शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

चलो अब चाँद से मिलने ....


चलो अब चाँद से मिलने 

छत पर चाँदनी शरमा रही है 

ख़्वाबों के सुंदर नगर में 

रात पूनम की बारात यादों की ला रही है। 



चाँद की ज़ेबाई सुकूं-ए-दिल लाई 

रंग-रूप बदलकर आ गयी बैरन तन्हाई 

रूठने-मनाने पलकों की गली से 

एक शोख़ नज़र धीर-धीरे आ रही है। 



मुद्दतें हो गयीं 

नयी तो नहीं अपनी शनासाई 

शाम-ओ-सहर  भरम साथ चलें अपने 

कैसे समझूँ आ गयी वक़्त की रुसवाई 

आ गया बर्फ़ीला-सा  आह का झौंका 

हिज्र में पलकों पे नमी आ रही है। 



फूलों के भीतर 

क़ैद हो गए हरजाई भँवरे 

चाँद से मिलने गुनगुनाकर 

जज़्बात फिर सजे-संवरे   

उदासियों की महफ़िल में  मशरिक़ से 

मतवाली महक पुरवाई ला रही है। 



चाँद आया तो भटके राही की 

राहें रौशन हुईं 

नींद उड़ने से न जाने कितनी 

बेकल बिरहन हुईं 

बिरहा के गीत सुनने 

आते रहना ओ  चाँद प्यारे 

नये ज़ख़्म देने को 

फिर सुबह  आ रही है। 



बुधवार, 15 नवंबर 2017

धूर्त फ़िल्मकार

धूर्त फ़िल्मकार  
संवेदनशील बिषयों पर 
फ़िल्म बनाते हैं 
जनता की जेब से 
पैसा निकालते हैं 
भोली-भाली जनता को 
ठगने के लिए 
किराये के गुंडों 
सरकारी तंत्र 
और मीडिया का 
चालाकी से 
इस्तेमाल करते हैं 
फ्री पब्लिसिटी पाने का
सुलभ तरीका 
इनका हर बार सफल होता है 
जनता के बीच पनपता 
असंतोष,असमंजस और भावनात्मक ज्वार 
इनकी तिजोरियां भरता है 
इसलिए फ़िल्म रिलीज़ से पूर्व  
गोलमोल बात साक्षात्कार में करता है 
साफ़ क्यों नहीं कहते कि 
लोग जिस मुद्दे पर आंदोलित हैं 
उसकी हक़ीक़त क्या है...? 
हम समझते हैं 
इसके पीछे 
तुम्हारी बदनीयत क्या है...? 
भ्रम को और हवा देकर 
रिकॉर्ड तोड़ सफलता का सपना देखते हैं 
विवादास्पद फ़िल्म देखकर लौटे दर्शक
अपने हाथ बार-बार मलते  हैं।  
#रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

चाँद पूनम का


कभी भूलती नहीं ये लगती बड़ी सुहानी,
चंदा सुनेगा आज फिर मेरी वही कहानी।
दोहराता है ये मन
है अजीब-सी लगन
पूनम की रात आयी
नूर-ए-चश्म लायी
हसीं चंदा ने 
बसुंधरा पर 
धवल चाँदनी बिखरायी 
चमन-चमन खिला था
 मौसम-ए-बहार  का 
प्यारा-सा सिलसिला था
कली-कली पर शोख़ियाँ 
और शबाब ग़ज़ब खिला था
 एक सरल  सुकुमार कली से 
आवारा यायावर भ्रमर मनुहार से मिला था
हवा का रुख़ प्यारा बहुत नरम था
दिशाओं का न कोई अब भरम था  
राग-द्वेष भूले
बहार में सब झूले 
फ़ज़ाओं में भीनी महकार थी 
दिलों में एकाकार की पुकार थी  
शहनाइयों की धुन कानों में बज रही थी
चाह-ए-इज़हार  बार-बार मचल रही थी
ज़ुल्फ़-ए-चाँद को संवारा
कहा दिल का हाल सारा
नज़र उठाकर उसने देखा था 
चंदा को आसमान में
लगा था जैसे रह गया हो 
उलझकर तीर एक कमान में 
 फिर झुकी नज़र से उसने 
घास के पत्ते को था सहलाया
छलक पड़े थे आँसू 
ख़ुद को बहुत रुलाया
इक़रार पर अब यकीं था आया
था इश्क़ का बढ़ चला सरमाया
नज़रें  मिलीं तो  पाया
चाँद को ढक  रही  थी
बदली की घनी छाया
पानी में दिख रही थी 
        लरज़ते चाँद की प्रतिछाया... 
नील गगन में चंदा आयेगा बार-बार  
 शिकवे-गिले सुनेगा आशिक़ों की ज़ुबानी,
चंदा सुनेगा आज फिर मेरी वही कहानी।

