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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2024

फूल और काँटा

चित्र साभार: सुकांत कुमार 

SSJJ

एक हरी डाल पर 

फूल और काँटा 

करते रहे बसर

फूल खिला, इतराया 

अपने अनुपम सौंदर्य पर

महक ने दूर तक पसारे पर 

काँटा भी नुकीला हुआ,

सख़्त हुआ अभिमान से बेअसर 

उन्मादी हवा बही 

साएँ-साएँ सरसर-सरसर

काँटा हुआ पंखुड़ी के 

आरपार एक दोपहर 

धूप-बारिश की मार 

हुई धुआँधार गाँव-शहर 

तितली-भँवरे,कीट-पतंगे, 

रसिक कविवर 

गाते गुणगान फूल का 

मन भर कर

काँटा तो चुभन की 

पीड़ा देता चुभकर 

जिस फूल की रक्षा में 

काँटा झेलता रहा आलोचना जीभर 

वही एक दिन 

लगा किसी के हाथ 

और मुरझाया सेज पर सजकर

अब काँटा जी रहा 

एकाकी जीवन मन मार कर 

नियति-चक्र में 

फूल-काँटे साथ रहते 

विपरीत स्वभाव होकर

फूल-काँटे पनपते रहेंगे 

मौसमों की मार सहकर। 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव    


शनिवार, 3 अप्रैल 2021

न राहत की सुबह न चैन की दुपहरी है



बसंत को विदा हुए

कुछ अरसा ही बीता है 

कुछ पत्ते झड़ गए 

कुछ को नए रंगों में

खिलने का सुभीता है

बकाइन, पीपल, सेमल को देखो 

पुराने पत्तों के झरने के उपरांत 

कैसे सुनहले-हरे पल्लवों से 

लजाते हुए ख़ुद को ढक रहे हैं  

सुदूर अमराइयों में 

कोकिला की कूक है 

पकती फ़सल देख 

किसान को एमएसपी की हूक है

ख़ून-पसीने की कमाई 

कितनी अनिश्चित है 

किसान की समृद्धि 

किसी और के हाथ में सुरक्षित है 

आसमान में उमड़ते बादल 

दूर-दूर तक उठते धूल के ग़ुबार 

बेमौसमी बेचैनी के विस्तार 

नितांत ठूँठ को भी नहीं सुहाते 

विपरीतताओं से हम कब अघाते 

अन्न के दाने 

खेत से घर 

घर से बाज़ार-दर-बाज़ार 

लिए डोलता है कृषक 

इस सफ़र में 

घात लगाए बैठे लुटेरों से 

दिन-रात जूझता है कृषक 

पतझड़ के बाद 

फिर उगाएगा नए पौधे 

रोपेगा उम्मीद के नए पौधे

यह नियति-चक्र में 

शोषण-चक्रव्यूह की 

साँठगाँठ गहरी है

न राहत की सुबह 

न चैन की दुपहरी है। 

 © रवीन्द्र सिंह यादव 

 




शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

नई सुबह



इठलाती  शाम  चली  है

 गुज़रने   के   लिए 

परिंदे  तैयार  हैं  फिर

 सिंदूरी धूप में निखरने के लिए ।


आदमी  लगा  है  रात-दिन

 कुछ  न  कुछ  करने  के  लिए 

नन्ही  चिड़िया  सोने चली है 

सपनों  में  बिचरने  के  लिए।



नियति-चक्र  नहीं  बना  है

पलछिन  भी  ठहरने  के लिए 

दुनिया  ने  इंतज़ाम  किए हैं

 सन्नाटा  पसरने  के  लिए।



सुमन  से  आज़ाद  है  सुगंध

हवाओं  में  बिखरने  के लिए 

हम आज  बेक़रार  हैं  क्यों

भाव  रिश्तों  का परखने  के लिए।



नई  सुबह  का  इंतज़ार  है

जब  कुछ  न  हो  अखरने  के  लिए 

प्यास  बुझ  जायेगी  अब

आई  है  बदली ज़मीं पर उतरने  के  लिए।

# रवीन्द्र  सिंह यादव

शब्दों के अर्थ / पर्यायवाची / Word Meanings

इठलाती= चंचल  अदाओं के साथ मटकती या इतराती हुई/ Flirtatiously
परिंदे   = पंछी ,पक्षी, खग / Birds
बिखरने  =  फैल  जाना , अलग-अलग हो जाना / Disperse
नन्हीं = छोटी,लघु / Small
विचरने  = घूमने-फिरने , विचरण   करने / To Walk
नियति-चक्र= प्रकृति  का चक्र , समय-चक्र ,काल-चक्र / Nature's Cycle
पलछिन =समय का बहुत छोटा हिस्सा ,पल,क्षण /  Moment
पसरने   = फैलने , विस्तार करने / To Spread
सुमन= फूल ,पुष्प / Flower
सुगंध= अच्छी  गंध ,ख़ुशबू  , मनभावन महक / Fragrance/ Flavour
बेक़रार = बेचैन, व्याकुल , तड़प से भरा हुआ / Restless
अखरने = बुरा लगने , चुभने ,कचोटने / To Pinch
बदली =  बादल  का छोटा टुकड़ा / Small Cloud/


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