शुक्रवार, 26 मई 2017

सरिता

नदी  का  दर्द... 


कल-कल  करती करवटें बदलती बहती सरिता

का आदर्श  रूप

हो गयी  अब  गए  दिनों  की  बात ,


स्वच्छ  जलधारा  का  मनभावन  संगीत

हो  गयी  अब  इतिहास  की  बात।


शहरीकरण  की आँधी  में

गंदगी  को  खपाने  का

एकमात्र  उपाय / साधन 

एक  बे-बस  नदी  ही  तो  है,

पर्यावरण  पर  आँसू  बहाने  के  लिए

सदाबहार  बहुचर्चित ज्वलंत मुद्दा  

हमारे  द्वारा  उत्पादित  गन्दगी  ही  तो  है।




Yamuna River At Etawah (Uttar Pradesh)


खुले  में  पड़ा  मल  हो

या


सीवर  लाइन  में  बहती  

हमारे द्वारा उत्पादित  गंदगी,

समाज  की  झाड़न  हो

या


बदबूदार  नालों  में  बहती  बजबजाती  गंदगी

सब पहुँचते  हैं  

एक  निर्मल  नदी  की  पवित्रता भंग  करने


जल  को  विषाक्त / प्रदूषित   बनाने।


नदी  के  किनारों  पर

समाज  का  अतिक्रमण,


है  कुंठित  मानवीय  चेष्टाओं  का  

भौतिक  प्रकटीकरण।

प्रपंच के  जाल  में  उलझा  मनुष्य

नदी  के  नाला  बनने  की  प्रक्रिया  को


 देख  रहा  है  लाचारी  से,

नदियों  के  सतत  सिमटने  का  दृश्य

फैलता  जा  रहा  है  पूरी  तैयारी  से।


नदी  के  किनारे  बैठकर

 कविता  रचने  की  उत्कंठा

जर्जर पंख फड़फड़ाकर दम तोड़  रही है,

बहाव  में  छिपी  ऊर्जा को 

मनचाहा रूप  देने के वास्ते 


नदी की धारा भौतिकता मोड़ रही है।


नदी से अब पवित्र विचारों का झौंका नहीं

नाक सिकोड़ने को विवश करता

सड़ांध का ग़ुबार  उठता  है,

हूक  उठती  है  ह्रदय  में

नदी  के  बिलखने  का 

करुण स्वर उभरता है।


नदी अपने  उदगम  पर  पवित्र  है


लेकिन......

आगे  का  मार्ग

गरिमा  को  ज़ार-ज़ार  करता है,


 बिन बुलाये मिलने आ रहा

गंदगी  का  अम्बार


गौरव  को  तार-तार  करता है।


नदी  चीख़ती  है 

कराहती  है

तड़पती है 

कहती  है -


"ज़हरीले रसायन, मल, मूत्र, मांस, मलबा...प्लास्टिक और राख

क्यों मिलाये जा रहे हैं मुझमें...?



मासूम  बचपन  जब  मचलता  है

नदी  में  नहाने  को / जलक्रीड़ा को 

देख  समझकर  मेरा  हाल


कहता  है  मुझे  गंदा  नाला


और  रोक  लेता  है  

अपनी  चंचलता  का  विस्तार

कोई  बताएगा  मुझे...!


आप, तुममें  से


किसी  मासूम  को  न  समझा  पाने  में 


मेरा  दोष  क्या  है ?


©रवीन्द्र  सिंह यादव



गुरुवार, 25 मई 2017

नज़दीकियाँ



ज़रा-ज़रा  सी   बात   पर

रूठना, मचलना  भा गया ,

देखने   चकोर   चाँद   को

नदी   के  तीर  आ  गया। ........ (1)


गुफ़्तुगू    न   सुन    सके

कोई  मिलन  न  देख  ले,

दो    दिलों  के  आसपास

बन  के  शामियाना  कोहरा  छा  गया।

देखने  चकोर  चाँद  को

नदी  के  तीर  आ  गया। ........ (2)


ये     घड़ी     रुकी     रहे

रात    जाए   अब   ठहर,

दीवानगी  का ये  ख़याल

बेताबियों  को  भा  गया।

देखने   चकोर  चाँद  को

नदी  के  तीर   आ  गया। ......... (3)