#रवीन्द्र सिंह यादव  

इस रचना को सस्वर सुनने के लिए YouTube Link-
https://youtu.be/7aBVofXYnN0

सोमवार, 6 नवंबर 2017

वो शाम अब तक याद है.....






वो शाम अब तक याद है 

दर--दीवार पर 

गुनगुनी सिंदूरी धूप खिल रही थी 

नीम के उस पेड़ पर 

सुनहरी  हरी पत्तियों पर 

एक चिड़िया इत्मीनान से 

अपने प्यारे चिरौटा से मिल रही थी 

ख़्यालों में अब अजब 

हलचल-सी  हो रही थी  

धड़कन एक नाम लेने को 

बेताब हो रही थी 

उस रोज़ था मंज़र बड़ा सुहाना  

था तमन्नाओं का पस-मंज़र वही पुराना 

दिल में कसक-सी हो रही थी 

पीछे से आकर आपने 

अपनी नाज़ुक हथेलियों से 

मेरी आँखें जो बंद की थीं 

फुसफुसाकर कान में जो कहा था 

वो लफ़्ज़ अब तक याद है 

वो शाम अब तक याद है 

शाम अब तक याद है 

याद है ..... 

याद है ...... 

© रवीन्द्र सिंह यादव 



VO SHAAM AB TAK YAAD HAI

DAR-O-DEEVAR  PAR

GUNGUNEE  SINDOOREE  DHOOP  KHIL RAHEE  THEE

NEEM KE US PED PAR

SUNAHAREE  HAREE PATTIYON PAR

EK CHIDIYAA ITMEENAAN SE

APNE PYAARE CHIRAUTAA SE MIL RAHEE THEE

KHAYAALON MEN AB AJAB

HALCHAL-SEE HO RAHEE THEE

DHDKAN  EK NAAM LENE KO

BETAAB HO RAHEE THEE

US ROZ THAA MANZAR BADA SUHANAA

THA TAMANNAON KA  PAS-MANZAR VAHEE PURANAA

DIL MEN KASAK-SEE HO RAHEE THEE

PEECHHE SE AAKAR AAPNE

APNEE  NAAZUK HATHELIYON SE

MERI  AANKHEN  JO BAND KI THEEN

PHUSPHUSAAKAR  KAAN MEN JO KAHAA THAA

VO LAFZ AB TAK YAAD HAI

VO SHAAM AB TAK YAAD HAI

SHAAM AB TAK YAAD HAI

YAAD HAI

YAAD HAI......



सूचना -इस रचना को सस्वर सुनने के लिए  YouTube Link-



शब्दार्थ / WORD MEANINGS 

गुनगुनी सिंदूरी धूप = सिंदूर (लालामी ) रंग की सर्दियों में प्रिय लगने वाली हल्की धूप

                                 VERY  LIGHT  WARM  SUNLIGHT  WHICH GIVES  FEEL  
                                                     GOOD. 


दर--दीवार = दरवाज़े और दीवारें / DOORS AND WALLS,  EACH AND EVERY PART  OF  DWELLING.

