साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
शनिवार, 2 जून 2018
गुज़रे हुए सालों की तरफ़
गुज़रे हुए
सालों की तरफ़
दौड़ी है आज
थकी बेचैन नज़र
फ़िक़रे और तंज़ का
वो दौर
जिसमें नहीं था
कोई हम-सफ़र।
चाँद से माँगी थी
शबनम में भीगी
ठंडी चाँदनी
मगर सूरज
अड़ गया
दिखाने अपनी
शोलों-सी मर्दानगी।
धूप सहन न हुई
तो आये
पीपल के
घने साये में
हवा को न जाने
क्या हुआ
उड़ा ले गयी पत्ते
किसी के बहकाबे में।
शहर से
आया था गाँव
शुद्ध हवा की ख़ातिर
पेड़ काटे
ईंट-भट्टे में जला दिये
इंसान हो गया है
बड़ा शातिर।
चमन तक
साथ चले हम-नवा
बयाबान आया
तो किनारा कर गये
वक़्त के साथ
बदला है इंसान भी
वो पीठ पर वार
दोबारा कर गये।
बयाबान आया
तो किनारा कर गये
वक़्त के साथ
बदला है इंसान भी
वो पीठ पर वार
दोबारा कर गये।
#रवीन्द्र सिंह यादव
रविवार, 27 मई 2018
तीन क्षणिकाऐं
क्षणिकाऐं
स्वप्न-महल
बनते हैं महल
सुन्दर सपनों के
चुनकर
उम्मीदों के
नाज़ुक तिनके
लाता है वक़्त
बेरहम तूफ़ान
जाते हैं बिखर
तिनके-तिनके।
सफ़र
जीवन के
लम्बे सफ़र में
समझ लेता है
दिल जिसे हमराही
दो क़दम
साथ चलकर
बिछड़ जाते हैं
बेड़ियाँ हालात की
बनती हैं कब सवाली।
जुदाई
मिलन के लम्हात
गुज़रे
पहलू में बैठे-बैठे
सुनते रहे
बुलबुल की सदायें
होंठों को दबाये-दबाये
जब मिला
जुदाई का ग़म
मतलब-ए-उल्फ़त को
समझ सके हैं हम।
#रवीन्द्र सिंह यादव
बुधवार, 23 मई 2018
लोगों को इंसाफ़ कैसे मिलेगा ?
दादा (पोते से ): कोई नया समाचार हो तो सुनाओ.....
पोता : सब बासी समाचार हैं, हाँ एक ताज़ा समाचार है।
दादा : क्या है, सुनाओ।
पोता : तमिलनाडु में कॉपर प्लांट का विरोध कर रही भीड़ पर पुलिस ने
गोली चलाई,कई घायल; 11 मरे !
दादा : राम-राम !!! लोग क्यों कर रहे थे विरोध ?
पोता : फैक्टरी प्रदूषण फैला रही है। लोगों का जीना दूभर हो गया है।
दादा : लोगों का विरोध तो जाएज़ है तो गोली क्यों चलाई पुलिस ने ?
पोता : पुलिस का कहना है कि भीड़ हिंसक होकर अनियंत्रित हो गयी थी।
दादा : हिंसक प्रदर्शन तो ना-जाएज़ है लेकिन पुलिस गोली चलाने के अलावा
कोई और विकल्प क्यों नहीं अपनाती ?
पोता : हाँ, किन्तु लोग 100 दिन से प्लांट बंद करने की शांतिपूर्ण माँग कर रहे थे।
प्लांट तक जाने से पुलिस ने लोगों को रोका क्योंकि हाई कोर्ट ने प्लांट की
सुरक्षा का आदेश दिया है।
दादा : वाह ! नागरिकों की सुरक्षा का क्या? सरकार अहिंसक आन्दोलनों की आवाज़
नहीं सुनती तो लोग धैर्य खोने लगते हैं परन्तु हिंसा पर उतर आना किसी
समस्या का हल नहीं है।
पोता : सरकार ने मुआवज़े की घोषणा कर दी है। मृतक के परिजन को
सरकारी नौकरी और 10 लाख रुपये।
दादा : लोगों की जान लेकर सरकार राहत की घोषणा क्यों करती है ?
