सोमवार, 2 अप्रैल 2018

कीलों वाला बिस्तर



बैंक के आगे न सोये बेघर इसलिए लगवाई थी कील, विरोध के बाद वापस लिया फैसला
चित्र साभार : दैनिक भास्कर


शायरों, कवियों की कल्पना में 

होता था काँटों वाला बिस्तर, 

चंगों ने बना दिया है अब 

भाले-सी कीलों वाला 

रूह कंपाने वाला बिस्तर।  


अँग्रेज़ीदां लोगों ने इसे 

ANTI  HOMELESS  IRON  SPIKES कहा है,

ग़रीबों ने अमीरों की दुत्कार को 

ज़माना-दर-ज़माना सहजता से सहा है।     


महानगर मुम्बई में 

एक निजी बैंक के बाहर 

ख़ाली पड़े फ़र्श को 

पाट दिया गया

लम्बी लोहे की 

नुकीली कीलों से 

बनवाया गया 

कीलों वाला बिस्तर,  

ताकि बेघर रात को 

न सो पायें 

हो जायें छू-मंतर । 


गन्दगी गलबहियाँ ग़रीबों  के  डालती  है, 

विपन्नों से दूरी और घृणा अमीरी स्वभावतः पालती है। 


निजी बैंक 

अमीर ग्राहक के स्वागत में  

रेड कारपेट बिछाते  हैं, 

दीन-हीन व्यक्ति के प्रति जीभर के  

संवेदनशून्यता   छलकाते हैं।   


नमन उस जज़्बाती इंसान को 

जो मुद्दे को 

सोशल मीडिया में लाया, 

शर्मिंदगी झेलकर बैंक ने 

कीलों वाला फ़्रेम हटवाया।  


मुख्यधारा मीडिया भी 

अपनी मानसिकता पर ज़रा शर्माया  

नुकीला बिस्तर बनने का न सही 

हटने का समाचार तो लाया। 


ज़रा सोचिये 

कोई अमीर भी  

फिसलकर

डगमगाकर  

इन कीलों पर गिर सकता था......... ! 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 31 मार्च 2018

क्रोध


मन में 

दशकों से 

दबे हुए 

क्रोध को 

आजकल 

सडकों पर 

भीड़ बनकर 

चाहतों के शहर 

ख़्वाबों की गलियाँ 

विध्वंस करते हुए 

निकाला जा रहा है।  

मनुष्य को ईश्वर ने 

औरों की पीड़ा महसूसने 

ज़मीर को जाग्रत रखने..... 

दिल दिया 

समझने सांसारिक-खेल  

जीवन को बेहतर बनाने 

दिमाग़ भी दे दिया 

फिर क्यों रख देता है 

मनुष्य 

अपना दिल-ओ-दिमाग़ 

गिरवी 

किसी धूर्त की चौखट पर.....?  

और पलभर में 

तत्पर हो जाता है 

अराजक दंगाई बनने। 

आम लोग होते हैं तबाह

किसी की होती है पौ-बारह   

घायलों, पीड़ितों की चीत्कार 

दिल की सूनी कोठरी में 

कभी तो सुनाई देगी 

तब तक 

बहुत देर हो चुकी होगी......!

# रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 24 मार्च 2018

बर्फ़


सुदूर पर्वत पर

बर्फ़ पिघलेगी

प्राचीनकाल से बहती

निर्मल नदिया में बहेगी

अच्छे दिन की

बाट जोहते 

किसान के लिए

सौग़ात बन जायेगी

प्यासे जानवरों का

गला तर करेगी

भोले पंछियों की 

जलक्रीड़ा में 

विस्तार करेगी 

लू के थपेड़ों की तासीर

ख़ुशनुमा करेगी

एक प्यासा बूढ़ा

अकड़ी अंजुरी में

भर पी जायेगा

जब बर्फ़ीला पानी

निकलेगी एक आह

कहते हुए -

आ रही है

मज़लूम  बर्फ़ 

रिहा होकर 

ज़ालिम के हाथ से

जा रही है 

विलय होने 

नदिया समुन्दर में 

अपना अस्तित्व खोने !

 बदलते रहेंगे मौसम 

फिर-फिर जमेगी बर्फ़ 

सजते रहेंगे ख़्यालात  

हर्फ़-दर-हर्फ़..!! 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 14 मार्च 2018

किसान के पैरों में छाले


सरकारी फ़ाइल में

रहती है एक रेखा,

जिनके बीच खींची गई है

क्या आपने देखा...?


