सोमवार, 29 जुलाई 2019

क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर






















दिनकर की धूप पाकर 

भोजन बनाता है पेड़ दिनभर,

लक्ष्यहीन अतरंगित असम्पृक्त को 

   भटकन से उबारता है पेड़ दिनभर।  


चतुर्दिक फैली ज़हरीली हवा 

निगलता है पेड़ दिनभर, 

मुफ़्त मयस्सर प्राणवायु 

उगलता है पेड़ दिनभर। 


नीले शून्य में बादलों को 

दिलभर रिझाता है पेड़ दिनभर, 

आते-जाते थके-हारे परिंदों को 

बुलाता है पेड़ दिनभर।



कलरव की प्यारी सरगम 

उदासी में सुनता है पेड़ दिनभर, 

आदमी को अपनी नज़रों में 

उठता-गिरता देखता है पेड़ दिनभर।  


यूनिवर्सिटी में रिसर्च का 

विषय बनता पेड़ दिनभर, 

राजनीति के हाथों सजीले गड्ढे में 

रोपा जाता पेड़ दिनभर। 


पथिक को ठंडी हवा के झौंकों से 

दुलराता पेड़ दिनभर, 

साधनविहीन पाठशाला का 

आसरा बनता पेड़ दिनभर। 


बाग़बान को सुख-चैन की 

रागिनी सुनाता पेड़ दिनभर, 

कलाकारों की साधना का 

आयाम बनता पेड़ दिनभर। 


निर्विवाद इतिहास 

रचता है पेड़ दिनभर,

भौतिकता के अलबेले दौर का 

मज़ाक़ उड़ाता पेड़ दिनभर। 


फलों का भार लादे लचकदार होकर 

जीना सिखाता पेड़ दिनभर, 

पढ़ने जाती नन्हीं मुनिया को 

बढ़ते हुए देखता पेड़ दिनभर। 


खेतों में पसीना बहाते मेहनतकशों को 

मिलीं गालियाँ सुनता पेड़ दिनभर,

सबूत मिटाकर सफ़ेदपोश बने 

अपराधी के अपराध गिनता है पेड़ दिनभर। 


क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर... 

सारे भले कार्य करता है पेड़ दिनभर,

मरकर भी हमारा पेट भर जाता है शजर  

फिर क्यों काटा जाता है पेड़ दिनभर ? 