पोता: मामले को ठंडा करने और लोगों का क्रोध शांत करने के लिए।
दादा : जब सरकार को मालूम है कि प्लांट प्रदूषण फैला रहा है तो
बंद क्यों नहीं करवाती ?
पोता :बहुराष्ट्रीय कम्पनी का प्लांट है।
दादा : तो क्या हुआ, लोगों की ज़िन्दगी से खिलवाड़ की इजाज़त उसे किसने दी ?
पोता : यह बड़ा खेल है।
दादा : कुछ समझाओ भी।
पोता : ऐसी कम्पनियाँ अधिकारियों को रिश्वत देती हैं और राजनैतिक दलों
(सत्तापक्ष और विपक्ष ) को मुँह भरकर चंदा देती हैं तथा कुछ नेताओं
की सिफ़ारिश पर होशियार-मज़बूर, चतुर-चालाक और धूर्त लोगों को
नौकरियाँ देती हैं। बदले में सरकारों से ना-जाएज़ सहूलियतें हासिल करती हैं।
दादा : फिर लोगों को इंसाफ़ कैसे मिलेगा ? चंदा सरकारों को लाचार बना देता है।
पोता : कुछ लोग एनजीओ के ज़रिये अपना और देश का हित साध रहे हैं,
मानवाधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। अब तो भारत सरकार ने क़ानून बना
दिया है -
"सन 1976 से अब तक राजनैतिक दलों द्वारा स्वीकार किये गये अवैध
विदेशी चंदे की कोई जाँच नहीं होगी।"
दादा : तुम्हारी बातों से मेरा मन व्यथित हो चला है। अब मुझे अकेला छोड़ दो
ताकि उन बिलखते परिवारों, घायलों और जान क़ुर्बान करने वालों के
लिए प्रार्थना कर सकूँ।
( दादा जी ध्यानमग्न हो गये , पोता सोशल मीडिया पर ऑनलाइन प्रतिक्रिया लिखने में व्यस्त हो गया। )
#रवीन्द्र सिंह यादव
पोता : सब बासी समाचार हैं, हाँ एक ताज़ा समाचार है।
दादा : क्या है, सुनाओ।
पोता : तमिलनाडु में कॉपर प्लांट का विरोध कर रही भीड़ पर पुलिस ने
गोली चलाई,कई घायल; 11 मरे !
दादा : राम-राम !!! लोग क्यों कर रहे थे विरोध ?
पोता : फैक्टरी प्रदूषण फैला रही है। लोगों का जीना दूभर हो गया है।
दादा : लोगों का विरोध तो जाएज़ है तो गोली क्यों चलाई पुलिस ने ?
पोता : पुलिस का कहना है कि भीड़ हिंसक होकर अनियंत्रित हो गयी थी।
दादा : हिंसक प्रदर्शन तो ना-जाएज़ है लेकिन पुलिस गोली चलाने के अलावा
कोई और विकल्प क्यों नहीं अपनाती ?
पोता : हाँ, किन्तु लोग 100 दिन से प्लांट बंद करने की शांतिपूर्ण माँग कर रहे थे।
प्लांट तक जाने से पुलिस ने लोगों को रोका क्योंकि हाई कोर्ट ने प्लांट की
सुरक्षा का आदेश दिया है।
दादा : वाह ! नागरिकों की सुरक्षा का क्या? सरकार अहिंसक आन्दोलनों की आवाज़
नहीं सुनती तो लोग धैर्य खोने लगते हैं परन्तु हिंसा पर उतर आना किसी
समस्या का हल नहीं है।
पोता : सरकार ने मुआवज़े की घोषणा कर दी है। मृतक के परिजन को
सरकारी नौकरी और 10 लाख रुपये।
दादा : लोगों की जान लेकर सरकार राहत की घोषणा क्यों करती है ?
