सत्ता का रूप
वीभत्स हो उठता है
जब उसके हो जाते हैं
नुकीले दाँत
पैने-लंबे पंजों के नाख़ुन
आँखों से विलुप्त शील
ह्रदय में बैठ जाती है
स्वार्थी संवेदनहीनता
तब राजधानी की
ख़ाकी सड़कों पर
उसका क्रूर अमानवीय चेहरा
अट्टहास करता हुआ
झूम-झूमकर थिरकता है
मासूमों को कुचलकर
करता है भयाक्रांत
अपने ही
निरपराध नागरिकों को
जो भाता है
चंद चालाक धूर्तों को!
©रवीन्द्र सिंह यादव

आपके अनुसार -
जवाब देंहटाएंजब सत्ता स्वार्थी और संवेदनहीन हो जाती है, तो उसका क्रूर और अमानवीय चेहरा मासूम नागरिकों को डराता और कुचलता है—जो केवल कुछ चालाक धूर्तों को ही रास आता है।
बेहद आक्रोशित उद्गार आपके।
परंतु मेरे अनुसार यह सिक्के का एक पहलू है।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १३ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।