© रवीन्द्र सिंह यादव 




गुरुवार, 25 जुलाई 2019

करगिल विजय दिवस

वह 1999 का वर्ष था,

दोस्ताना अंदाज़ और अपार हर्ष था।  


जब अटल जी पहुँचे थे

दिल्ली से बस द्वारा लाहौर, 

दोस्ती की ख़ुशबू से 

महके थे दोनों देशों के ठौर। 


जब पींगें बढ़ी मित्रता की 

था फरवरी महीना,

पाकिस्तानी सेना को रास न आया 

दो मुल्कों का अमन से जीना। 


उधर धीरे-धीरे रच डाला  

साज़िश मक्कारी का खेल, 

साबित किया पाकिस्तान ने 

मुमकिन नहीं केर-बेर का मेल। 


अन्तरराष्ट्रीय समझौते की आत्मा रौंद 

घुसी पाकिस्तानी सेना चोरी से करगिल में, 

षडयंत्र का भंडाफोड़ हुआ तो 

टीस चुभी प्रबुद्ध मानवता के दिल में। 


3 मई से 26 जुलाई, 

चली हौसलों और बलिदान की भीषण लड़ाई। 

थल सेना ने जाँबाज़  गंवाकर सरज़मीं बचाई,  

दुश्मन से करगिल पहाड़ी ख़ाली करवायी। 


सर पर कफ़न बाँधकर

रण में कूदे थे भारत माँ के लाल,

दुश्मन को धूल चटाकर 

किया गर्वोन्नत हर भारतवासी का भाल। 


शत्रु  बैठा था रणनीति बनाकर, 

पर्याप्त ऊँचाई पर बंकर बनाकर। 

भारत माँ ने 527 प्यारे सपूत गँवाये, 

लिपटे हुए तिरंगे में सरहद से घर आये। 


सरहद की माटी में मिल गये 

प्रतीक्षा के सारे सिंदूरी सपने,

राखी, कंगन, तिलक रह गये 

बसकर बेबस यादों में अपने।  
  

क़ुर्बानी की ज्योति बनकर 

सीमा पर जो उजियारा है,

डटे रहो हे सैनिक दमभर 

शत-शत  नमन हमारा है।        

©रवीन्द्र सिंह यादव 




शुक्रवार, 7 जून 2019

पर्यावरण अधिकारी




 प्रकृति की, 

स्तब्धकारी ख़ामोशी की, 

गहन व्याख्या करते-करते, 

पुरखा-पुरखिन भी निढाल हो गए, 

सागर, नदियाँ, झरने, पर्वत-पहाड़, 

पोखर-ताल, जीवधारी, हरियाली, झाड़-झँखाड़,

क्या मानव के मातहत निहाल हो गए?

नहीं!... कदापि नहीं!!

औद्योगिक क्राँति, पूँजी का ध्रुवीकरण, 

बेचारा सहमा सकुचाया मासूम पर्यावरण,

खोता जा रहा क़ुदरती आवरण। 


अड़ा है अपने कर्तव्य पर,

एक सरकारी पर्यावरण अधिकारी, 

पर्यावरण क्लियरेंस लेना चाहता है, 

निजी प्रोजेक्ट अधिकारी,

साम-दाम-दंड-भेद सब असफल हुए,

चरित्र ख़रीदने के प्रयास निष्फल हुए,  

अंततः याचक ने कारण पूछा,

सरकारी पर्यावरण अधिकारी, 

प्रस्तावित प्रोजेक्ट-साइट पर जाकर बोला-

देखो! वर्षों पुराना इको-सिस्टम, 

पेड़-पौधों पर छायी हसीं रुमानियत, 

कोयल की कुहू-कुहू, 

कौए की काँव-काँव, 

मयूर का मनोहारी नृत्य,

ऑक्सीजन का घनत्व,  

हिरणों की चंचलता, 

चींटियों की निरंतरता,  

चिड़ियों के प्यारे घोंसले,

बघारना लोमड़ी के चोचले,  

तनों में साँप के कोटर,

दादुर की टर्र-टर्र,  

अँधेरी सुनसान यामिनी में, 

दीप्ति उत्पन्न करते, 

जुगनू का निवास,

पेड़ की लचकदार टहनियों पर, 

तुतलाते तोतों का विलास,

प्रकृति का रसमय संगीत, 

फूल-तितली की पावन प्रीत, 

भँवरों का मधुर गुँजन

टिटहरी का करुण क्रंदन   

बंदरों की उछल-कूद, 

मीठे-रसीले अमरुद...

इन्हें मिटाकर, 

क्या पैदा करोगे...!  

ज़हरीला धुआँ, प्रदूषित जल, 

ध्वनि प्रदूषण, मृद्दा प्रदूषण,

कुंद विवेक, वैचारिक प्रदूषण,   

सीमेंट-सरिया का जंगल,

ख़ुद के लिए मंगल, 

रोगों का स्रोत, 

लाचारों की मौत, 

पूँजी का अंबार, 

उत्पादों का बाज़ार, 

मालिक मालामाल, 

उपभोक्ता कंगाल...


निजी प्रोजेक्ट अधिकारी,

चिढ़कर टोकते हुए बोला-

विकास के लिए, 

ये क़ुर्बानियाँ स्वाभाविक हैं, 

पर्यावरण अधिकारी ने अपना निर्णय सुनाया, 

फ़ाइल पर "नो क्लियरेंस" का टैग लगाया, 

मालिक ने मंत्री को फोन लगाया,

पूछा- प्रकृति-प्रेमी सरस्वती-पुत्र को,

ऐसा पद क्यों थमाया?

अब तक कोई सहयोगी, 

लक्ष्मी-पुत्र आपके हाथ नहीं आया?   

यह कैसी "ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस" नीति है?  

