शनिवार, 21 अप्रैल 2018

तस्वीर

वर्षों से दीवार पर टंगी 

तस्वीर से 

धूल साफ़ की 

आँखों में 

करुणा की कसक 

हया की नज़ाकत 

मुस्कान के पीछे 

छिपा  दर्द 

ये आज भी फीके कहाँ  

चीज़ों की उम्र होती है 

प्रेम की कहाँ 

लेकिन आँखों ने 

इशारों में कहा है 

अब प्रेम का दायरा 

सिकुड़ता जा रहा है। 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

सुमन और सुगंध

सुगंध साथ सुमन के 

महकती 

ख़ुशी से रहती है, 

ये ज़ंजीर न बंधन के 

चहकती 

ख़ुशी से रहती है। 

फूल खिलते हैं 

हसीं रुख़ देने 

नज़ारों को,  

तितलियाँ 

आ जाती हैं 

बनाने ख़ुशनुमा 

बहारों को। 

कभी  ढलकता है 

कजरारी आँख से 

उदास  काजल, 

कहीं रुख़ से 

सरक जाता है 

भीगा आँचल। 

परिंदे भी आते हैं  

ख़ामोश चमन में 

पयाम-ए-अम्न लेकर, 

न लौटा कभी 

गुलिस्तान  से 

भारी मन लेकर।  

#रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दार्थ / WORD  MEANINGS 

सुगंध = महक, ख़ुशबू / FRAGRANCE 

सुमन = पुष्प , फूल / FLOWER 

ज़ंजीर= साँकल ,शृंखला / CHAIN 

,हसीं = सुन्दर ,ख़ूबसूरत / BEAUTIFUL 

कजरारी आँख = आँख जिसमें काजल लगा हो , काजलयुक्त आँख / EYE WITH KOHL 

रुख़ = चेहरा ,दृटिकोण , चेहरे पर नज़र आने वाला भाव, दिशा  /  FACE , APPEARANCE, DIRACTION  

चमन = बाग़/  FLOWER GARDEN  

पयाम-ए-अम्न= शान्ति का सन्देश / MESSAGE OF PEACE 

गुलिस्तान= बाग़ / FLOWER GARDEN 

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

मच्छर ने हवाई-यात्री को काटा !

समाचार आया है -
हवाई जहाज़ में 
मच्छर ने यात्री को काटा !
सनसनी-ख़ेज़ समाचार / ब्रेकिंग न्यूज़  
तब भी बनता 
जब हम पढ़ते- 
मच्छर को हवाई-यात्री ने काटा !!
मच्छर तुम कितने भाग्यवान हो 
सचमुच तुम बड़े बलवान हो 
साथ में भोले और नादान हो 
ख़तरों से अनजान हो 
लगता है तुम 
ग़रीबों का ख़ून पीते-पीते अघाये हो 
इसलिए उड़कर एयर-पोर्ट तक आये हो 
शायद  तुम्हें अपनी जान प्यारी नहीं 
भ्रम  है  तुम्हारा 
तुम्हें निबटाने की यहाँ कोई तैयारी नहीं 
मासूमों पर बर्बर अत्याचार 
गैंग रेप 
हत्या
भ्रष्टाचार
भूख से मौत
पुलिस-अत्याचार 
सरकारी भेदभाव  
बेकारी का फैलाव 
ज़हरीली हो रही दमघोंटू  हवा 
दहशत-नफ़रत घुली  आब-ओ-हवा 
अनिश्चित भविष्य से व्यथित युवा 
सरकारी अस्पतालों से  ग़ायब दवा 
क़र्ज़ से घबराकर मरते किसान 
अघोषित युद्ध की क़ीमत चुकाते जवान  
  लोकहितकारी ख़बर
दबा दी जाती है 
हवाई यात्री को 
मच्छर काटने की ख़बर 
सुर्ख़ियाँ बना दी जाती है। 
हम यह ख़बर 
बड़े चाव से पढ़ते हैं 
ख़बर के बग़ल में छपे विज्ञापन 
हमारी जेब पर बहुत भारी पड़ते हैं। 
#रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

पुस्तक समीक्षा ..."चीख़ती आवाज़ें"

                                         

शीर्षक "चीख़ती आवाज़ें"
विधा- कविता (काव्य संग्रह )
कवि - ध्रुव सिंह "एकलव्य"
प्रकाशक- प्राची डिजिटल पब्लिकेशन, मेरठ  