ज़िन्दगी     की      राहों     में

फूल      हैं     तो     ख़ार    भी  ,

पयाम    एक   फ़ज़ाओं    का  

मरहम ज़ख़्म  पर लगा गया।

देखने      चकोर     चाँद    को

नदी     के    तीर   आ     गया। ........ (4)


तमन्नाऐं    बन  के    रौशनी

जगमगाती  हैं    डगर -डगर ,

बेख़ुदी     के        दौर       में

भूली  राह  कोई  दिखा गया।

देखने   चकोर      चाँद    को

नदी  के    तीर   आ     गया। ........ (5)

@रवीन्द्र सिंह यादव

इस रचना को सस्वर सुनने के लिए लिंक -
https://youtu.be/s0aRSv3IenI

शब्दार्थ / WORD  MEANINGS -

ज़रा = थोड़ी ,थोड़ा ,A  Bit 

चकोर = तीतर की भांति दिखने वाला पक्षी जो साहित्य में चन्द्रमा के प्रेमी के रूप में वर्णित है ,Alectoris          chukar 

तीर = किनारा ,बाण , River Bank 

गुफ़्तुगू =बातचीत ,Speech ,Conversation 

शामियाना = मंडप ,वितान ,छत्र , Canopy  ,Awning 

कोहरा = कुहासा ,Fog,Mist 

घड़ी = पल , moment 

दीवानगी = पागलपन , होश-ओ हवास  खोना -Madness  ,Insanity

ख़याल = विचार ,Thought ,Idea 

बेताबियाँ = बेसब्री,बेचैनी  ,Restlessness 

ख़ार = काँटा  , A Thorn 

पयाम = संदेश , Message 

फ़ज़ाओं =  वातावरण ,Weather, Atmosphere 

तमन्नाऐं = इच्छाएँ ,Desires 

डगर = रास्ता ,Path ,Road 

बे-ख़ुदी = स्वयं को भूल जाना ,Intoxication 


मंगलवार, 16 मई 2017

इंतज़ार



पतंगे   आएंगे  जलने  सीने में

जिनके सुलगती आग है बाक़ी , 

सुनो     संगीत     जीवन    का 

मनोहर  राग  है  बाक़ी।   (1)




भेजा है ख़त  बहार  ने  लिख 

आ          रही         हूँ        मैं,

जहाँ   पहुँची  नहीं    दुनिया  

अभी  एक  बाग़   है    बाक़ी।  

सुनो   संगीत   जीवन    का 

         मनोहर    राग    है     बाक़ी।   (2) 




कभी    मिलते   नहीं   साहिल 

सिमट    जाती     हैं     दूरियाँ,

सूखी       एक      नदिया       है 

    समुंदर  सा  अनुराग  है  बाक़ी।    

सुनो    संगीत    जीवन      का 

   मनोहर    राग    है   बाक़ी।   (3) 




चुरा   लाओ   कहीं  से   तुम

छलकती   आँख   का  पानी,  

धो  सकूँ    दामन  पर  लगा

 एक  गहरा  दाग़  है   बाकी।  

सुनो   संगीत   जीवन    का 

           मनोहर    राग    है   बाक़ी।  (4 )  




सैयाद  की  मर्ज़ी से मायूसियों में 

घिर      जाना     बेहतर       नहीं ,

पहुँचो मक़ाम   तक   महफूज़  है 

रहनुमा   जो   बेदाग़    है    बाक़ी। 

सुनो      संगीत      जीवन     का 

     मनोहर    राग    है     बाक़ी ।    (5)  




अंधेरों  में सन्नाटों  का  निज़ाम 

डराए      जब     कभी     तुमको 

देख  लेना   आँधियों     में     भी  

जल  रहा  एक  चराग़  है  बाक़ी।

सुनो      संगीत     जीवन     का 

    मनोहर   राग    है    बाक़ी।     (6)  

    

बदलेगा   वक़्त  सुहानी  भोर   का  

              सुरमई       संगीत       लेकर,                 

निकलेगा  चाँद    फिर   अरमानों   का 

सहरा में  चमन  का  सुराग  है  बाक़ी। 

सुनो         संगीत         जीवन     का 

 मनोहर   राग     है     बाक़ी।    (7)  

@रवीन्द्र  सिंह यादव



रविवार, 7 मई 2017

सत्ता


जनतंत्र में अब 
कोई राजा नहीं
कोई मसीहा नहीं
कोई महाराजा नहीं
बताने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।  