सुनहरी = सोने जैसे रंग की / का / GOLDEN COLOUR 


इत्मीनान = पूर्ण संतुष्टि के साथ / SATISFACTION 

चिरौटा = पुरुष (नर) चिड़िया, चिड़ा, चिड़वा / MALE SPARROW 

मंज़र = दृश्य / SCENE 

पस-मंज़र = पृष्ठभूमि / BACKGROUND 






रविवार, 5 नवंबर 2017

डाकिया

डाकिया अब भी आता है बस्तियों में 
थैले में नीरस डाक लेकर, 
पहले आता था 
जज़्बातों से लबालब थैले में  आशावान सरस डाक लेकर। 


गाँव से शहर चला बेटा या चली बेटी तो माँ कहती थी -
पहुँचने पर चिट्ठी ज़रूर भेजना 
बेटा या बेटी चिट्ठी लिखते थे 
क़ायदे भरपूर लिखते थे 
बड़ों को प्रणाम 
छोटों को प्यार लिखते थे 
साथ लाये सामान का हाल लिखते थे 
ज़माने की चाल लिखते थे
थोड़ा लिखा बहुत समझना लिखते थे । 



साजन और सजनी भी ख़त लिखते थे 
आशिक़ महबूबा भी ख़त लिखते थे
मित्र-मित्र को प्यारे ख़त लिखते थे 
ख़त आचरण और यादों के दस्तावेज़ बनते थे
कभी-कभी ठोस कारगर क़ानूनी सबूत बनते थे 
डाकिया को  ख़त  कभी न बोझ लगते थे
ख़त पढ़कर सुनाने में महाबोझ लगते थे।


कभी  बेरंग ख़त भी आता था 
पाने वाला ख़ुशी से दाम चुकाता था 
डाकिया सबसे प्यारा सरकारी मुलाज़िम होता था 
राज़,अरमान,राहत,दर्द ,रिश्तों की फ़सलें बोता था  
डाकिया चिट्ठी  तार पार्सल रजिस्ट्री मनी ऑर्डर  लाता था  
डाकिया कहीं ख़ुशी बिखराता कहीं ग़म के सागर लाता था।  


आज भी डाकिया आता है

राहत कम आफ़त ज़्यादा लाता है

पोस्ट कार्ड नहीं रजिस्ट्री ज़्यादा लाता है

ख़ुशियों का पिटारा नहीं

थैले में क़ानूनी नोटिस लाता है। 

#रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / Word  Meanings 

बेरंग ख़त = ऐसा पत्र जो प्रेषक  द्वारा बिना टिकट लगाए या डाकघर में मिलने वाले लिफ़ाफ़े में रखकर न भेजा गया  हो बल्कि सादा  लिफ़ाफ़े में भेजा गया हो जिसे पाने वाला टिकट का दुगना दाम चुकाकर प्राप्त करता था।  समय और पैसे की कमी के चलते ऐसा किया जाता था / A  Without  Ticket  Letter

तार = आपातकालीन या ख़ुशी की सूचना अति शीघ्र पहुँचाने के लिए यह संचार सुबिधा बड़े डाकघरों में सुबह 8 बजे से रात्रि 9  बजे तक उपलब्ध होती थी।  27 शब्दों का शुल्क 50 रुपये लिया जाता था इस सुबिधा के 163 साल चलने के बाद 15 जुलाई 2013 को समापन के वक़्त / Telegram  

बुधवार, 1 नवंबर 2017

100 के आगे 100 के पीछे

आइये कुछ आँकड़ों पर विचार करें, 

आपस में आज बातें दो-चार करें।  

विश्व  बैंक  की  रिपोर्ट  आई  है, 

सरकार के लिए ख़ुशियाँ लाई है, 

"ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस" में भारत को, 

100 वां स्थान मिल गया है,

हमारा तो दिमाग़ हिल गया है।  


ज़ीरो की ओर बढ़ने वाला देश, 

श्रेष्ठता की ओर बढ़ता है, 

व्यापार में कठिनाइयों का दौर घटता है, 

2016 में 130 वां स्थान था, 

2015 में 131 वां स्थान था। 


अब देखते हैं दूसरा दृश्य,

समझिए  इसका भी रहस्य- 

इंटरनेशनल  फ़ूड पॉलिसी रिसर्च ने, 

"ग्लोबल हंगर इंडेक्स" ज़ारी किया है, 

हमारे  मन   पर  बोझ  भारी  किया है, 

भारत  को  100 वां  स्थान  मिला  है, 

भुखमरी की न किसी से कोई गिला है, 

ज़ीरो की ओर बढ़ने वाला देश, 

भुखमरी पर जीत  की  ओर  बढ़ता  है, 

जीवन में दुश्वारियों का दौर  घटता  है, 

2016 में 97 वां स्थान था, 

हालात सुधरने का गुमान था। 


व्यापार में  सुगम सुविधा-सुधार के लिए, 

30 अंकों की बेशर्म सकारात्मक वृद्धि!

