बुज़ुर्ग सीढ़ी क्या कहे अपनी दास्तान
रोती है ज़ार-ज़ार हो जब सूना मकान
बेफ़िक्र उत्सुक हो चढ़ जाते हैं सीढ़ी
भूतल को सँभलकर उतरते हैं सीढ़ी
ममता, प्रेम, घृणा, आकांक्षा
सब चढ़े-उतरे हैं सीढ़ी से
निर्माता के उर में उतर गयी है
भव्य नियोजित सीढ़ी-दर-सीढ़ी
इस सीढ़ी का वैभवपूर्ण इतिहास
लिखेगा कोई धीर शोधार्थी
आधुनिकता के अंधड़ में सूनी हुई तो क्या
सीढ़ी संग जीने वाले थे रसिक संगी-साथी.
©रवीन्द्र सिंह यादव
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बहुत सुंदर भावपूर्ण कविता।
जवाब देंहटाएंअंतिम बंध बेहद अच्छा लगा।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २३ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
व्वाहहहह
जवाब देंहटाएंसुंदर
वंदन
सुंदर
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