सुनाने संवेदनाविहीन सत्ता के केंद्र को

अपनी जाएज़ आवाज़ 

चलते हैं किसान पैदल 180 किलोमीटर,

चलते-चलते घिस जाती हैं चप्पलें

डामर की सड़क बन जाती है हीटर। 


सत्ता के गलियारों तक आते-आते

घिसकर टूट जाती हैं चप्पलें

घर्षण से तलवों में फूट पड़ते हैं फफकते फफोले

सूज जाते हैं फटी बिवाइयों से भरे पावन पाँव,

रिसते हैं रह-रहकर छलछलाए छाले

मायानगरी की दहलीज़ पर

जहाँ उजड़ चुके हैं संवेदना के गाँव।


छह दिवस पथिक पैदल चले

पचास हज़ार ग़रीब किसान,

हौसला हो या दूसरों की परवाह

आंदोलन में शांति और अनुशासन के

छोड़ गए गहरे निशान।


हमने देखा उम्मीद मरी नहीं है

मुम्बईकर निकले घरों से

खाना-पानी और चप्पलें लेकर

लोग सिर्फ़ सेलिब्रिटीज़ को ही टीवी पर देखना चाहते हैं

तोड़ा भरम राष्ट्रीय मीडिया को नसीहत देकर।


सोई सरकार की नींद खुली

सभी माँगें स्वीकार कर लीं

पीड़ा के पाँवों पर मरहम लगाया

बेबस हो विशेष ट्रेन से

किसानों को घर भिजवाया।

© रवीन्द्र सिंह यादव


शुक्रवार, 9 मार्च 2018

मूर्ति

सोचता हूँ 
गढ़ दूँ 
मैं भी अपनी 
मिट्टी की मूर्ति, 
ताकि होती रहे 
मेरे अहंकारी-सुख की क्षतिपूर्ति। 

मिट्टी-पानी का अनुपात 
अभी तय नहीं हो पाया है, 
कभी मिट्टी कम 
तो कभी पर्याप्त पानी न मिल पाया है। 

जिस दिन मिट्टी-पानी का 
अनुपात तय हो जायेगा, 
एक सुगढ़ निष्प्राण 
शरीर उभर आयेगा। 

कोई क़द्र-दां  ख़रीदार भी होगा 
रखेगा सहेजकर, 
जहाँ पहुँचता न हो  दम्भी हथौड़ा 
मूर्तिभंजक नफ़रत का घूँट पीकर ..!   
#रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

होली की कथा


हमारी पौराणिक कथाऐं कहती हैं 

होली की कथा निष्ठुर ,

एक थे भक्त प्रह्लाद 

पिता  जिनका हिरण्यकशिपु  असुर। 


थी उनकी बुआ होलिका 

थी ममतामयी माता कयाधु ,

दैत्य कुल में जन्मे  

चिरंजीवी प्रह्लाद साधु। 


ईश्वर भक्ति से हो जाय विचलित प्रह्लाद 

पिता ने किये नाना प्रकार के उपाय, 

हो जाय जब विद्रोही बेटा 

बाप को पलभर न सुहाय। 


थे बाप-बेटे में  मतभेद भारी 

कहता बाप स्वयं को भगवान् , 

रहे झेलते यातनाऐं प्रह्लाद सदाचारी   

अनाचार को नहीं की मान्यता प्रदान। 

  