भूख और कुपोषण  से  लड़ने की  हमारी  संवेदना  में 

3 अंकों  की नकारात्मक वृद्धि!! 

एक और सर्वे आया है- 

50 प्रतिशत लोगों ने रिश्वत देकर सरकारी कार्य करवाया है। 

कैसा राष्ट्रीय चरित्र विकसित हो रहा है...?

हमारा मानस कहाँ  सो  रहा है ...?

ज़रा सोचिए...!

ठंडे दिमाग़ से,

क्या मिलेगा?

भावी पीढ़ियों को, 

कोरे सब्ज़बाग़ से...!   

#रवीन्द्र सिंह यादव 

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

ब्लॉग का एक वर्ष मुकम्मल हुआ

              कल (28-10-2017)   "हिंदी आभा*भारत" ब्लॉग का एक वर्ष मुकम्मल हुआ। उपलब्धियों के नाम पर ज़्यादा कुछ नहीं है बताने के लिये, बस इतना ही ब्लॉगिंग ने मुझे नई दिशा दी है लेखन में निखार लाने हेतु। इससे पहले लेखन आकाशवाणी और दैनिक समाचार-पत्रों के लिये  चलता रहा।  2012 से  ऑनलाइन समाचार पत्रों में लिखना आरम्भ किया। 2014 के बाद समाचार-पत्रों के कंटेंट में आश्चर्यजनक बदलाव आया। मैं जिस समाचार-पत्र समूह में सक्रिय रहा वहाँ मुझे हतोत्साहित किया जाने लगा फिर भी लिखता रहा। ब्लॉगिंग के बारे में सुनता रहता था लेकिन यह कैसे आरम्भ किया जाता है इसका ज्ञान नहीं था। लेकिन मेरे भीतर बेचैनी बढ़ती गयी और एक दिन गूगल सर्च में ब्लॉगर डॉट कॉम के बारे में पढ़ा तो कुछ समझ आया कि ब्लॉग कैसे तैयार होता है।

          अंततः ब्लॉग तैयार हो गया 
( https://hindilekhanmeridrishti.blogspot.com) जिसको नाम दिया  "हिंदी आभा*भारत।" पहली रचना "नई सुबह" पोस्ट की। सब कुछ सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। ब्लॉग पर फीचर्स जोड़े। अगले दिन ब्लॉग का डैश बोर्ड (ब्लॉगर) पेज़ देखा। "आँकड़े" को क्लिक किया तो पेज़ देखे जाने की संख्या दिखायी दी फिर "ऑडिएंस" को क्लिक करने पर उन देशों के नाम आये जहाँ रचना पढ़ी गयी। इतना जानकर उत्साह बढ़ता ही चला गया लेकिन एक अपरिचित दुनिया में अपने लिये स्थान बनाना असंभव-सा  लग रहा था। कुछ टिप्पणियाँ आना शुरू हुईं। मनोबल और बढ़ा। 

          नई सुबह, आशा, बहुरुपिया, लकड़हारा, बादल आवारा,
आज जलंधर फिर आया है..., आजकल  रचनाएँ पोस्ट कीं।
 सर्वाधिक ख़ुशी का क्षण उस वक़्त आया जब चर्चित लोकप्रिय ब्लॉग "उलूक टाइम्स" के ज़रिये अपनी धारदार व्यंगात्मक रचनाओं से धूम मचाने वाले प्रतिष्ठित वरिष्ठ  ब्लॉगर आदरणीय प्रोफ़ेसर (डॉ.) सुशील कुमार जोशी जी ने आशीर्वाद स्वरुप मेरी रचना पर लिखा "सुंदर"। जब मैंने उनका ब्लॉग देखा और पढ़ा तो आश्चर्य में डूब गया कि इतने वरिष्ठ ब्लॉगर ने मेरी रचना को  नोटिस किया और मनोबल बढ़ाया। बाद में उन्होंने मुझे प्रोत्साहित करते हुए अन्य ब्लोगर्स के ब्लॉग पर टिप्पणी लिखने हेतु मार्गदर्शन दिया और उनके आशीर्वाद व स्नेह ने मुझमें नई ऊर्जा भर दी।
         