पोता: मामले को ठंडा करने और लोगों का क्रोध शांत करने के लिए।
दादा : जब सरकार को मालूम है कि प्लांट प्रदूषण फैला रहा है तो
बंद क्यों नहीं करवाती ?
पोता :बहुराष्ट्रीय कम्पनी का प्लांट है।
दादा : तो क्या हुआ, लोगों की ज़िन्दगी से खिलवाड़ की इजाज़त उसे किसने दी ?
पोता : यह बड़ा खेल है।
दादा : कुछ समझाओ भी।
पोता : ऐसी कम्पनियाँ अधिकारियों को रिश्वत देती हैं और राजनैतिक दलों
(सत्तापक्ष और विपक्ष ) को मुँह भरकर चंदा देती हैं तथा कुछ नेताओं
की सिफ़ारिश पर होशियार-मज़बूर, चतुर-चालाक और धूर्त लोगों को
नौकरियाँ देती हैं। बदले में सरकारों से ना-जाएज़ सहूलियतें हासिल करती हैं।
दादा : फिर लोगों को इंसाफ़ कैसे मिलेगा ? चंदा सरकारों को लाचार बना देता है।
पोता : कुछ लोग एनजीओ के ज़रिये अपना और देश का हित साध रहे हैं,
मानवाधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। अब तो भारत सरकार ने क़ानून बना
दिया है -
"सन 1976 से अब तक राजनैतिक दलों द्वारा स्वीकार किये गये अवैध
विदेशी चंदे की कोई जाँच नहीं होगी।"
दादा : तुम्हारी बातों से मेरा मन व्यथित हो चला है। अब मुझे अकेला छोड़ दो
ताकि उन बिलखते परिवारों, घायलों और जान क़ुर्बान करने वालों के
लिए प्रार्थना कर सकूँ।
( दादा जी ध्यानमग्न हो गये , पोता सोशल मीडिया पर ऑनलाइन प्रतिक्रिया लिखने में व्यस्त हो गया। )
#रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 19 मई 2018
आओ! राष्ट्रीय-चरित्र पर मंथन करें.....
आओ!
मनगढ़ंत, मनपसन्द, मन-मुआफ़िक, मन-मर्ज़ी का
इतिहास पढ़ें,
अज्ञानता का विराट मनभावन
आनंदलोक गढ़ें।
आओ!
बदल डालें
सब इमारतों, गलियों, शहरों, सड़कों, संस्थानों के नाम,
लिख दें बस अपने-अपनों के नाम।
आओ!
बदल डालें
कुछ क़ानून-क़ाएदे भी,
होंगे दूरगामी फ़ाएदे भी।
आओ!
पाठ्यक्रम भी बदल डालें,
अपनों को उपकृत करें और बौद्धिक विकास में भी ख़लल डालें।
आओ!
पेपर लीक कर लें,
प्रतिभा को रौंदकर अपनी तिजोरी भर लें।
आओ!
कॉर्पोरेट के तलवे चाटें,
राष्ट्रीय सम्पदा लुटाएँ और चंदे की ख़ैरात को आपस में बाँटें।
आओ!
बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक खेल खेलें,
काटें नफ़रत से उगाई फ़सल व बेलें।
आओ!
राष्ट्रवाद का नगाड़ा बजाएँ,
शून्य से मुद्दों को पैदाकर अखाड़ा बनाएँ।
आओ!
नई पीढ़ी का भविष्य सँवारें,
किंतु कैसे ?
परिष्कृत ज्ञान और दक्षता के लिये
कब तक विदेश के पाँव पखारें ?
आओ!
राष्ट्रीय-चरित्र पर मंथन करें,
कल के लिये आत्मावलोकन करें।
#रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 12 मई 2018
मेहमान को जूते में परोसी मिठाई.....
समाचार आया है-
"इज़राइली राजकीय भोज में जापानी प्रधानमंत्री को
जूते में परोसी मिठाई!"
ग़ज़ब है जूते को
टेबल पर सजाने की ढिठाई !!