तेरे दरबार में इंसान 
कुचला पड़ा है,
तेरे रहम-ओ-करम पर
क़ानून बे-बस खड़ा है,
तेरे विराट वैभव की
चमचमाती चौखट की चूलें
हिलाने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं ।  

संवेदना को रौंदकर
बस शोर के ज़ोर को  
आगे बढ़ाती जा रही है तू,
भीड़ को उन्माद का रस  
क्यों पिलाती जा रही है तू,
तेरी औक़ात-ओ -शान को     
दर्पण दिखाने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।   

देखे हैं अब तक मैंने 
तेरे यार-दोस्त सभी,
इनमें होते नहीं शामिल
दुखियारा-दुखियारी कभी,
पूरी जाँघ कट जाने पर 
कमर से लकड़ी बाँधकर
हल जोतते किसान की पीड़ा
सुनाने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।    


मेरा हक़ मारकर 
छकों को दे रही है तू
नाव-पतवार हमारी 
बैठाकर किसे खे रही है तू...?
भूख से व्याकुल औलाद की 
तड़प न सह पाने पर 
एक विवश माँ के आग में 
जल जाने की जलन-तपन
महसूस कराने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।   

बेकारी के दौर में  
दर-दर भटकते
मायूस हैं युवामन,
नैराश्य के ख़ंजर ने 
घायल कर दिए यौवन,
अभावों में मचलते 
स्वभावों का गणित
पढ़ाने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।  

दरिंदों की हवस ने
जीवन तबाह कर डाले हैं कई,
स्त्री-जीवन में क्यों 
रोज़ चुभते हैं भाले कई,
रोज़ मर-मरकर जीने की  
टीस और दर्द का एहसास
सुनाने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।  

राज करने का लायसेंस  
तेरा क़ाएम रहे तो...       
लड़ाती-भिड़ाती है हमें 
आपस में बैर रखने को, 
कहती है होकर ज़ालिम तू
मज़लूम पर पैर रखने को,
अरे! तेरी मर चुकी ग़ैरत 
ज़िंदा कराने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।  

तेरे आत्ममुग्धी फ़ैसलों से 
जनता तकलीफ़ में पड़ती जा रही है,
किसी का घर भर दिया तूने
ग़रीबों से रोज़ी बिछड़ती जा रही है,
तेरी बदमाशियों का कच्चा-चिट्ठा
लटकाने ललाट पर तेरे आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।   


झौंक दिया सारा जीवन 
औरों के सुख की चाह में,
 देश का निर्माण करने 
गढ़ गया हूँ थाह में,
श्रेय लेने की बे-हयाई तुझे मुबारक   
स्वराज के मर्म का परचम
लहराने आ रहा हूँ मैं।
सुख-चैन से  सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।   
© रवीन्द्र सिंह यादव


शब्दार्थ / Word  Meaning 
जनतंत्र   = लोकतंत्र, जनतंत्र / Democracy
 मसीहा  = दुःख - दर्द हरने वाला / Healer
रहम-ओ -करम = मेहरबानी /Grace & favour, MERCY & KINDNESS
बे-बस = शक्तिहीन / Powerless
वैभव=शान-शौकत, भव्यता / Wealth , Grandeur
चौखट = किवाड़ों की चौखट /  Door frame
चूलें = जोड़, Dovetail, Joints
उन्माद = ज़ुनून, सनक, पागलपन / Hysteria, Madness, Mania
औक़ात-ओ -शान = क्षमता और गर्व  / Status /Capacity &Pride
जाँघ  = जंघा / Thigh
छकों = छके हुए, मन भरकर खाए-पीए हुए,तृप्त ,संतृप्त // Fulfillment, Saturated, wealthy persons
ख़ंजर= कटार /  DAGGER
खे = नाव खेने (Moving Boat ) की क्रिया
अभाव = कमी , अनुपलब्धता,Scarcity ,Unavailability
ज़ालिम = दुष्ट ,cruel
मज़लूम = घायल /पीड़ित , Injure ,Oppressed
आत्ममुग्धी = ख़ुद को प्रसन्न करने वाले ,Self pleasant
महरूम = वंचित /Deprived, Prohibited
ललाट = माथा / Forehead
थाह =गहराई ,Depth
बे-हयाई   = बेशर्मी   ,निर्लज्जता ,धृष्टता , Being Shameless
परचम =ध्वज ,झंडा ,Flag

