मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

भारतरत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर

            

चित्र साभार: गूगल  

            भारतीय संविधान के रचयिता भारतरत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी की आज जयंती है जो देशभर में उत्सव की भाँति मनाई जाती है। 14 अप्रैल 1891 को जन्मे बाबा साहब का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। देश जब ब्रिटिश हुकूमत का ग़ुलाम था तब उन्होंने विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए उच्च शिक्षा में दक्षता प्राप्त करके एक बेमिशाल प्रेरणादाई मक़ाम हासिल किया और दलित-चेतना, आंदोलन एवं विमर्श को नवीन अर्थों में स्थापित किया। 

            वे लोगों को प्रेरित करते हुए कहते हैं-

"मेरी प्रशंसा और जय-जयकार करने से अच्छा है मेरे दिखाए मार्ग पर चलो।"

"अगर शरीर के अलग-अलग हिस्सों के पास अभिव्यक्ति की शक्ति होती और प्रत्येक यह कहता कि वह शेष से उच्चतर और बेहतर है तो शरीर टुकड़े-टुकड़े हो चुका होता।" 

"शिक्षित बनो, संगठित होओ, संघर्ष करो।"

           समता,स्वतंत्रता और न्याय की अवधारणा को हमारे संविधान में स्थापित करने वाले बाबा साहब हरेक उस पीड़ित,वंचित,उपेक्षित, ग़रीब एवं दमन के शिकार व्यक्ति को प्रिय हैं जो अपने अधिकारों से जुड़े सम्मान को हासिल करना चाहता है। उनके नेतृत्त्व में सामाजिक भेदभाव और शोषण पर आधारित वर्ण-व्यवस्था के ख़िलाफ़ बुलंद आवाज़ उठी जिसने सामाजिक परिवर्तन का नवीनतम अध्याय रचा। 

          देश में लंबे समय तक उन्हें दलित नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा जो उनके साथ एक प्रकार का बौद्धिक अत्याचार था। 90 के दशक में देश की राजनीति में आए मूलभूत परिवर्तन के बाद बाबा साहब की स्वीकार्यता समाज के अन्य वर्गों में भी लोकप्रिय होने लगी। अब लोग 14 अप्रैल को सामाजिक न्याय दिवस के रूप में भी मनाते हैं। बाबा साहब भारतीय संविधान के शिल्पकार होने के साथ-साथ अर्थशास्त्री, समाज सुधारक,विद्वान राजनेता एवं मूर्धन्य लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। 

        आज करोना संकटकाल में बाबा साहब बहुत ज्यादा याद आते हैं।वे हमेशा एक प्रासंगिक व्यक्तित्त्व के रूप में भारतीय जनमानस में सामाजिक समता की वैचारिक क्रांति के जनक के रूप में याद किए जाते रहेंगे।  उनकी दिखाई दिशा से व्यवस्था 132 करोड़ नागरिकों के देश भारत को आगे बढ़ा रही है।  हमारा शत-शत नमन। 
  
