वह बीमार दिन
तड़प-तड़पकर गुज़रा
नई दिल्ली में
एक पचपन साल पुरानी
बहुमंज़िला इमारत
भरभराकर ढह गयी
सपने सजाने
भविष्य सँवारने
किरायेदार बन रहने आये थे
देश के कर्णधार
दब गये, कुचल गये
माँ-बाप को छोड़ गये मझधार
सहायता के लिये तड़पते रहे
मलबे से विडीओ भेजते रहे
लँगड़ाती हुई सुबह
अंधी होकर ढली धूप
कोलाहल से बहरी हुई रात
निष्ठुर हो गुज़रती रही
लाश पर लाश गुज़रती रही
दिन की तबियत बिगड़ती रही
चिड़िया की आँख छलकती रही
सीने में आग धधकती रही
बिना परों के पक्षी-सी संवेदना
अपनी विवशता पर हाथ मलती रही
ओह!
बहुत बीमार था वह दिन...!
©रवीन्द्र सिंह यादव
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आपकी यह रचना केवल एक दुर्घटना का वर्णन नहीं है, बल्कि यह लाचार व्यवस्था, प्रशासनिक ढिलाई और मानवीय संवेदनाओं के मूक हो जाने पर एक गहरा शोक और तीखा कटाक्ष है। बिंब तो बहुत प्रभावशाली एवं
जवाब देंहटाएंबेहद मार्मिक है।
सादर
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ११ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
हटाएंकृपया ११सितंबर पढ़े।
हटाएं11 सितंबर है
जवाब देंहटाएंवंदन
दुखद
जवाब देंहटाएंबेहद दुखद दुर्घटना, मार्मिक चित्रण
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