दम्भ और आक्रामकता में डूबा
एक अहंकारी देश
भूल गया है
मेहमान-नवाज़ी का पाक परिवेश
परोसता है मिठाई मेहमान को
चॉकलेट से बने जूते में
आधुनिकता की अंधी दौड़ में
इस रचनात्मक (?) मज़ाक़ के
सांस्कृतिक निहितार्थ समझना
नहीं है इनके बूते में !
#रवीन्द्र सिंह यादव
शब्दार्थ /WORD MEANINGS
शब्दार्थ /WORD MEANINGS
ग़ज़ब = क्रोध, प्रकोप, ग़ुस्सा / ANGER, FURY, RAGE
ढिठाई = धृष्टता, ढीठपन, गुस्ताख़ी / AFFRONT, ARROGANCE
दम्भ = पाखण्ड, ढोंग, कथनी-करनी का अलग-अलग होना / HYPOCRISY
मेहमान-नवाज़ी = अतिथि-सत्कार / HOSPITALITY
पाक = पवित्र, शुद्ध / PURE, HOLY
परिवेश = माहौल, वातावरण, परिधि / SURROUNDING
रचनात्मक = निर्माण / रचना सम्बन्धी / CREATIVE, CONSTRUCTIVE
मज़ाक़ = परिहास, खिल्ली / TEASE
शुक्रवार, 4 मई 2018
बैसाख में मौसम बेईमान

कहीं बादल रहे उमड़
कहीं आँधी रही घुमड़
अब आ गयी धूप
चुभती चिलचिलाती
अब सूखे कंठ से
चिड़िया गीत न गाती
कोयल को तो मिल गया
आमों से लकदक बाग़
कौआ ढूँढ़ रहा है मटका
गाता फिरे बेसुरा राग
चैतभर काटी फ़सल
बैसाख में खलिहान
आसमान को ताकता
बेबस निरीह किसान
आसमान को ताकता
बेबस निरीह किसान
बदला रुख़ आसमान का
आँधी-पानी का हो-हल्ला
उड़ जाता भूसे का ढेर
गीला होता सारा गल्ला
आँधियाँ ले लेती हैं
कितनों की जान
आँधियाँ ले लेती हैं
कितनों की जान
क़ुदरत कब होगी मेहरबाँ?
कठिन दौर में होता अक़्सर
क्यों मौसम भी बेईमान ?
#रवीन्द्र सिंह यादव
#रवीन्द्र सिंह यादव
शब्दार्थ / WORD MEANINGS
खलिहान = वह स्थान जहाँ फ़सल को काटकर एकत्र किया जाता है / BARN
गल्ला = अनाज , अन्न / FOOD GRAINS
गुरुवार, 3 मई 2018
नींद
बचपन में समय पर
आती थी नींद,
कहानी दादा-दादी की
लाती थी नींद।
अब आँखों में
किसी की तस्वीर बस गयी है,
नींद भी क्या करती
कहीं और जाकर बस गयी है।
#रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 28 अप्रैल 2018
न्याय-तंत्र ही माँगे न्याय...