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

दास्तां



तेरी  हर शय

तेरी  हर  शर्त

है   क़बूल  मुझे ,

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का उसूल  मुझे। 




कोई   गुज़रा

कोई  मुक़रा

कोई  सिमटा

अपने - अपने  दायरों में ,

मैं  भी एक गवाह  हूँ  सफ़र  का

यों   ही  न  भूल  मुझे।

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का  उसूल  मुझे।  




दिल  में

उतर  जाता  है  कोई

तितली  सी  ज़हानत    लिए,

पंख  जाते   हैं  उलझ

काँटों  में

कहता  है   कोई

बेमुरब्बत   फूल   मुझे।

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का  उसूल  मुझे।




मंज़िल  की  ओर

कारवाँ  बढ़ने  का

सिलसिला  चलता  रहा ,

हासिल  हो  न  हो

मक़सद

इंतज़ार  का   सिला

करना है वसूल मुझे।

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का  उसूल  मुझे। 






ले    डूबेगा  एक  दिन

क़तरे    को

दरिया   बनने   का शौक़ (?)

दामन  से  लिपटकर

एक   दिन  सुनाएगा

दास्तां अपनी शूल मुझे।

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का  उसूल  मुझे। 




वक़्त  फिसला  है  

रेत     की   तरह 

"रवीन्द्र "  के हाथों  से,

सज्दे  में झुक  गया  हूँ  

समझ   न 

पुल  से  गुज़रने  का महसूल  मुझे। 

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का  उसूल  मुझे।  

@रवीन्द्र  सिंह  यादव


मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

ऐ हवा चल पहुँचा दे मेरी आवाज़ वहाँ


ताजमहल  को  देखते आगरा  क़िले  में क़ैद  मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने शायद  ऐसा  भी  सोचा  होगा...

                   ( मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब अपनी  क्रूरता के लिये  कुख्यात हुआ। बड़े भाई दारा शिकोह सहित अपने तीनों भाइयों ( दो अन्य शाह शुज़ा व मुराद बख़्श ) को मौत के घाट उतारकर वृद्ध पिता  शहंशाह शाहजहाँ को विलासता पर जनता का धन ख़र्चने ( ताजमहल का निर्माण सन् 1632 में प्रारम्भ  हुआ जो अगले 20 वर्षों  में पूरा हुआ ) के आरोप में सन् 1658 में आगरा  के लाल क़िले ( मुग़ल सम्राट अकबर  द्वारा निर्मित, 8 साल निर्माण कार्य चलने के बाद सन् 1573 में बनकर तैयार हुआ ) में क़ैदकर अतिमानव औरंगज़ेब गद्दी पर बैठा। शाहजहाँ द्वारा कराये गये ताजमहल के निर्माण का औरंगज़ेब  ने तीखा विरोध किया था।                  

             हालाँकि मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के बारे में उल्लेख मिलते  हैं कि वह अपने निजी ख़र्च के लिये टोपियाँ सिलने और क़ुरान की नक़ल ( कॉपी ) तैयार करने से हुई कमाई का उपयोग किया करता था।

             आगरा के लाल क़िले से दक्षिण-पूर्व दिशा में ( लगभग 3 किमी दूरी सड़क मार्ग से ) यमुना के किनारे स्थित ताजमहल स्पष्ट दिखायी   देता है। शहंशाह शाहजहाँ ने अपनी मृत्यु ( सन् 1666, आयु 74 वर्ष ) से पूर्व नज़रबंदी के लगभग साढ़े सात साल कैसे तन्हा रहकर गुज़ारे होंगे जिसने 30 साल तक ख़ुद शहंशाह का ताज पहनकर वक़्त की आती-जाती रौनकों को जिया हो...

जारी... 






             

           इंतक़ाल के बाद शाहजहाँ को भी ताजमहल में उनकी प्यारी बेग़म मुमताज़ महल (जो सन् 1631 में ख़ुदा को प्यारी हो गयी थीं ) की क़ब्र  के बग़ल में दफ़नाया गया।

             पेश  है  एक  नज़्म जिसे मैं अपने कल्पनालोक में शाहजहाँ के जज़्बात कहूँगा। त्रुटियों के लिए क़लम के सरताज, कला के क़द्र-दान क्षमा करें, उपयुक्त सुझाव दें...)