हमारे साथ घोर अनीति है! 

 @रवीन्द्र सिंह यादव  


चित्र साभार : मुकुंद 

शुक्रवार, 31 मई 2019

प्रतिबद्धिता




                                      
                                      
तेज़ हवा अचानक बही 

तो नदी में ऊँची लहरें उठीं

नाविक का आत्मविश्वास

हौले-हौले डगमगाया

तो नाव भी डाँवाँडोल हुई

नाव पर सवार यात्री

मझधार में भयाक्रांत हुए

सभी कुशल तैराक न थे

नाविक का अस्थिर हौसला

बढ़ाने के अतिरिक्त

कोई सार्थक उपाय न था

कोई बोला-

क्या हम सबको डुबाओगे?

ठीक है आप आइये

पतवार थामिए

सबको पार लगाइये

नाविक खीझकर बोला

किनारों पर खड़े

दिलेर तैराक

कूद गये क्रुद्ध लहरों के बीच

सहारा दिया नाव को

घबराये यात्रियों को तसल्ली दी 

नाविक का जोश वापस आया

नाव पार लगी

यात्रियों ने जाँबाज़ तैराकों का

आभार माना

अभिनंदन किया 

उनकी प्रतिबद्धिता

अब जीवन के प्रति और प्रगाढ़ हो गयी।

© रवीन्द्र सिंह यादव 
      

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

नक़्शा


उस दिन बिटिया नाराज़ हुई थी 

तब चौथी कक्षा में पढ़ती थी 

भूगोल की परीक्षा में 

नक़्शा बनाने के भी नंबर  थे 

नक़्शे बनाते-बनाते 

उसे ग़ुस्सा आया 

मेरे पास आयी 

हाथ में थे कई काग़ज़ 

जिन पर बने थे कई नक़्शे 

लेकिन नहीं थे बनाने जैसे 

बालसुलभ तमतमाहट के साथ 

पूछा मुझसे-

ये नक़्शे टेढ़े-मेढ़े क्यों होते हैं ?

बड़े होकर समझना 

नक़्शों का बदलना     

नक़्शों का मिटना 

नक़्शों में समायी भावना

नक़्शों में निहित संभावना 

तिरोहित होती है भाईचारे की भावना    

क़ुदरत ने दिया था 

बस एक ही नक़्शा भूमि-जल से चहकता  

घुसेड़ दी है हमने नक़्शे में 

विस्तारवादी / संकीर्ण मानसिकता

राजनीति रणनीति और सुरक्षा 

नक़्शे की जड़ में छिपी है महत्त्वाकांक्षा

नक़्शों में सिमटी है आज दुनिया 

सुनते-सुनते गंभीर हुई मुनिया। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 20 मार्च 2019

हाँ! मैं पुण्य प्रसून बाजपेयी हूँ!


हाँ! मैं पुण्य प्रसून बाजपेयी हूँ!
हाँ! मैं जनता के प्रति
एक नन्हीं-सी जवाबदेही हूँ।  

पूँजी की आक्रामकता के दौर में
पाखंड, अहंकार, दम्भ और दमन रोकने  
हाँ! मैं एक कठोर-सी देहरी हूँ। 

पलायन, लाचारी, बेकारी के तूफ़ान में
पत्रकारिता के मानदंड और आत्मा
बचाये रखने हेतु
हाँ! मैं एक सजग प्रहरी हूँ।

देखता हूँ दारिद्र्य और देहात भी
एक हक़ीक़त-भरी ख़ुशबू हूँ बेताब बिखरने के लिये
आपको आगाह करता
हाँ! मैं एक शहरी हूँ।

मेरी नौकरी के पीछे पड़ी है
डरपोक सत्ता
सालभर में तीसरी नौकरी से जा रहा हूँ मैं
हाँ! मैं लोकतंत्र के सवालों की दहकती दुपहरी हूँ
हाँ! मैं पुण्य प्रसून बाजपेयी हूँ!  
© रवीन्द्र सिंह यादव 