© रवीन्द्र सिंह यादव 

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

छत और धूप

करोना काल की 

तालाबंदी ने 

छतें आबाद कर दीं हैं, 

बाग़-बग़िया

सड़कें-गालियाँ

सूनी नाशाद कर दीं हैं। 



छत पर आयी 

किसी रमणी के 

दर्शनार्थ 

आते थे छतों पर युवक,

माँ-बापू की 

आहट पाते ही 

जाते थे 

शरमाकर दुबक।



यह तो 

गए ज़माने की 

आई-गई बात है, 

अब तो 

मोबाइल पर ही 

मनचाही मुलाक़ात है।



वीडियो कॉन्फ़्रेंस 

जुड़े होने का एहसास 

बरक़रार रखे है,

बावरा मन 

तमन्नाओं के सागर में 

उन्मुक्त नौकायन के लिए
  
उम्मीद की पतवार रखे है।



अब छतें निजता का 

ख़याल रखतीं हैं,

पड़ोसियों की हलचल से 

अनभिज्ञ रहने का 

गुमान पाल रखतीं हैं।    



एक-दूसरे के हिस्से की 

चमकीली धूप 

बहुत ऊँचीं छतों ने 

हड़प ली है,

विटामिन-डी की

दवाओं ने 

घरों में खिलौनों की 

जगह हड़प ली है। 



लाचारी में मिली 

धूप ने 

अपना असर किया होगा,

हड्डियों-मांसपेशियों का दर्द

कम हुआ होगा 

दवा-व्यापार का कर्व 

पसर गया होगा। 



इस दौर में 

कुछ ऐसे भी हैं 

जो छतों को मुँहताज हैं

देश की बेघर आबादी

दसकों से  

दरवाज़े-बालकनी के 

इंतज़ार में है 

ताकि वह भी किसी दिन 

ताली-थाली,घंटी बजा सके

दीया-मोमबत्ती जलाकर 

ख़ुद को गर्व से 

देश से जुड़ा 

महसूस सके!
   
©रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

लॉकडाउन

उस ख़ामोश स्थितिप्रज्ञ 

पहाड़ी तक 

जाना चाहता हूँ 

उस चरवाहे की 

बाँसुरी की 

मद्धिम मधुर धुन  

सुनना चाहता हूँ 

भेड़-बकरियों के झुंड की 

हलचल देखना चाहता हूँ 

चरवाहे के कुत्ते की निष्ठा 

महसूसना चाहता हूँ

पहाड़ी की ऊँचाई से 

गहरी खाई में 

सूर्य-किरणों को चूमने 

गर्दन लंबी करते विशाल वृक्षों को 

निहारना चाहता हूँ 

सुदूर पहाड़ी से झरते 

श्वेताभ झरने से उठता 

रुपहला धुआँ

ह्रदय-कपाटों में 

उड़ेलना चाहता हूँ...   

क्योंकि 

नियति-चक्र 

अनवरत, अबाध, अविराम अपनी ड्यूटी पर 

मानव-ज़ात विज्ञान की सुझायी सलाह पर 

बस्तियों-बसेरों में क़ैद है  

काश!

लॉकडाउन ख़त्म होने का 

अनुकूल वक़्त हो! 