            एक माह पूरा होने पर अचानक हलचल पैदा हुई जब आदरणीय कुलदीप ठाकुर जी ने 28-12 -2016 को प्रकाशित मेरी रचना "कल और आज" का चयन 29-12-2016  के "पाँच लिंकों का आनन्द" के अंक हेतु किया।  सूचना पाकर मन आल्हादित हुआ और इस प्रतिष्ठित ब्लॉग पर आकर उत्कृष्ट रचनाओं का संग्रह मिला, साथ ही सीखने को मिला कि ब्लॉग को कैसे सजाया जाता है। उसके बाद इस ब्लॉग पर मुझे निरंतर मौक़े मिलते रहे और एक समय ऐसा आया जब आदरणीया यशोदा अग्रवाल जी ने पहले मुझे पाठक की पसंद के अंतर्गत अपनी पसंदीदा रचनाएँ "पाँच लिंकों का आनन्द"  ब्लॉग पर प्रस्तुत  करने का अवसर दिया और बाद में इस प्रतिष्ठित ब्लॉग का चर्चाकार भी बना दिया।

           दुर्घटना - मार्च 2017 में ब्लॉग के लिए डोमेन गूगल से ख़रीदा।  डोमेन इंस्टाल करते हुए 7 अप्रैल 2017 को ब्लॉग से पिछली सारी टिप्पणियाँ विलुप्त हो गयीं। ब्लॉग की तरह मन भी सूना हो गया तब सर्वप्रथम आदरणीया मीना  शर्मा जी ने मनोबल बढ़ाया और ब्लॉग फिर से टिप्पणियों से भरने लगा।

             इस यात्रा में सर्व आदरणीय जनों  दिगंबर नासवा जी, राजेश कुमार राय जी, जयंती प्रसाद शर्मा जी, अमित अग्रवाल जी, विभा रानी श्रीवास्तव जी, यशोदा अग्रवाल जी, दिग्विजय अग्रवाल जी, राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही" जी, सुधा देवरानी जी, विश्वमोहन जी,श्वेता सिन्हा जी, ज्योति देहलीवाल जी, रेणुबाला जी, ध्रुव सिंह "एकलव्य" जी, पम्मी सिंह जी, कविता रावत जी, जमशेद आज़मी जी, हर्षवर्धन जोग जी, सतीश सक्सेना जी, डॉ. रूप चंद शास्त्री "मयंक"जी, डॉक्टर जैनी शबनम जी, शुभा मेहता जी, एम. रंगराज अयंगर जी, विनोद शर्मा जी, विरेश कुमार जी, तुषार रोहिल्ला जी,ऋतु असूजा जी, अर्चना जी, पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा जी, विभा ठाकुर जी, कैलाश शर्मा जी, सुधा सिंह जी, दीपक भारद्धाज जी, देव कुमार जी, अपर्णा बाजपेयी जी, अभिलाषा अभि जी, मीना भारद्धाज जी, दिव्या अग्रवाल जी, लोकेश नशीने जी, हर्षवर्धन श्रीवास्तव जी, अमित जैन "मौलिक" जी, डॉक्टर इंदिरा गुप्ता जी, रिंकी रावत जी, नीतू ठाकुर जी, शकुंतला शकु जी,पुष्पेंद्र द्धिवेदी जी और  आनंद जी  आदि का भरपूर सहयोग एवं समर्थन मिल रहा है। जो नाम छूट गये  हैं उनसे सादर क्षमा चाहता हूँ।

         फिलहाल अपने समस्त ब्लॉगर साथियों एवं वरिष्ठ रचनाकारों का हार्दिक आभार। समस्त सुधिजनों का हार्दिक आभार जिन्होंने  ब्लॉग पर आकर रचना का वाचन किया और टिप्पणियों के द्वारा प्रोत्साहन दिया।
सादर।

