साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
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सीढ़ी जो उदास थी...
चित्र साभार : गूगल बुज़ुर्ग सीढ़ी क्या कहे अपनी दास्तान रोती है ज़ार-ज़ार हो जब सूना मकान बेफ़िक्र उत्सुक हो चढ़ जा...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (25-10-2020) को "विजयादशमी विजय का, है पावन त्यौहार" (चर्चा अंक- 3865) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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विजयादशमी (दशहरा) की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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सटीक प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंसटीक....
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