और मैं 

उस पहाड़ी पर पहुँचकर 

प्रकृति की गोद में 

सर रखकर 

सुकून की गहरी नींद सो जाऊँ

पुनः तर-ओ-ताज़ा होकर 

अपने कर्तव्य पर डट जाऊँ। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

शब्द अर्थ पाएँगे

शब्दोदधि में डूब जाओ 

मुक्ता-से शब्द ढूँढ़ लाओ 

ये घिसे-पिटे 

उबाऊ चुभते 

रसीले शब्दों ने 

मन खिन्न किया है 

कानों में गूँजते 

आँखों से गुज़रते 

अर्धमूर्छित शब्द 

औंधे मुँह गिरती 

कविता के अलंकरण हैं

शब्द अर्थ पाएँगे

जब संवेदना निकलेगी 

सड़क पर महसूसने 

उन पलायन करते 

मज़दूरों की वेदना  

जो बची-खुची गृहस्थी को 

पोटली में बाँधे

सर पर लादे   

और अबोध बच्चों को

काँधों पर लादे 

निढाल भार्या 

बूढ़ी माँ का हाथ थामे 

भूखे-प्यासे

बिन पैसे  

महानगरों से

निकल पड़े

लॉक डाउन में  

पुलिस अत्याचार को सहते 

अपने घरों की ओर 

पैदल लम्बे अनिश्चित सफ़र पर

कुछ सफ़र पूरा होते-होते 

निकल गये 

किसी और दुनिया के सफ़र पर।  

 © रवीन्द्र सिंह यादव 

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

पतझड़ के बीच



























एक सप्ताह पूर्व 

देखा था उदास पीपल को 

सहते वर्तमान पतझड़ के 

कायाकल्पी कोलाहल को

पातविहीन पीपल 

अनावृत अनमनी लाजवंती 

शाखाएँ-उपशाखाएँ

बेनूर वृक्ष था पीपल

एक-दो शेष थे पीत पात 

लटके थे नीड़ बस छह-सात

आज तो 

सुनहले सुकोमल किसलय 

झीनी हल्की हरी ओढ़नी-से 

लिपट गये हैं 

हवा में लहराते हुए

'करोना लॉक डाउन' को 

बेअसर बताते हुए

पंछी आकर 

पंख फड़फड़ाने लगे हैं 

गिलहरी-गिरगिट-बंदर 

धमा-चौकड़ी मचाने लगे हैं

इनके ललचाए नैना 

मधुयुक्त छत्तों पर लगे हैं    

पीपल के नीचे

एक शहरी बेघर का बसेरा है 

आती-जाती हरेक ऋतु 

उसका नया एक सबेरा है 

उसने समेटकर सहेजकर

उम्मीदों का गट्ठर बाँधे   

रख लीं हैं झरीं सूखीं पत्तियाँ

सूखी लकड़ी संग 

चूल्हा जलाने के लिये।  
  
©रवीन्द्र सिंह यादव



सोमवार, 6 अप्रैल 2020

माचिस की तीली

एक सिरे पर 

फॉस्फोरस लगीं तीलियाँ 

चुपचाप रहती हैं लेटे-लेटे, 

माचिस के भीतर 

अपने भीतर 

अप्रत्याशित आग समेटे। 

तीलियाँ निभातीं हैं 

ख़ामोश होकर 

साथ रहने की रस्म,

अगर ये लड़ने-झगड़ने 

ज़ोर-ज़ोर से रगड़ने पर 

उतर आएँ  

तो हो जाएगी 

माचिस की डिबिया भस्म।   

उपभोक्ता 

निकालता / निकालती है 

एक दुबली-पतली तीली

बीड़ी-सिगरेट जलाने,

चूल्हा जलाने,

छप्पर / घर जलाने,

खरपतवार जलाने, 

पराली जलाने,

कान खुजलाने, 

दीया / ढिबरी / लालटेन / मशाल / मोमबत्ती जलाने,

शहरी ज़हरीला कचरा

चोरी से जलाने, 

दंगों में घिरे 

पेट्रोल छिड़के 

मासूम व्यक्ति को जलाने,

केरोसिन / पेट्रोल से भीगी

या लीक एलपीजी में घिरी  

बेबस स्त्री को जलाने! 

आसमान तुम बरसा देना

तीलियाँ सीलने के लिए   

आँसू, पसीना, ओले, कोहरा  

जब-जब तीलियों का प्रयोग 

मानवता के विरुद्ध हो! 

© रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 5 अप्रैल 2020

भेड़चाल

मोमबत्ती

उजाले के लिये

सँभालकर रखो,

माचिस की तीली

चूल्हा जलाने के लिये

बचाकर रखो,

जिनके पास

बर्बाद करने के लिये

पर्याप्त भौतिकता है,

वे शौक से

पूर्ण मनोयोग से  

भेड़चाल का हिस्सा बनें!

© रवीन्द्र सिंह यादव

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

तुम हमारे मुँह पर थूकोगे!

तुम हमारे मुँह पर थूकोगे,

हम पर पत्थर फेंकोगे,

हम पर हमला करके

शारीरिक, मानसिक

आघात पहुँचाओगे...