ISBN-10: 9387856763

ISBN-13: 978-9387856769

ASIN: B07BHSKXSR

मूल्य - 110 रुपये 
पृष्ठ संख्या - 102 
बाइंडिंग - पेपरबैक 
भाषा - हिन्दी 



पुस्तक प्राप्ति हेतु  लिंक्स : 

  amazon.in  
                                    


                                  
   Prachi Digital Publication 
                                   
 Snapdeal




             सामाजिक चेतना के मुखर कवि ध्रुव सिंह "एकलव्य" जी का प्रथम काव्य संग्रह "चीख़ती आवाज़ें" हाथ में आया। सर्वप्रथम ध्रुव जी को प्रथम काव्य संग्रह के प्रकाशन पर बधाई। पुस्तक की साज-सज्जा आकर्षक है। मुखपृष्ठ पर चीख़ती आवाज़ों का रेखांकन अर्थपूर्ण है। पुस्तक का शब्द-शिल्प क़ाबिल-ए-तारीफ़ है जो कवि का यथार्थवादी एवं प्रत्यक्षवादी  दृष्टिकोण उभारने में सक्षम रहा है।  

         पुस्तक में आरम्भ से अंत तक बिषयक गंभीरता का प्राधान्य है। ध्रुव जी एक कवि होने के साथ-साथ कुशल व्यंगकार, कहानीकार,चित्रकार एवं नाट्य कलाकार भी हैं। जब एक कलाकार में विद्रोह का स्वर मुखरित होता है तो सम्वेदना की मख़मली ज़मीन पर सुकोमल एहसास जीवन को रसमय बनाते हैं और पात्र जीवंत हो उठते हैं। 
        कविता "अनुत्तरित" में  असहाय,लावारिस जीवन की विवशताओं और लाचारी की झलक कवि के शब्दों में - 
"मार दिए थे उसने 
दो झापड़,
लावारिस हूँ
कहके। 
एक चीख़ती आवाज़ 
चीरने लगी थी 
प्लेटफार्म पर पसरे 
सन्नाटे को।"  

        "ख़त्म होंगी मंज़िलें" कविता में  आज के सुलगते हुए सवाल की आँच हमें भी झुलसाती है - 

"मंज़िलों पर मंज़िलें
मंज़िलों के वास्ते
फुटपाथ पर पड़े हम
ज्ञात नहीं
कब आयेंगी ?
वे मंज़िलें
चप्पल उतारकर ,धुले हुए
क़दमों को आराम दूँगा !"  
    किसान को अपनी लहलहाती फ़सल से अगाध प्रेम होता है जिसे वह अपनी औलाद की भांति स्नेह करता है। एक रचना फ़सल का मानवीकरण करती हुई -
"मौसमों के प्यार ने बड़ी ज़्यादती की
लिटा दिया
मेरे अधपके बच्चों को 
खेतों में मेरे"

    रिश्तों में गुथे हुए समाज की बिडम्बनाएं कवि को विचलित करती हैं और दर्द उभर आता है लेखनी में -
"बिना खाए सो गई
फिर आज
'मुनिया' नन्हीं हमारी
चलो ! मेरी क़िस्मत ही फूटी"

     बेघर और जीवन की मूलभूत सुबिधाओं से वंचित व्यक्ति के भीतर भी स्वाभिमान पनपता है - 
"ख़्याल रखना !
उस नीम का
नवाब साहब के आँगन में
लगा है।"

      नारी स्वतंत्रता,शिक्षा और सशक्तिकरण भले ही आज के सर्वाधिक चर्चित जुमले हों किन्तु ग़ौर कीजिये कवि की नज़र कहाँ ठहर गयी है -
"वो घर था !
एक खूँटी से बंधी थी
ड्योढ़ी की सीमा
खींच दी कहकर
मेरी लक्ष्मण रेखा
यौवन आने तक।" 

       ग़ुर्बत में जीने वालों की ज़िन्दगी खटमल को भी सुबिधा और सहूलियत वाली सिद्ध होती है। खटमल को अपना शिकार तलाशने के लिए ज़्यादा श्रम नहीं करना पड़ता।   कविता "खटमल का दर्द" सामाजिक असमानता के विकराल स्वरुप पर धारदार कटाक्ष करती है -  
"खटमल को शायद 
आदमी पसंद हैं 
और  वो भी 
फ़ुटपाथ के !"