ऐ  हवा  चल 

पहुँचा    दे     मेरी    आवाज़  वहाँ,

मुंतज़िर   है   कोई

सुनने  को   मेरे   अल्फ़ाज़  वहाँ।   (1)


दूरियाँ  बन गयीं  

ज़माने   ने  ढाया   है  क़हर ,

मैं   यहाँ   क़ैद   क़िले   में  

दफ़्न   मेरी   मुमताज़   वहाँ ।

मुंतज़िर  है   कोई  

सुनने   को  मेरे  अल्फ़ाज़   वहाँ ।    (2)


गुज़रेंगे   लम्हात -ए -ज़िन्दगी  

अपनी   रफ़्तार   लिये ,

तराने  गुनगुनायेगी  ज़ुबां  

बजेंगे  धड़कनों   के  साज़  वहाँ । 

मुंतज़िर  है   कोई  

सुनने  को  मेरे  अल्फ़ाज़  वहाँ ।    (3)


लोग  ढूँढ़ेंगे  दर्द-ओ-सुकूँ 

मोहब्बत  की  इस  निशानी  में,

देखने   आयेगी   दुनिया  

साहिल -ए -जमुना खड़ा  है  ताज  वहाँ  । 

मुंतज़िर  है   कोई  

सुनने     को     मेरे    अल्फ़ाज़   वहाँ ।   (4)


वो   दिन   भी  आयेगा   

हज़ारों दिल मलाल से भर जायेंगे,

सहेजेगी   हुक़ूमत   मेरे   जज़्बात  

खड़ा        होगा      समाज   वहाँ।    

मुंतज़िर  है   कोई  

सुनने   को   मेरे   अल्फ़ाज़   वहाँ ।    (5)


मेरे  जज़्बे   को  सलाम  आयेंगे  

सराहेंगे   क़द्र-दान    शिल्पकारों  को,

प्यार   नफ़रत   से  बड़ा  होता  है 

कहेगा अफ़साना उनसे जो नहीं आज  वहाँ ।  

मुंतज़िर  है   कोई  

सुनने      को      मेरे    अल्फ़ाज़   वहाँ ।    (6)


लिख  देंगे  एक  प्यारी-सी  नज़्म 

देखकर  पुरकशिश पुरनूर  मंज़र ,

जब    भी   आयेंगे...तड़पेंगे 

क़लम     के     सरताज    वहाँ । 

मुंतज़िर  है   कोई  

सुनने   को   मेरे   अल्फ़ाज़   वहाँ ।   (7)


नज़र  भी  बेवफ़ा  हो  गयी  है  

आलम-ए -तन्हाई   में,

नये   चश्म -ओ -चराग़   होंगे 

ज़माना     करेगा    नाज़   वहाँ ।

मुंतज़िर  है   कोई  

सुनने   को   मेरे   अल्फ़ाज़   वहाँ ।   (8)


 जाने -अनजाने  गुनाहों  की  

सज़ा  मुझे  देना  मेरे  मौला,

तब  इश्क़  की मासूमियत   के 

खुलेंगे   धीरे-धीरे   राज़   वहाँ । 

मुंतज़िर  है   कोई  

सुनने   को   मेरे   अल्फ़ाज़   वहाँ ।    ( 9 ) 


पास   है  जो   ख़ज़ाना -ए -रौनक 

लगा  ले  दिल  से  अपने  ऐ  "रवीन्द्र ",

यादों   के  पहलू   में  आकर  

लोग  परखेंगे  वक़्त  का  मिज़ाज  वहाँ । 

मुंतज़िर  है  कोई  

सुनने     को     मेरे     अल्फ़ाज़   वहाँ । 

ऐ  हवा  चल 

पहुँचा    दे    मेरी    आवाज़   वहाँ,

मुंतज़िर   है   कोई

                         सुनने  को   मेरे   अल्फ़ाज़   वहाँ ।    (10 )                           

 @रवीन्द्र   सिंह  यादव 


इस रचना को सस्वर  सुनने के लिए   YouTube  लिंक -

https://youtu.be/CVM91hSgXXs

ऐ हवा चल पहुँचा दे मेरी आवाज़ वहाँ / Ai Hawa Chal Pahuncha De Meri Aawaaz Vahan. (UPDATED)