रविवार, 3 मार्च 2019

कविता और न्याय

 समाचार आया है -

"अदालत ने हत्या के अपराधी की कविताएँ पढ़कर मौत की सज़ा को आजीवन कारावास में बदला"


सर्वोच्च न्यायालय का 

न्याय सुनो 

मख़मली भावों की 

ख़ूबसूरत क़ालीन बुनो 

22 वर्ष की आयु में 

मासूम बच्चे का अपहरण 

फिर हत्या कर डाली 

क़ानून के लम्बे हाथों ने 

ले गिरफ़्त में 

बेड़ियाँ कसकर डालीं 

उच्च न्यायालय से 

फाँसी का 

फ़रमान हुआ

अपराधी घबराकर 

हलकान हुआ

रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर/

दुर्लभ से दुर्लभतम मामला 

आख़िरी अदालत तक आ पहुँचा 

18 साल कारावास में रहकर 

पढ़ते-पढ़ते बी.ए. तक आ पहुँचा 

पश्चाताप और प्राश्यचित की 

ज्वाला में धधक उठा 

कल्मष हृदय से साफ़ हुआ 

संवेदना का परिंदा चहक उठा 

सृजन की 

रसमय निर्मल रसधार बही

हृदय परिवर्तन की 

मर्मस्पर्शी बयार बही

आत्मग्लानि आत्मवंचना से 

उबरूँ कैसे 

उमड़े विचार 

कैसे-कैसे    

अपराधी की क़लम ने 

रच डाला कविताओं का सुन्दर संसार

छूआ न्यायाधीशों के मर्म को बार-बार 

सज़ा-ए-मौत      

आजीवन कारावास में तब्दील हुई

कविता और न्याय की 

सुरभित गरिमा 

अपराधी को फ़ील हुई।  

© रवीन्द्र सिंह यादव  

पाठकों से अपील: इस रचना को एक अबोध बच्चे के हत्यारे का महिमामंडन न समझा जाय बस कविता के महत्त्व पर विचार किया जाय।      

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

कन्धों पर सरहद के जाँबाज़ प्रहरी आ गये

मातम का माहौल है 

कन्धों पर सरहद के

जाँबाज़ प्रहरी आ गये 

देश में शब्दाडम्बर के 

उन्मादी बादल छा गये 

रणबाँकुरों का रक्त 

सड़कों पर बहा 

भारत ने आतंक का 

ख़ूनी ज़ख़्म सहा 

बदला! बदला!!

आज पुकारे देश हमारा

गूँज रहा है 

गली-चौराहे पर 

बस यही नारा 
 
बदला हम लेंगे 

फिर वे लेंगे....  

बदला हम लेंगे 

फिर वे लेंगे....

हम.... 

फिर वे......

केंडिल मार्च में 

भारी आक्रोशित मन होगा 
   
मातम इधर होगा

मातम उधर भी होगा

हासिल क्या होगा 

यह अंतहीन सिलसिला 

ख़त्म हो 

समाधान हो

विवेक जाग्रत हो 

सेना सक्षम हो

निर्णय क्षमता विकसित हो

स्टूडियो में एंकर लड़ते युद्ध

रैलियों में नेता भीड़ करते क्रुद्ध

लाल बहादुर शास्त्री से सीखो 

निर्णय लेना

जय जवान 

जय किसान 

तब इतराकर कहना

भय से मिलता वोट 

जिन्हें वे अब जानें  

मत समझो सस्ती हैं 

धरती के लालों की जानें !

दुश्मन को सक्षम सेना सबक़ सिखायेगी, 

बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनायेगी। 

© रवीन्द्र सिंह यादव     

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019

बसंत (वर्ण पिरामिड)

मन  भर  हुलास
आया मधुमास 
कूकी कोकिला
कूजे  पंछी    
बसंत 
छाया 
है। 

लो  
आया  
बसंत
ऋतुराज  
फूले पलाश 
मादक बयार  
है बसंत बहार।

हैं 
खेत
बंसती
जाग रही    
आम्र मंजरी
सोने चल पड़ी 
उदास शीत ऋतु।  
© रवीन्द्र सिंह यादव  

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...