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सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

नागरिक और सत्ता

सत्ता का रूप 

वीभत्स हो उठता है 

जब उसके हो जाते हैं 

नुकीले दाँत 

पैने-लंबे पंजों के नाख़ुन 

आँखों से विलुप्त शील 

ह्रदय में बैठ जाती है 

स्वार्थी संवेदनहीनता 

तब राजधानी की 

ख़ाकी सड़कों पर 

उसका क्रूर अमानवीय चेहरा

अट्टहास करता हुआ 

झूम-झूमकर थिरकता है 

मासूमों को कुचलकर  

करता है भयाक्रांत 

अपने ही 

निरपराध नागरिकों को

जो भाता है 

चंद चालाक धूर्तों को! 

©रवीन्द्र सिंह यादव 

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सत्ता का रूप  वीभत्स हो उठता है  जब उसके हो जाते हैं  नुकीले दाँत  पैने-लंबे पंजों के नाख़ुन  आँखों से विलुप्त शील  ह्रदय में बैठ जाती है  स्...