शब्दार्थ ( Word -Meanings )

मुंतज़िर = किसी के इंतज़ार में / Waiting for somebody 

अल्फ़ाज़ =  शब्द (लफ़्ज़ का बहुवचन) / Words 

क़हर =विपत्ति , Havoc 

लम्हात - ए -ज़िन्दगी  = ज़िन्दगी  के  लम्हे, क्षण  /                                                                        Moments of  life 

तराने = सुमधुर,सस्वर गीत / A kind of songs,symphony 

ज़ुबां = जीभ  / Tongue 

साज़ = वाद्य-यंत्र  / Apparatus  for  music 

दर्द-ओ-सुकूँ =  पीड़ा  और  चैन  / pain  & relief 

साहिल-ए-जमुना = यमुना नदी का किनारा/  Bank of river Yamuna 

ताज = मुकुट  / Crown 

मलाल  = दुःख / Grief 

हुक़ूमत  = सत्ता, शासन / Governance 

जज़्बात  = भाव  / Emotions 

जज़्बे = जज़्बा, भाव / Emotion 

क़द्र-दान = गुण, कला  आदि  परखनेवाला / One who appreciate 

शिल्पकार = कारीग़र, शिल्पी / Architect,

अफ़साना =क़िस्सा, कहानी / Tale,fiction, legend 

नज़्म = कविता, छंद, गीत, ग़ज़ल / Poetry, verse,

पुरनूर = बेहद  चमकदार / Filled with  light , very  bright 

मंज़र = दृश्य / Scene ,

क़लम = लेखनी / Pen 

क़लम  के  सरताज  = शब्दों  के  जादूगर 

( रचनाकार,शायर,कवि ,लेखक  आदि ) शब्द-शिरोमणि, अग्रगण्य /Leader, chief, Poet, Shayar )

आलम-ए-तन्हाई = अकेलेपन  की हालत, दशा, Stage of loneliness,  

चश्म-ओ-चिराग़ = सबसे  अधिक प्रिय / Loved one, Light of eyes.  

नाज़ = गौरव / Pride 

इश्क़ = प्यार  / LOVE ,

राज़ = रहस्य / Secret ,

मासूमियत = निर्विकार  भाव की  अवस्था  / Innocence,

ख़ज़ाना-ए-रौनक = ज़िन्दगी के ख़ूबसूरत व उजले पलों का भंडार/ TRESSURE OF GOODNESS, GLORIOUS DAYS,

                 Treasure  of good  time 

पहलू = पक्ष, सुखदायी  आश्रय / Side, Shade 

मिज़ाज =  स्वभाव/ Temperament





शनिवार, 25 मार्च 2017

मैं मज़दूर हूँ

मैं      मज़दूर      हूँ

किंतु   मजबूर   नहीं,

राह      मिल     गयी

तो  मंज़िल  दूर  नहीं ।


बाँध  बनाऊँ  सड़क  बनाऊँ,

बाज़ारों  की  तड़क-भड़क  बनाऊँ,

जीवन की राहें औरों  की आसान  बनाऊँ,

ख़ुद  पग-पग  पर अपमान सहूँ  ग़म  खाऊँ।


हथियार  बनाऊँ  साज़  बनाऊँ,

सुई       बनाऊँ  जहाज़  बनाऊँ ,

रेल   बनाऊँ   मंच    सजाऊँ,

न     कोई   प्रपंच     रचाऊँ। 


लोग  कहते  हैं -

बादशाहों की पसंद निर्मम थी,

ख़ून-पसीना  बहाने  के बाद,

कटवा  दिये  गये  मेरे  हाथ ,

कैसा  क़ानून  है...?

न्याय  क्यों  लगता  नहीं  मेरे  हाथ?


