साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
सीढ़ी जो उदास थी...
चित्र साभार : गूगल बुज़ुर्ग सीढ़ी क्या कहे अपनी दास्तान रोती है ज़ार-ज़ार हो जब सूना मकान बेफ़िक्र उत्सुक हो चढ़ जा...
-
मानक हिंदी और आम बोलचाल की हिंदी में हम अक्सर लोगों को स्त्रीलिंग- पुल्लिंग संबंधी त्रुटिय...
-
माँ सृष्टि स्पंदन अनुभूति सप्त-स्वर में गूँजता संगीत वट वृक्ष की छाँव। माँ आँसू ममता संवेदना गोद में लोक जीवन...
-
चित्र:महेन्द्र सिंह सर्दी तुम हो बलवान कल-कल करती नदी का प्रवाह रोकने भर की है तुम में जान जम जाती है बहती नदी बर्फ़ीली हवाओं को तीखा ब...



बहुत ही सुन्दर पिरामिड
जवाब देंहटाएंवाह!!रविन्द्र जी ,बहुत खूबसूरत पिरामिड !!!
जवाब देंहटाएंVery nice post...
जवाब देंहटाएंWelcome to my blog for new post.
सर्दी की गुनगुनी धूप से वर्ण पिरामिड।
जवाब देंहटाएंसुंदर।
बहुत सुन्दर वर्ण पिरामिड...
जवाब देंहटाएंये
धूप
जागीर
है सूर्य की
तरसाती है
महानगर में
बेबस इंसान को।
महानगरों की गगनचुंबी इमारतों में धूप के लिए तरसते लोग...
बहुत लाजवाब...
वाह!!!
धूप का मख़मली एहसास कराते सुन्दर पिरामिड। बहुत अच्छे लगे ये पिरामिड।
जवाब देंहटाएंसुन्दर वर्ण पिरामिड!!
जवाब देंहटाएंअति सुंदर प्रयास
जवाब देंहटाएंअति सुंदर प्रयास
जवाब देंहटाएं