एक सिरे पर
फॉस्फोरस लगीं तीलियाँ
चुपचाप रहती हैं लेटे-लेटे,
माचिस के भीतर
अपने भीतर
अप्रत्याशित आग समेटे।
तीलियाँ निभातीं हैं
ख़ामोश होकर
साथ रहने की रस्म,
अगर ये लड़ने-झगड़ने
ज़ोर-ज़ोर से रगड़ने पर
उतर आएँ
तो हो जाएगी
माचिस की डिबिया भस्म।
उपभोक्ता
निकालता / निकालती है
एक दुबली-पतली तीली
बीड़ी-सिगरेट जलाने,
चूल्हा जलाने,
छप्पर / घर जलाने,
खरपतवार जलाने,
पराली जलाने,
कान खुजलाने,
दीया / ढिबरी / लालटेन / मशाल / मोमबत्ती जलाने,
शहरी ज़हरीला कचरा
चोरी से जलाने,
दंगों में घिरे
पेट्रोल छिड़के
मासूम व्यक्ति को जलाने,
केरोसिन / पेट्रोल से भीगी
या लीक एलपीजी में घिरी
बेबस स्त्री को जलाने!
आसमान तुम बरसा देना
तीलियाँ सीलने के लिए
आँसू, पसीना, ओले, कोहरा
जब-जब तीलियों का प्रयोग
मानवता के विरुद्ध हो!
© रवीन्द्र सिंह यादव