मुझपर   आरोप  है

आबादी  बढ़ाने  का,

कोई  नहीं  सोचता

मेरी मुश्किलों की परिधि घटाने का।


मेरी  झोपड़ी में

आज भी दिया जलता है,

अँधेरे  महलों  को

मेरा रौशन चेहरा खलता है।


ईश्वर  के  नाम   पर

धूर्त  ठग  लेते   हैं  मुझे,

पीढ़ी-दर-पीढ़ी  चक्रव्यूह  रचकर

शिक्षा और  साधन  से दूर  कर देते  हैं मुझे।


आ  गयीं  मशीनें

छीनने  मेरे  मुँह  का  निबाला,

हाथ   आया  जो  रुपया

बुलाकर  झपट  लेती  मधुशाला।


दबी  हुई  है  मेरी  चीख़ 

 उन  महलों  के   नीचे,

आवाज़  बुलंद करके  रहूँगा

नहीं      हटूँगा     पीछे।



मेरी  मेहनत  के  एवज़  में

जो  देते  मुझको  भीख,

श्रम  का  आदर  करना

अब  जाएँगे  वो  सीख।



रहे  एकता  अमर  हमारी

न   हो   हमसे   भूल,

तभी  खिलेंगे  इस  बग़िया   में

श्रम   के   पावन   फूल।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

         

सोमवार, 13 मार्च 2017

पूँजीवाद का शिकंजा




भिखारी  बनाने पर तुला  है  पूँजीवाद, 

सिसकियाँ   भर  रहा   है  समाजवाद। 



इतिहास के नाज़ुक  मोड़  पर 

खड़े  होकर    हम 

भूमंडलीकरण  को  कोस  रहे  हैं, 

 देख  भूखे  पेट  सोतों   को 

अपना    मन      मसोस  रहे  हैं।  



युद्धग्रस्त  देशों  में   

भूख   का   तांडव

पिघलाता  नहीं  अब  दिल  हमारा,

आक्रोश  और क्षोभ  से भरा  मन 

अब  असहाय  के  लिए  खोलता  नहीं  सहयोग  का  पिटारा।  



आच्छादित   है  मानवीय - संवेदनाओं  पर 

स्वार्थ  का  मज़बूत     आवरण,  

थाम लेता  है  बार-बार 

मूल्यों    का   होने  से  जागरण । 



बढ़ती  ग़ैर -बराबरी ,

सामाजिक - ध्रुवीकरण,

अब ,

ग़रीब -अमीर  के बीच  स्थापित   

कालजयी  खाई  को  और चौड़ा  कर रहे  हैं, 

पूँजीवाद  का  विकराल  रूप  प्रकट  हो गया  है ,

दुनिया  की आधी  संपत्ति  पर  8  धनकुबेरों  का कब्ज़ा  हो गया है ,

भारत में अब 1% लोगों का देश की 58%  संपत्ति  पर कब्ज़ा  हो गया  है। 




आजीविका  के  लिए  हर  दिन  

संघर्ष   करने  वाला 

हाथ   मल   रहा  है ,

सरकारों  का  सत्ता  में  बने रहने   की चिंताओं का  दौर  चल  रहा  है।



सरकारें  संचालित  हैं ,

धनकुबेरों  की  मंशा  से,  

ज़ेबें   हमारी  काटने    के  क़ानून   उनसे  बनवा  रहे हैं,  

भूख  से  तीसरी  दुनिया  के  देश  हार  रहे  हैं , 

विकसित देश  बेशर्मी  से   बेच  हथियार  रहे हैं।




ग़रीब  को    मिले  

डॉक्टर ,दवा , रोटी,  शिक्षा  और  छत ,

ख़त्म   हो  शोषण - कुपोषण  का  चक्रव्यूह,   

छूट       जाय       नशे     की     लत।   




पूँजी  का  ध्रुवीकरण  रुके ,

राष्ट्रीय संपत्ति   का  समान   बँटबारा  हो ,

पूँजी  का  विकेन्द्रीकरण  हो ,

बाज़ारवाद  के  मकड़जाल  को समझें ,

अनावश्यक  शौक  पर   हमारा  नियंत्रण  हो। 



कर  सुधार  हो,

ख़त्म  भ्रष्टाचार  हो ,

हर  हाथ  को  काम  हो ,

मेहनत   का उचित  दाम  हो ,
  
श्रम ,श्रमिक-उत्पाद  और  फसल  का  उचित  मूल्य  हो ,

एकता  अमूल्य  हो ,

बच  पाएंगे  तब  हम,

पूँजीवाद  के  आगे  घुटने   टेकने  से ...... ।   



समन्वित  वैश्विक  उपाय,

समानता  के   विचार   की  खाद,

आक्रोश  और   पीड़ा  से  उपजी  आह ,

उबार  लेंगे  मानवता   को  अंधी सुरंग  में  जाने   से।    

                                                         @रवीन्द्र  सिंह यादव                                                               

  

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