति   का  इशारा   करती   है,

सब्र  रखो......

विमूढ़ता   और  विवेक   में  फ़र्क   रखो।




सर-ज़मीं   क़ुर्बानी    माँगती    है,

सैनिक   के   ख़ून    में  रवानी   माँगती  है,

दूसरों   का  हक़   मारने   वाले   बेनक़ाब   होंगे!

हम  बुलंद  हौसलों   के  साथ    क़ामयाब    होंगे!!

जय  हिन्द!!!

@रवीन्द्र सिंह यादव



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जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...