रार ज़्यादा ठनी जब

ख़्याल अपना लिया भयंकर हिरण्यकशिपु ने,

बुलाया बहन होलिका को 

प्रह्लाद को मारने। 



ब्रह्मा जी ने दिया  था  

होलिका को  वरदान, 

आग तुम्हें न जला सकेगी 

जब करोगी कार्य महान।  


लेकर बैठ गयी ज़बरन  प्रह्लाद को  चिता  पर 

छीनकर माँ से उसके दुलारे को ,

माँ चीख़ती रही बे-बस 

खोला होलिका ने दुष्टता के पिटारे को। 


नाम लेते रहे प्रह्लाद प्रभु का  

भस्म हो गयी होलिका,

बचा  न सका वरदान भी 

होता नहीं यत्न कोई प्रमाद की भूल का। 


सकुशल निकले भक्त प्रह्लाद  

प्रचंड चिताग्नि से 

आओ होली मनाऐं भर-भर उल्लास 

विमुक्त हों चिंताग्नि से। 


आओ जला दें आज अहंकार अपने 

खोल दें  उमंगों को जीभर मचलने।  

# रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

चौकीदार


अपने चमन को हमने सँवारा  

बहाया पसीना सहेजे जज़्बात, 

रौनकों को नौंचने आ गई   

कौए और बाज़ की बारात।


पत्तियाँ हो रही थीं पल्लवित 

फूलों पर आ रहा था निखार, 

आ गये चरने-रौंदने बग़िया जानवर 

धर-धर अपनी-अपनी  बेरहम लात। 


रखवाली के लिए बैठाया 

एक अदद चौकीदार भी, 

लुटेरे करते रहे उसकी जय-जयकार

आत्ममुग्ध समझ न सका पते की बात। 


पूँजी का चरित्र 

लाभ में निहित है, 

नैतिकता की चर्चा 

अब करते रहो दिन-रात।   

© रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

शायद देखा नहीं उसने


चराग़-ए-आरज़ू  

जलाये रखना, 

उम्मीद आँधियों  में  

बनाये रखना। 



अब  क्या  डरना 

हालात की तल्ख़ियों से,

आ गया हमको 

बुलंदियों का स्वाद चखना।  



ठोकरें दे जाती  हैं 

जीने का शुऊर ,

कोई  देख पाता है  

 कलियों का चटख़ना। 



काट लेता है कोई शाख़ 

घर अपना बनाने को, 

शायद देखा नहीं उसने 

चिड़िया का बिलखना। 

# रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

जिया जो दूसरों के सपनों पर


मत टिकाओ 
उम्मीद को अपनी 
किसी लफ़्फ़ाज़ के सहारे, 
नहीं  तो डूब जायेगी 
नैया एक दिन 
देखते रह जाओगे किनारे। 


दरारें दिख रहीं हैं 
दूर से मुझको 
संयम के बाँध 
 हैं अब फूटने वाले ,
जायेंगे टूट जब एक दिन 
कच्चे विश्वास के धागे, 
कहेगा कौन तुमको 
कि हो तुम हमारे। 


हो बेहतरी की बात 
या ख़ुशियों भरे दिन हों, 
हलक़ सूखा है 
अब तो इंतज़ार में 
 लगते आज-कल अपने 
ज्यों रौशनी बिन हों, 
देखता हूँ रोज़-रोज़ 
लुटते हुए सपने 
बेहरे हुए को 
कोई कब तक पुकारे। 


थाम लो दामन 
वक़्त की चुनौती का  
राह अपनी बना डालो, 
खोखले आश्वासन 
होते नहीं ज़ख़्म का मरहम 
बुझते चराग़ में 
ज़रा-सा सब्र का 
तेल फिर डालो, 
जिया जो 
दूसरों के सपनों पर 
ज़िन्दगी में झेलता 
ज़िल्लत वही सांझ-सकारे। 

# रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

कहानी संग्रह पंखुड़ियाँ (24 लेखक एवं 24 कहानियाँ )

कहानी संग्रह
की सूचना साझा करते हुए बहुत ख़ुशी का अनुभव हो रहा है कि इस संकलन में मेरी कहानी "अभावों के स्वभाव" सम्मिलित है। 
देशभर के अलग-अलग राज्यों से प्राची डिजिटल पब्लिकेशन की  इस पहल ने लेखकों को एक प्रतिष्ठित मंच प्रदान किया कहानी संग्रह का आयोजन करते हुए। 
पंखुड़ियाँ कहानी संग्रह अब राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय ई-स्टोर्स पर 24 जनवरी 2018 से उपलब्ध है।  

मुझे प्राची डिजिटल पब्लिकेशन की ओर से अपने मित्रों / परिचितों के लिए 10 डिस्काउंट कूपन दिए गये हैं। इच्छुक पाठक  नीचे लिखे कूपन कोड का इस्तेमाल करते हुए (प्रथम 10 ख़रीदार)

 99 रुपये का डिस्काउंट लाभ ले सकते हैं-

                                     
Coupon Code -  HINDIABHA

pankhuriya

इस कहानी संग्रह के बारे में अधिक जानकारी के लिए नीचे दिया गया लिंक क्लिक करें -

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...