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शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

दूब


तूफ़ान  आएंगे

सैलाब     आएंगे

उखाड़ेंगे    उन्नत , उद्दंड    दरख़्तों    को

दूब    मुस्कायेगी

पृथ्वी    पर    पड़े-पड़े   पसरने    पर  



छाँव     न   भी  दे    सके    तो   क्या

घात-प्रतिघात    की  

रेतीली     पगडंडी    पर

तपे     पीड़ा     के    पाँव  

मुझपर     विश्राम     पाएंगे।