जल जीवन है
और मृत्यु भी
बहार है
तो विभीषिका भी
जल किलकारी है
और चीख़ भी
इंसानी दंभ को
तोड़ती सीख भी
नींव, कंगूरा,
दरवाज़े, खिड़कियाँ,झरोखे
बह गये सब सपने
उम्मीदें और भरोसे
तोड़ता सीमाएँ
सृष्टि का विकराल रूप
आँचल माटी का
धरता कैसे-कैसे रूप
अल्ट्रा मॉडर्न तकनीक
दृश्य क़ैद करती रही
चीख़-पुकार
बाढ़ की विकरालता में दबती रही
पुनः सजेंगे सँवरेंगे
जिजीविषा के क्षितिज
रोपे जाएँगे
इंद्रधनुषी आशाओं भरे बीज।
©रवीन्द्र सिंह यादव

जल जीवन है और मृत्यु भी....
जवाब देंहटाएंसार युक्त रचना।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २८ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
प्रकृति को विकास में बांधने के नतीजे | नेपाल त्रासदी पर हताहतों को श्रद्धांजलि |
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