मंगलवार, 22 जनवरी 2019

नारियल और बेर


नारियल बाहर भूरा

अंदर गोरा पनीला,

बाहर दिखता रुखा

अंदर नरम लचीला।


बाहर सख़्त खुरदरा

भीतर उससे विपरीत,

दिखते देशी, हैं अँग्रेज़

है कैसी जग की रीत।


युग बीत गये बहुतेरे

बदला न मन का फेर,

अंदर कठोर बाहर रसीला

मिलता खट्टा-मीठा बेर।


हैं क़ुदरत के खेल निराले

जीवन का मर्म सरल-सा,

दृष्टिकोण और मंथन में

आ रहा उबाल गरल-सा।

© रवीन्द्र सिंह यादव



गुरुवार, 17 जनवरी 2019

सड़क पर प्रसव


वक़्त का विप्लव 

सड़क पर प्रसव 

राजधानी में 

पथरीला ज़मीर 

कराहती बेघर नारी 

झेलती जनवरी की 

सर्दी और प्रसव-पीर 

प्रसवोपरांत 

जच्चा-बच्चा 

अट्ठारह घंटे तड़पे 

शहरी सड़क पर 

ज़माने से लड़ने 

पहुँचाए गए 

अस्पताल के बिस्तर पर

चिड़िया चहचहायी होगी 

विकट विपदा देखकर 

गाड़ियाँ और लोग

निकले होंगे मुँह फेरकर 

हालात प्रतिकूल 

फिर भी टूटीं नहीं 

लड़खड़ातीं साँसें

करतीं रहीं 

वक़्त से दो-दो हाथ  

जिजीविषा की फाँसें   

जब एनजीओ उठाते हैं 

दीनहीन दारुण दशा का भार 

तब बनता है 

एक सनसनीखेज़ समाचार।  

© रवीन्द्र सिंह यादव 

सोमवार, 7 जनवरी 2019

चुनावी दौर


मदारी

एक बार फिर

व्यस्त हैं सजाने में

अपना-अपना पिटारा

कोई सजा रहा है

भव्य भड़काऊ रथ

कोई झाड़ रहा है

अपनी गाड़ी ज़ंग खायी खटारा


पैने हो रहे हैं

सवालों के तीखे तीर

कोई दोहरायेगा

रटे जवाबों की 

घिसी-पिटी लकीर

होगा कोई सॉफ्ट...

कोई एकदम हार्ड...

खेलेगा अभिनय करते

कोई विक्टिम कार्ड


दाल में हो कुछ काला

आस्तीन में साँप काला

है कोई पाला बदलने वाला

या फिर हो घोटाला गड़बड़झाला

कहीं डूबेगी नैया

कहीं खुलेगा क़िस्मत का ताला


अपराधियों-आरोपियों-लम्पटों का

लफ़्फ़ाज़ीमय रंगारंग शो

देख-देख ख़ुद को कोसेगी जनता

कॉरपोरेट-पार्टी-मीडिया

गठजोड़ को अब कौन नहीं जानता


बेरोज़गारों को मिलता 

भरपूर मौसमी काम

नयी सरकार देती जनता को

तोहफ़ा बढ़ाकर चीज़ों के दाम  


चुनावी हिंसा में

कुछ घरों के 

चराग़ बुझाते हुए

गुज़र जायेगा

एक और चुनावी दौर

हम तलाशते रहेंगे

पुनः अपने-अपने

पाँवों के नीचे ठौर।

© रवीन्द्र सिंह यादव


ज़ंग = RUST

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

महिलाओं का मन्दिर प्रवेश


महिलाओं के 

प्रवेश के बाद 

मन्दिर का 

शुद्धिकरण !

समानता के 

अधिकार से 

ऊपर झूलता है 

आस्था का 

अँधानुकरण !!

भावनात्मक 

तनाव-दोहन

कामयाबी का 

सपाट शार्ट-कट! 

है आसान 

अज्ञानियों पर 

रौब-शासन

भव्यता की आड़ में  

ख़ज़ाना सफ़ा-चट!! 

आस्था की जलावन 

भावना के अलाव में 

सरकायी हर बार! 

रूढ़ियों / वर्जनाओं के 

तोड़कर बैरियर 

बदलती सोच 

अभिमान से 

पहुँची उस पार!!

© रवीन्द्र सिंह यादव  

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

श्रद्धाँजलि

श्रद्धाँजलि !

जला दी गयी अंजलि !

ताँडव करती 

ख़ौफ़नाक बर्बरता 

चीख़ती-चिल्लाती 

कराहती मानवता 

ज्वाला में 

धधका होगा शरीर 

सही गयी होगी 

कैसे तपन-पीर

बेख़ौफ़ दरिंदे 

क्या संदेश देना चाहते हैं ?

स्त्री को कौन-सा 

सबक़ सिखाना चाहते हैं?