      स्त्री जीवन की विवशताओं को कवि का संवेदनशील ह्रदय कुछ इस प्रकार बयां करता है-
इच्छायें उड़ानों की ऊँची 
बुनती हुई 
सूख चले नेत्रों में 
कंपित होठों पर 
गुम हुई 
आवाज़ भी है 
वो प्यासी आज भी है। 
    ग्रामीण जीवन की झांकी प्रस्तुत करती एक रचना में वात्सल्य और ममता से भरा एक माँ का आँचल कितना विशाल होता है।  कवि के शब्दों में -
प्रसन्न थे हम दिन-प्रतिदिन
खो रही थी वो
हमें प्रसन्न रखने के
जुगाड़ में। 
       प्रस्तुत संग्रह की रचनाओं में कवि ने आँचलिकता को उभरने का भरपूर मौक़ा दिया है। ग्रामीण जीवन के आरोह-अवरोह कवि ने बड़ी शिद्दत के साथ उभारे हैं। विवशता और लाचारी के गंवई पात्र "बुधिया" के माध्यम से कवि ने सामाजिक मूल्यों के ह्रास पर प्रभावशाली हस्तक्षेप किया है- 
मेहनत बिन 
ले जायेंगे हमको 
हाथों से हमारे 
पालनहार के 
जिसे हम 'बुधिया' 
बाबा कहते हैं। 

         समग्र दृष्टि में संग्रह की समस्त रचनाऐं "चीख़ती आवाज़ें" शीर्षक को असरदार बनाती  हुई कवि के सटीक चिंतन की प्रतिनिधि रचनाऐं हैं। 
कवि ध्रुव सिंह "एकलव्य" जी का शब्दशिल्प अपने आप में अनौखा है जिसमें मौलिकता सहज ही छलक पड़ती है। रचनाओं में जिन पात्रों का चयन किया गया है वे हमें रोज़मर्रा के जीवन में कहीं न कहीं टकरा ही जाते हैं। कवि का मानवीय दृष्टिकोण करुणा से ओतप्रोत है जो समाज के समक्ष विनीत भाव से आग्रह करता है कि ये आवाज़ें अब अनसुनी न की जायें बल्कि इनमें बसी पीड़ा और मर्म को महसूस किया जाय और इन्हें उबारने का मार्ग प्रशस्त किया जाय।  
         सभी रचनाओं का उल्लेख संक्षिप्त समीक्षा में हो पाना मुश्किल होता है।  42 कविताओं के इस संग्रह में भाषा के प्रति कवि की सजगता स्पष्ट झलकती है। कविताओं में तत्सम,तद्भव, विदेशज, आंचलिक, स्थानीय एवं उर्दू  शब्दों का प्रयोग काव्य की व्यापकता एवं ख़ूबसूरती में वृद्धि करता हुआ सटीक बन पड़ा है। अधिकांश कविताऐं मुक्त छंद में लिपिबद्ध हैं। 
            समाज का उपेक्षित तबका आये दिन हमारे समक्ष दुरूह चुनौतियों का सामना करता है। किसान, मज़दूर, स्त्री के विविध रूप, भिखारी, वैश्या, सपेरा,सब्ज़ीवाली, मेहनत-कश कामगार,बेघर  आदि की आवाज़ को मर्मस्पर्शी लहज़े में शब्दांकित करती है पुस्तक "चीख़ती आवाज़ें"
           कवि का प्रगतिशील एवं प्रयोगवादी दृष्टिकोण और तेवर कविताओं में बख़ूबी झलकता है। एक उभरते कवि ने अपना परिचय सामाजिक मूल्यों की सार्थक चर्चा के साथ दिया है। ध्रुव जी को पुस्तक की सफलता हेतु एवं उज्जवल भविष्य की मंगलकामनाऐं। हम उम्मीद करते हैं ध्रुव जी अपनी धारदार लेखनी से साहित्य क्षेत्र  में भरपूर योगदान करते रहेंगे।साहित्याकाश में ध्रुव तारे की भांति चमकते रहें। 

- रवीन्द्र सिंह यादव 
7 अप्रैल 2018 
नई दिल्ली / इटावा     

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

कीलों वाला बिस्तर



बैंक के आगे न सोये बेघर इसलिए लगवाई थी कील, विरोध के बाद वापस लिया फैसला
चित्र साभार : दैनिक भास्कर