लोकतंत्र का एक खम्भा
कहलाती न्याय-व्यवस्था,
न्याय-तंत्र ही माँगे न्याय
आयी कैसी जटिल अवस्था।
इंसाफ़ के लिए
वर्षों से
लाचार
जनता तड़पती देखो,
वर्चस्व के लिए
अब आपस में
न्याय-व्यवस्था
झगड़ती देखो।
सत्ता और
न्याय-व्यवस्था में
दोस्ती और
साँठगाँठ का अनुमान,
गुज़रेगा यह
दुश्वारियों का दौर भी
फ़ैसले करेंगे दूर
फ़ुतूर और गुमान।
#रवीन्द्र सिंह यादव
सोमवार, 23 अप्रैल 2018
ज़िंदगी का सफ़र
रस्म-ए-वफ़ा निभाने की
कोशिशें करते रहे ,
हर क़दम पे पुर-असर
नुमाइशें करते रहे।
सुलगती याद
फैली हुई है चार सू,
ग़म-ज़दा होने की और
फ़रमाइशें करते रहे।
उन प्यारी निगाहों में
जला दिये ग़म के दिये,
अपने लिये इश्क़ में
हज़ार बंदिशें करते रहे।
उन प्यारी निगाहों में
जला दिये ग़म के दिये,
अपने लिये इश्क़ में
हज़ार बंदिशें करते रहे।
आरज़ू के साथ-साथ
मायूसियाँ भी चलीं,
मोहब्बत की राह में
गुंजाइशें करते रहे।
वो आइना जिसमें
छाये थे जल्वे ही जल्वे,
गवारा उसकी सब
रंजिशें करते रहे।
वक़्त-ए-गर्दिश की
लकीर से अलाहिदा,
ज़ख़्म-ए-वफ़ा की
पैमाइशें करते रहे।
बेहया बादल न आये
एक पुराना ज़ख़्म धोने,
वक़्त-बे-वक़्त आँसू
बारिशें करते रहे।
हवाऐं आती रहीं
मोहब्बत के जज़ीरे से,
हम दफ़्न अपनी
ख़्वाहिशें करते रहे।
बेहया बादल न आये
एक पुराना ज़ख़्म धोने,
वक़्त-बे-वक़्त आँसू
बारिशें करते रहे।
हवाऐं आती रहीं
मोहब्बत के जज़ीरे से,
हम दफ़्न अपनी
ख़्वाहिशें करते रहे।
#रवीन्द्र सिंह यादव
शब्दार्थ / WORD MEANINGS
शब्दार्थ / WORD MEANINGS
रस्म-ए-वफ़ा = वफ़ादारी का दस्तूर / FAITHFULNESS'S RITUAL
नुमाइशें (नुमाइश) = प्रदर्शनी / SHOW , EXHIBITIONS
नुमाइशें (नुमाइश) = प्रदर्शनी / SHOW , EXHIBITIONS
पुर-असर=पूरी तरह असरदार / FULLY EFFECTIVE
सू= ओर ,से , तरफ़ ,दिशा / DIRECTION ,SIDE
ग़म-ज़दा = उदास, अवसादग्रस्त / MELANCHOLIC
फ़रमाइशें (फ़रमाइश) = अनुरोध / REQUEST
बंदिशें (बंदिश) = रोक,बंधन,सीमा-बंधन,संयम / RESTRICTION
बंदिशें (बंदिश) = रोक,बंधन,सीमा-बंधन,संयम / RESTRICTION
मायूसियाँ (मायूसी) = निराशा / DISAPPOINTMENT
आरज़ू = चाहत, इच्छा, मनोकामना / DESIRE ,WISH
गुंजाइशें (गुंजाइश ) = क्षमता / CAPACITY
जल्वे (जल्वा ) = रौशनी / LUSTRE ,SOFT GLOW , SHINE
गवारा = सहने योग्य / TOLERABLE, BEARABLE
रंजिशें (रंजिश) = बैर, विरोध, शत्रुता / HOSTILITY
वक़्त-ए-गर्दिश = बुरा समय, कठिन दौर / Movement of time
लकीर = रेखा ,पंक्ति / LINE, STREAK
अलाहिदा = अलग, पृथक / DIFFERENT, SEPARATE, APART
ज़ख़्म-ए-वफ़ा = वफ़ादारी का घाव / SORE / GASH OF CONSTANCY
पैमाइशें (पैमाइश) = माप, नापतौल / MEASUREMENT
बे-वक़्त = समय से पूर्व, तय समय से पहले / UNTIMELY
वक़्त-बे-वक़्त = कभी भी , किसी भी समय, किसी भी मौक़े पर / ANY TIME
बे-वक़्त = समय से पूर्व, तय समय से पहले / UNTIMELY
वक़्त-बे-वक़्त = कभी भी , किसी भी समय, किसी भी मौक़े पर / ANY TIME
जज़ीरे (जज़ीरा) = द्वीप / ISLANDS
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