द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जन्मे
कुबुद्धि बालक
अब तक तो वयोवृद्ध हो चुके हैं
हिंसक उन्माद में डूबकर
मानसिक संतुलन खो चुके हैं
अमेरिका और इज़राइल
मिलकर लड़ रहे हैं युद्ध
अकेले ईरान से
महीना भर भी कम लग रहा है इन्हें
लड़ते-लड़ते भीषण युद्ध
मारे जा रहे हैं मासूम बच्चे
जिनका कोई अपराध नहीं
मारे जा रहे हैं लोग
जिनके पास बचाव के लिये कोई हथियार नहीं
मारे जा रहे हैं लगातार
निरपराध परिंदे और सुकोमल तितलियाँ
जो अनभिज्ञ हैं विकृत मानवीय सोच से
क्या दोष है पर्यावरण का
जो डूब गया है
बिषैले बारूद के गर्द-ओ-ग़ुबार में
सामूहिक मृत्यु को सहज बनाते
विवेकहीन नेताओं के आदेश
भरा है जिनमें तकनीकी आवेश
अपने लिये सुखद मृत्यु की कल्पना में डूबे हैं
धिक्कार है ऐसे संवेदनाविहीन दिमाग़ों पर!
जागो शांति के मसीहाओ!
वक़्त रहते पृथ्वी को वीरान होने से बचा लो!
और कोई कुबुद्धि ऐसी क्षमता में न हो
जो ले जाए दुनिया को
परमाणु-युद्ध की ओर
विवेकशील मस्तिष्क को ही सौंपना
अब देश की बाग-डोर!
© रवीन्द्र सिंह यादव

जाने कब तक होता रहेगा युद्ध....।
जवाब देंहटाएंइंसानियत के लिए एक संवेदनशील क़लम का आह्वान महज एक रचना तक सीमित नहीं एक बौद्धिक जिम्मेदारी है। युद्ध किसी भी देश के नागरिकों के त्रासदी और राजनीतिज्ञों के लिए महत्वाकांक्षा की पूर्ति का साधन होता है जिसके भयावह परिणाम आने वाली अनेक पीढ़ियॉं भुगतती है।
सादर।
-------
जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
युद्ध की विभीषिका से जन्मी मार्मिक रचना
जवाब देंहटाएं