साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
मंगलवार, 28 नवंबर 2017
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
जारी है युद्ध
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जन्मे कुबुद्धि बालक अब तक तो वयोवृद्ध हो चुके हैं हिंसक उन्माद में डूबकर मानसिक संतुलन खो चुके हैं अमेरिका और...
-
मानक हिंदी और आम बोलचाल की हिंदी में हम अक्सर लोगों को स्त्रीलिंग- पुल्लिंग संबंधी त्रुटिय...
-
चित्र:महेन्द्र सिंह सर्दी तुम हो बलवान कल-कल करती नदी का प्रवाह रोकने भर की है तुम में जान जम जाती है बहती नदी बर्फ़ीली हवाओं को तीखा ब...
-
बीते वक़्त की एक मौज लौट आयी, आपकी हथेलियों पर रची हिना फिर खिलखिलायी। मेरे हाथ पर अपनी हथेली रखकर दिखाये थे हिना के ख़...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपकी टिप्पणी का स्वागत है.