शायरों, कवियों की कल्पना में 

होता था काँटों वाला बिस्तर, 

चंगों ने बना दिया है अब 

भाले-सी कीलों वाला 

रूह कंपाने वाला बिस्तर।  


अँग्रेज़ीदां लोगों ने इसे 

ANTI  HOMELESS  IRON  SPIKES कहा है,

ग़रीबों ने अमीरों की दुत्कार को 

ज़माना-दर-ज़माना सहजता से सहा है।     


महानगर मुम्बई में 

एक निजी बैंक के बाहर 

ख़ाली पड़े फ़र्श को 

पाट दिया गया

लम्बी लोहे की 

नुकीली कीलों से 

बनवाया गया 

कीलों वाला बिस्तर,  

ताकि बेघर रात को 

न सो पायें 

हो जायें छू-मंतर । 


गन्दगी गलबहियाँ ग़रीबों  के  डालती  है, 

विपन्नों से दूरी और घृणा अमीरी स्वभावतः पालती है। 


निजी बैंक 

अमीर ग्राहक के स्वागत में  

रेड कारपेट बिछाते  हैं, 

दीन-हीन व्यक्ति के प्रति जीभर के  

संवेदनशून्यता   छलकाते हैं।   


नमन उस जज़्बाती इंसान को 

जो मुद्दे को 

सोशल मीडिया में लाया, 

शर्मिंदगी झेलकर बैंक ने 

कीलों वाला फ़्रेम हटवाया।  


मुख्यधारा मीडिया भी 

अपनी मानसिकता पर ज़रा शर्माया  

नुकीला बिस्तर बनने का न सही 

हटने का समाचार तो लाया। 


ज़रा सोचिये 

कोई अमीर भी  

फिसलकर

डगमगाकर  

इन कीलों पर गिर सकता था......... ! 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 31 मार्च 2018

क्रोध


मन में 

दशकों से 

दबे हुए 

क्रोध को 

आजकल 

सडकों पर 

भीड़ बनकर 

चाहतों के शहर 

ख़्वाबों की गलियाँ 

विध्वंस करते हुए 

निकाला जा रहा है।  

मनुष्य को ईश्वर ने 

औरों की पीड़ा महसूसने 

ज़मीर को जाग्रत रखने..... 

दिल दिया 

समझने सांसारिक-खेल  

जीवन को बेहतर बनाने 

दिमाग़ भी दे दिया 

फिर क्यों रख देता है 

मनुष्य 

अपना दिल-ओ-दिमाग़ 

गिरवी 

किसी धूर्त की चौखट पर.....?  

और पलभर में 

तत्पर हो जाता है 

अराजक दंगाई बनने। 

आम लोग होते हैं तबाह

किसी की होती है पौ-बारह   

घायलों, पीड़ितों की चीत्कार 

दिल की सूनी कोठरी में 

कभी तो सुनाई देगी 

तब तक 

बहुत देर हो चुकी होगी......!

# रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 24 मार्च 2018

बर्फ़


सुदूर पर्वत पर

बर्फ़ पिघलेगी

प्राचीनकाल से बहती

निर्मल नदिया में बहेगी

अच्छे दिन की

बाट जोहते 

किसान के लिए

सौग़ात बन जायेगी

प्यासे जानवरों का

गला तर करेगी

भोले पंछियों की 

जलक्रीड़ा में 

विस्तार करेगी 

लू के थपेड़ों की तासीर

ख़ुशनुमा करेगी

एक प्यासा बूढ़ा

अकड़ी अंजुरी में

भर पी जायेगा

जब बर्फ़ीला पानी

निकलेगी एक आह

कहते हुए -

आ रही है

मज़लूम  बर्फ़ 

रिहा होकर 

ज़ालिम के हाथ से

जा रही है 

विलय होने 

नदिया समुन्दर में 

अपना अस्तित्व खोने !

 बदलते रहेंगे मौसम 

फिर-फिर जमेगी बर्फ़ 

सजते रहेंगे ख़्यालात  

हर्फ़-दर-हर्फ़..!! 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 14 मार्च 2018

किसान के पैरों में छाले


सरकारी फ़ाइल में

रहती है एक रेखा,

जिनके बीच खींची गई है

क्या आपने देखा...?