@रवीन्द्र सिंह यादव


मेरे अन्य ब्लॉग -

हमारा आकाश:शेष-विशेष
https://ravindrasinghyadav.wordpress.com


चैनल : मेरे शब्द-स्वर (YouTube.com)

@रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

यादें

यादों का यह  कैसा जाना-अनजाना सफ़र है, 

भरी फूल-ओ-ख़ार से आरज़ू की रहगुज़र है। 



रहनुमा हो  जाता  कोई, 


मिल जाते हैं हम-सफ़र,


रौशनी बन  जाता  कोई,


हो  जाता   कोई   नज़र,


ऐसी लगन बेताबियों की,


हो जाता कोई दर-ब-दर है।



याद   धूप   है  याद  ही  छांव  है,


तड़प-ओ-ख़लिश का एक गांव है, 


याद  रात   है  याद  ही   दिन  है,


न फ़लक़-ज़मीं पर होता  पांव है,


हिय में  हूक  होती  है  पल-पल,


बस बेक़रारी में चश्म-ए-तर  है। 



सुध  न  तन  की  न  ही मन की,


तसव्वुर में रहती  तस्वीर उनकी,


ठौर-ए-वस्ल ताजमहल लगता है,


आब-ए-चश्म गंगाजल लगता है,


बे-ख़ुदी में रहती किसे क्या ख़बर,


कब शब हुई  कब आयी सहर  है। 



दौर-ए-ग़म  में  भाता  नहीं  मशवरा,


लगता ज्यों चाँदनी रात में हो बारिश,


आये हवा उनके दयार की तो लगता है,


छिपा  है  इसमें  संदेशा और सिफ़ारिश,


ज़माने   की   लाख  बंदिशें   तोड़ने,


बार-बार दिल  में उठती एक लहर है।   


© रवीन्द्र सिंह यादव 




शब्दार्थ /WORD  MEANINGS


फूल-ओ-ख़ार= फूल और काँटे / FLOWERS AND  THORNS

आरज़ू = इच्छा, ख़्वाहिश,चाहत, मनोकामना / DESIRE,WISH

रहगुज़र= राह, रास्ता, मार्ग, पथ / WAY, PATH, ROAD

रहनुमा= पथ-प्रदर्शक, राह दिखने वाला / LEADER, GUIDE

हम-सफ़र= साथी, साथ चलने वाला  / FELLOW,TRAVELER

बेताबियों= बेचैनी / RESTLESSNESS

दर-ब-दर = द्वार-द्वार भटकना / BANISHED, EXPELLED

तड़प-ओ-ख़लिश = छटपटाहट और व्यग्रता,बेचैनी,क़ोफ़्त / TORMENT AND  UNEASE

फ़लक़-ज़मीं = आसमान और धरती / SKY AND EARTH

हिय = ह्रदय, उर, दिल / HEART

हूक = ह्रदय में यकायक उठने वाली कसक या पीड़ा /
           PANG, PAINFUL EMOTION

बेक़रारी = बेचैनी, बेताबी / RESTLESSNESS, UNEASE

चश्म-ए-तर = आंसूभरी आँख (आँखें ), डबडबाई आँख / 
                       EYES  FILLED  WITH  TEARS

तसव्वुर = कल्पना, ख़याल/ ख़्याल / IMAGINATION, CONCEPTION

ठौर-ए-वस्ल = मिलन का स्थान, ठिकाना / 
                       PLACE OF  UNION,  MEETING

आब-ए-चश्म = आँखों का पानी, आंसू , अश्क़ / TEARS

बे-ख़ुदी = ख़ुद से बे-ख़बर, अपने आपको भूल जाना, आत्मविस्मित /  INTOXICATION

शब = रात, रात्रि, यामिनी, निशा  / NIGHT

सहर = सुबह  / MORNING

दौर-ए-ग़म = ग़म का दौर, दुखदाई समय / 
                     PERIOD OF SORROW

मशवरा = राय, सलाह / CONSULTATION

दयार = इलाक़ा, क्षेत्र / 
             TERRITORY, REGION

बंदिशों = रोक, प्रतिबंधों, रुकावटों / 
                STOPPAGE, CLOSURE 

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जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...