ईवीएम का द्वंद्व
दल दलदल
भोली जनता
लोकतंत्र
चुनाव
छल
है?
है
दावा
अपना
धर्म जाति
साम्प्रदायिक
बाण-तूणीर
छलनी करेंगे
मतदाता का मान।
© रवीन्द्र सिंह यादव
साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
चित्र:महेन्द्र सिंह तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो? एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में कली से ...
वाह !!बहुत ख़ूब आदरणीय ...लाजबाब 👌
जवाब देंहटाएंसादर
सादर आभार अनीता जी मनोबल बढ़ाने के लिये।
हटाएंवाह....! बहुत खूब....लाजवाब.. आदरणीय।
जवाब देंहटाएंबहुत-बहुत आभार रवीन्द्र जी उत्साहवर्धन के लिये।
हटाएंबहुत खूब कहा आपने आदरणीय सर
जवाब देंहटाएंलाजवाब....सटीक 👌
सादर नमन
शुक्रिया आँचल जी चर्चा में शामिल होने के लिये।
हटाएंबहुत सही कहा
जवाब देंहटाएंसादर नमन आदरणीया।
हटाएंआपकी टिप्पणी ब्लॉग पर देखकर हार्दिक ख़ुशी हुई।
सार्थक , कलात्मक पिरामिड रवीन्द्र जी |सादर -
जवाब देंहटाएंसादर आभार रेणु जी शुभकामनाओं और उत्साहवर्धन के लिये।
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंसाहित्यपीडिया द्वारा सम्मानित होने के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनायें |
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