न्याय के लिये 

भटकते लाचारों को देख 

करते हैं अपराधी अट्टहास 

लचर व्यवस्था देख-देख!    

© रवीन्द्र सिंह यादव

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

वक़्त



एक शिल्पी है वक़्त 

गढ़ता है दिन-रात

उकेरता अद्भुत नक़्क़ाशी 

बिखेरता रंग लिये बहुरँगी कूची  

पलछिन पहर हैं पाँखुरियाँ 

बजतीं सुरीली बाँसुरियाँ 

सृजित करता है 

स्याह-उज्ज्वळ इतिहास 

पल-पल परिवर्तित प्रकृति 

घड़ियाँ करतीं परिहास  

नसीम-सा गुज़रता है 

हर्ष-विषाद के पड़ावों से 

मरहम हो जाता है 

आप्लावित होता है भावों से 

उजलत मानव अभिलाषा 

कोसती है वक़्त को 

ख़ुद ठहरकर 

सुबह-शाम 

दोष देती वक़्त को  

वक़्त की गर्दिश को 

सीने से लगा लेते हैं हम 

ठोकरें और थपेड़े वक़्त के 

ज़ेहन में क्यों सजा लेते हैं हम ?

© रवीन्द्र सिंह यादव


उजलत = उतावली,व्यग्र 

नसीम = जो दूसरों की सहायता करता हो  

रविवार, 16 दिसंबर 2018

ख़ुशी और ग़म


ख़ुशी आयी

ख़ुशी चली गयी 

ख़ुशी आख़िर 

ठहरती क्यों नहीं ?

आँख की चमक 

मनमोहक हुई 

कुछ देर के लिये 

फिर वही 

रूखा रुआँसापन

ग़म आता है 

जगह बनाता है 

ठहर जाता है 

बेशर्मी से

ज़िन्दगी को 

बोझिल बनाने 

भारी क़दमों से 

दुरूह सफ़र 

तय करने के लिये   

ख़ुशी और ग़म का 

अभीष्ट अनुपात

तय करते-करते 

एक जीवन बीत जाता है  

अमृत-घट रीत जाता है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

विटामिन डी ( वर्ण पिरामिड )

ये
धूप
रोकती
अट्टालिका
सहते     हुए
हड्डियों का दर्द
कोसते धूप-बाधा।



रोको
सौगात
क़ुदरती
भास्कर देता
निदाघ निर्बाध
विटामिन डी मुफ़्त।



हो
गया
शहरी
सिटीज़न
छाँव का आदी
घाम के दर्शन
हैं सुकून की वादी। 


है
धूप
गायब
तहख़ाने
हाट-बाज़ार
दवाई-दवाई
जेब ख़ूब चिल्लाई।  


लो 
घुटा  
इंसान 
अभिव्यक्ति 
तलाशती     है 
छायावादी  युग 
प्रगति के सोपान। 

ये 
पौधे 
पोषित 
पल्लवित  
पंछी उड़ान 
प्यारा कलरव
धूप का ही साम्राज्य।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

निदाघ = गर्मी, ताप, धूप 



शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

अमरबेल (वर्ण पिरामिड )



मैं 
रहूँ 
सदैव 
हरी-भरी 
पैरासूट-सी 
आच्छादित होती 
मेज़बान    पेड़     पे।  



मैं 
तो हूँ 
घोषित 
परजीवी 
आतिथेय से  
हासिल पोषण 
झेलूँ  दोषारोपण।



जो 
होता 
मुझमें 
क्लोरोफिल 
स्वाभिमान से
सजती-खिलती   
जीती   अमरबेल। 

© रवीन्द्र सिंह यादव
























शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

समुंदरों को दिखा रहा हूँ


मैं अपनी  कश्ती  पार लाकर, 

समुंदरों   को  दिखा  रहा  हूँ। 


जीवन   के  ये  गीत  रचे जो, 

मज़लूमों   को  सुना  रहा हूँ। 


चला हूँ जब से कँटीले पथ पर, 

पाँव   के   छाले  छुपा  रहा हूँ। 


उतर  गया  हूँ  सागर तल में, 

प्यार  के  मोती  उठा  रहा हूँ। 


अहंकार    के    दावानल   में, 

प्रेम  की  बूँदें  गिरा  रहा   हूँ। 


जहाँ बुझ गया चाँद फ़लक का, 

चराग़  होना  सिखा  रहा  हूँ।   


इंसानियत    के    कारवाँ   में, 

जुड़ो  अभी   मैं  बुला  रहा  हूँ। 


उदास   बैठी   सूनी  घाटी  में, 

उम्मीद के फूल खिला रहा हूँ।  


अंधकार   से   डरना   छोड़ो, 

मैं  एक  दीपक  जला रहा  हूँ।  

© रवीन्द्र सिंह यादव


विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...