कोई बात नहीं

तुम बीमार हो

बदहवासी में

लाचार हो

स्वजनों की चिंता में

आपा खो रहे हो

धर्मान्धता के नशे में

चूर हो

उन्मादी हो रहे हो

किंतु हम

अपने दायित्त्व से

मुँह नहीं मोड़ेंगे

वक़्त जब

समीक्षा की कसौटी पर

कसा जाएगा

तब तुम्हें

पीढ़ी-दर-पीढ़ी

लानत भेजी जाएगी

करोना संकटकाल की

कड़ी-कड़ी जोड़ी जाएगी। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

यह तो समय तय करेगा

तुम फ़रिश्ता हो 

या शैतान 

तुम्हारे कर्म तय करेंगे, 

तुम रहनुमा हो 

या दिग्भ्रामक 

भावी पीढ़ी के लोग तय करेंगे। 


तुमने किसी को 

ऊपर उठाया है 

या रचीं थीं साज़िशें 

किसी को गिराने की 

इंतज़ार करो  

यह तो समय तय करेगा। 


तुम इंसानीयत के साथ थे 

या हैवानीयत के 

जब इतिहास लिखा जाएगा 

तो अवश्य दर्ज किया जाएगा। 


तुम्हारी हमदर्दी 

मज़लूम के साथ थी 

या ज़ालिम के

तुम्हारी कार-गुज़ारियों के क़िस्से  

दूर-दूर तक जाकर 

हवा चीख़-चीख़कर कहेगी।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

शनिवार, 28 मार्च 2020

21 दिवसीय लॉक डाउन के बाद कराहती मानवता

चल पड़े हो
तो कट ही जाएगा
धीरे-धीरे दुरूह सफ़र,
विचलित है हृदय
देखकर
21 दिवसीय लॉक डाउन के बाद
घर की ओर जाते
पैदल ग़रीबों की ख़बर। 

कमाल की हिम्मत है
हालात और
कोरोना वायरस से लड़ने की,
तुम्हें कौन समझाए
नियम-क़ानून, जुगत
महामारी से लड़ने की। 

तुम हो भारत की
तथाकथित शान,
सरकार के समक्ष
अपनी बेबसी का
क़िस्सा न सुनाकर
बचाए रखते हो
अपना अमूल्य स्वाभिमान। 

हो तुम वंचित
साधनहीन सर्वहारा
ग़रीब मेहनतकश,
तुमसे समाज का
साधनसंपन्न वर्ग
हद तक नफ़रत करता है
तड़कती है उसकी नस-नस। 

तुम्हें मिलनेवाली
सरकारी राहत का
विरोध करता है
कहता है-
तुम बोझ हो पृथ्वी पर 
तुम गंदगी-बीमारी-अपराध
फैलाते हो,
अर्थव्यवस्था पर
बोझ बढ़ाते हो। 

और हाँ!
मैं भी तुम्हारी
नशाखोरी, अशिक्षा
जनसंख्या वृद्धि
अनावश्यक शौक
ग़ुलामी की आदत
फिज़ूलख़र्ची की प्रवृत्ति से 
बहुत चिढ़ता हूँ,
मन ही मन ख़ूब कुढ़ता हूँ। 

आज मैं लानत भेजता हूँ
सरकार
एनजीओ
समाजसेवियों
तथाकथित
देशभक्तों को
विदेश में फँसे
भारतियों को लाने हेतु
हवाई जहाज़ उपलब्ध है,
अफ़रातफ़री के माहौल में
घरों को लौटते
सैकड़ों किलोमीटर के
दुस्साहसी सफ़र पर 
महानगरों से पैदल निकले
बच्चे, बूढ़े, जवान
कँधों पर लादे बच्चे-सामान
इन्हें पुलिस का
डंडाराज उपलब्ध है। 

मत चलना 
सरकारी सड़क पर
सड़क छील देगी
पाँवों की खाल
पुलिस उधेड़ देगी
भूखे-सूखे तन की चमड़ी,
क्योंकि तुम्हारे पास नहीं है
धेला-दमड़ी। 

सड़क से उतरकर
चलना मिट्टी-घास पर
सूनी सपाट
पगडंडियों पर
एक-दूसरे से 
कुछ मीटर की दूरी पर 
राह में ज़रुर मिलेंगे कुछ लोग
पूछेंगे रोटी-पानी
बच्चों को दूध
हालचाल
भात-दाल 
करते रहना हाथों की धुलाई
लंबी है लड़ाई 
कोरोना महामारी,
मुसीबत में रखना नंबर साथ 

+91-11-23978046
जीत लेंगे बाज़ी हम भी
मानवता अब तक न हारी। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 

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