सुनाने संवेदनाविहीन सत्ता के केंद्र को

अपनी जाएज़ आवाज़ 

चलते हैं किसान पैदल 180 किलोमीटर,

चलते-चलते घिस जाती हैं चप्पलें

डामर की सड़क बन जाती है हीटर। 


सत्ता के गलियारों तक आते-आते

घिसकर टूट जाती हैं चप्पलें

घर्षण से तलवों में फूट पड़ते हैं फफकते फफोले

सूज जाते हैं फटी बिवाइयों से भरे पावन पाँव,

रिसते हैं रह-रहकर छलछलाए छाले

मायानगरी की दहलीज़ पर

जहाँ उजड़ चुके हैं संवेदना के गाँव।


छह दिवस पथिक पैदल चले

पचास हज़ार ग़रीब किसान,

हौसला हो या दूसरों की परवाह

आंदोलन में शांति और अनुशासन के

छोड़ गए गहरे निशान।


हमने देखा उम्मीद मरी नहीं है

मुम्बईकर निकले घरों से

खाना-पानी और चप्पलें लेकर

लोग सिर्फ़ सेलिब्रिटीज़ को ही टीवी पर देखना चाहते हैं

तोड़ा भरम राष्ट्रीय मीडिया को नसीहत देकर।


सोई सरकार की नींद खुली

सभी माँगें स्वीकार कर लीं

पीड़ा के पाँवों पर मरहम लगाया

बेबस हो विशेष ट्रेन से

किसानों को घर भिजवाया।

© रवीन्द्र सिंह यादव


शुक्रवार, 9 मार्च 2018

मूर्ति

सोचता हूँ 
गढ़ दूँ 
मैं भी अपनी 
मिट्टी की मूर्ति, 
ताकि होती रहे 
मेरे अहंकारी-सुख की क्षतिपूर्ति। 

मिट्टी-पानी का अनुपात 
अभी तय नहीं हो पाया है, 
कभी मिट्टी कम 
तो कभी पर्याप्त पानी न मिल पाया है। 

जिस दिन मिट्टी-पानी का 
अनुपात तय हो जायेगा, 
एक सुगढ़ निष्प्राण 
शरीर उभर आयेगा। 

कोई क़द्र-दां  ख़रीदार भी होगा 
रखेगा सहेजकर, 
जहाँ पहुँचता न हो  दम्भी हथौड़ा 
मूर्तिभंजक नफ़रत का घूँट पीकर ..!   
#रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

होली की कथा


हमारी पौराणिक कथाऐं कहती हैं 

होली की कथा निष्ठुर ,

एक थे भक्त प्रह्लाद 

पिता  जिनका हिरण्यकशिपु  असुर। 


थी उनकी बुआ होलिका 

थी ममतामयी माता कयाधु ,

दैत्य कुल में जन्मे  

चिरंजीवी प्रह्लाद साधु। 


ईश्वर भक्ति से हो जाय विचलित प्रह्लाद 

पिता ने किये नाना प्रकार के उपाय, 

हो जाय जब विद्रोही बेटा 

बाप को पलभर न सुहाय। 


थे बाप-बेटे में  मतभेद भारी 

कहता बाप स्वयं को भगवान् , 

रहे झेलते यातनाऐं प्रह्लाद सदाचारी   

अनाचार को नहीं की मान्यता प्रदान। 

  

रार ज़्यादा ठनी जब

ख़्याल अपना लिया भयंकर हिरण्यकशिपु ने,

बुलाया बहन होलिका को 

प्रह्लाद को मारने। 



ब्रह्मा जी ने दिया  था  

होलिका को  वरदान, 

आग तुम्हें न जला सकेगी 

जब करोगी कार्य महान।  


लेकर बैठ गयी ज़बरन  प्रह्लाद को  चिता  पर 

छीनकर माँ से उसके दुलारे को ,

माँ चीख़ती रही बे-बस 

खोला होलिका ने दुष्टता के पिटारे को। 


नाम लेते रहे प्रह्लाद प्रभु का  

भस्म हो गयी होलिका,

बचा  न सका वरदान भी 

होता नहीं यत्न कोई प्रमाद की भूल का। 


सकुशल निकले भक्त प्रह्लाद  

प्रचंड चिताग्नि से 

आओ होली मनाऐं भर-भर उल्लास 

विमुक्त हों चिंताग्नि से। 


आओ जला दें आज अहंकार अपने 

खोल दें  उमंगों को जीभर मचलने।  

# रवीन्द्र सिंह यादव 

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...