तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो?
एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते
कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में
कली से फूल
फूल में बीज
बीजों से फिर नये पौधे
देखो राह की मिट्टी को
वर्षा में घुल गयी
महक बिखेरकर धुल गयी
सर्द मौसम की सुहानी धूप
पर्वतों पर प्रकृति सँवारती है अपना रूप
नियति-क्रम में हरेक पल
एक-दूसरे से अजनबी ही तो है...
प्रकृति की सर्वोत्तम कृति
यानी मानव
माप-गिन रहा है दूरी,समय,सामान
व्याकुल है कि लोग कैसे रहें परेशान।
©रवीन्द्र सिंह यादव
