मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

अवसान की अवधारणाएँ

जटिलताएँ जीवन कीं  

सापेक्ष आलोकित हैं 

अस्तित्त्व-वेदना का 
  
पराभवपरायण होना 

अनंत और विस्तृत है

अखिल व्योम में व्याप्त हैं 

अवसान की अवधारणाएँ 

मधु-मालती तो खिल उठी 

दुर्भावनाएँ आशंकाएँ परे रख 

बेरी पर बचा है बस एक बेर

बीतते बूढ़े बसंत का  

डाली झुका स्वाद चख। 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव   

काल-चक्र

पराजयबोध लिए 

बैठा है मानव 

करोना-काल के 

दुष्कर दुर्दिन में 

भोर-बेला में 

शांत है नदी तट 

दोपहर में 

सन्नाटे को 

गले लगाए है 

वयोवृद्ध विशाल वट

विरह वेदना में 

विचलित है 

सिंदूरी संध्या 

झील में डूबता 

रक्ताभ सूरज 

तलाश रहा है 

विस्फारित नेत्रों से 

प्रकृति का 

कुशल चितेरा 

उदासियों का 

गठा गट्ठर लादे 

बीतेगी अपनी गति से 

अतल अवसाद की 

स्याह ओढ़नी ओढ़े 

झुँझलाई यामिनी

काल का कलन करता 

अभिमान को रौंदता

आएगा एक और सबेरा।

© रवीन्द्र सिंह यादव  

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

कश्ती के मुसाफ़िर को

कश्ती के 

मुसाफ़िर को

साहिल की 

है दरकार

बिफरा समुंदर  

अपनी मर्यादा 

लाँघ जाता 

है कभी-कभार

सुदूर किनारे पर 

वो उदास पेड़ की 

शाख़ पर   

शोख़ हवा की 

है शबनमी लहकार 

है तसल्ली 

बस इतनी

अब तक 

साथ निभाती  

अपने हाथ 

है पतवार।   

© रवीन्द्र सिंह यादव 

रविवार, 19 अप्रैल 2020

दरवाज़ा


पुकारने पर 

खटखटाने पर 

पीटने पर

साँकल बजाने पर  

खुल जाया करता था 

कॉल-बैल दबाने पर भी 

खुला करता था

घर का दरवाज़ा

अब मोबाइल 

अथवा रिमोट से 

खुलता है 

आधुनिक दरवाज़ा  

क्या हमारा दिमाग़ भी 

यांत्रिक/आधुनिक हो गया है?

दुर्घटना में घायल  

सड़क पर तड़पते

दंगों में जान लेते 

वहशी दरिंदों से 

जान की भीख माँगता 

निरपराध लाचार 

मॉब-लिंचिंग में 

खाल उधड़वाता 

हड्डियाँ तुड़वाता 

झेलता लाठी-सरियों के प्रहार

परिवेश में गूँजती चीख़-पुकार

दारुण हाहाकार

बच्चों पर भीषण अत्याचार  

शहरों से गाँव की ओर 

पैदल पलायन करते 

हिम्मती मज़दूरों के 

पाँवों के लहूलुहान छालों से

लाल होतीं सड़कें

प्रबुद्ध मानवता का 

सुकून छीनते मंज़र
  
हमारे सुन्न दिमाग़ के 

मज़बूत दरवाज़े पर 

लगे ताले को 

अब नहीं खोल पाते 

मुँह में ज़ुबान है 

पर नहीं बोल पाते। 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव   


शनिवार, 18 अप्रैल 2020

पराधीन मिथ्या स्वप्न

अचानक 

क्वारंटीन हुए 

एक पक्षी प्रेमी ने

क्वारंटीन सेंटर से 

मित्र को फोन किया

अपने प्यारे तोता-तोती को 

उसके घर ले जाने का 

अनुरोध किया 

पिंजड़े में बंद 

तोते चिंतामग्न थे

मालिक की 

करोना-वायरस बीमारी से 

विचलित थे  

सोच रहे थे-

मानव तुम हो बहुत भले

जल्दी हो जाओ चंगे-भले 

हमें सुंदर पिंजड़े में रखते हो 

नियमित इसे साफ़ करते हो 

दाना-पानी

मनचीते फल 

गाजर-हरी मिर्ची 

ताज़ा-ताज़ा लाते हो 

हमें पिजड़े में ही नहलाते हो 

सलाख़ें बहुत मज़बूत हैं 

लोहे के पिंजड़े कीं 

कभी ये गल जाएँ 

तेज़ाबी बारिश के छींटों की

ऐसी लक्षित बीम से 

जो सबको छोड़कर 

केवल सलाख़ों को गला दे 

हम मुक्ति का 

असीम आनंद लेते हुए 

पहले भरेंगे लंबी उड़ान

खुले आकाश में 

मिटा डालेंगे 

सारी मानसिक थकान  

लौटेंगे धरा पर 

ताज़ा हवा के इलाक़े में

मरुस्थल की ठंडी रेत में 

कुलाँचें भरेंगे

अपने-अपने पैरों-चोंचों से 

कुछ नया लिखेंगे

भुरभुरी रेत पर    

कल-कल करते झरने में 

पंख फड़फड़ाते हुए 

एक-दूसरे पर 

पानी के छींटे उलीचते हुए

जीभर के पहाड़ी स्रोत का 

मीठा नीर पिएँगे 

फिर लौटकर आएँगे 

तुम्हारे घर के सामने 

बूढ़े नीम की 

कभी फुनगी पर 

कभी छालरहित टहनी पर बैठ 

इत्मीनान से मुस्कुराएँगे 

तुम्हें कभी न चिढ़ाएँगे 

अपनी मुक्ति को 

आजीवन सँभालेंगे 

फिर किसी 

आज़ादी विरोधी स्वार्थी मानव के 

हाथ न आएँगे। 

©रवीन्द्र सिंह यादव


शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

समय की स्लेट पर

करोना काल के 

विवश साक्षी हैं हम,

ऐतिहासिक तारीख़ के साथ 

याद किए जाने के 

महत्त्वाकाँक्षी हैं हम। 

दर्ज हो रहे हैं

क़िस्से-दर-क़िस्से 

मानवता के विस्तार 

और संवेदनाविहीन व्यवहार के

समय की स्लेट पर 

लिखी जा रही है इबारत,

पूँजी के आसपास 

टिकी है 

सरकारी 

ग़ैर-सरकारी सोच 

खिड़कियाँ बनाना 

भूल गए हैं हम 

खड़ी कर दी है

भावशून्य इमारत

जिसमें सब दिखेंगे 

हाथ धोते हुए, 

चेहरे पर मास्क का 

अनचाहा भार ढोते हुए।

जिसके पृथक-पृथक तल में 

अपने-अपने कंधों पर 

लिए खड़े हैं हम अपनी लाशें,

विद्वता को नकार 

भीड़ में मुँह छिपाकर 

हम गिन रहे हैं 

अपनी बची-खुचीं सांसें।  

© रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

हत्यारे के घर में चाय-पानी

उस रोज़ 

सैर से लौटते हुए 

मित्र मुझे एक घर में 

अकारण ही ले गया

कोई काग़ज़ी लेनदेन था 

चाय-पानी के बाद 

हम अपने रास्ते पर आए। 


मैंने मित्र को छेड़ते हुए कहा-

"
जोड़ा बेमेल था।"

"
पहली 

इसके कुकर्मों के चलते 

आत्मदाह कर चल बसी 

दूसरी के हाथ 

पहली की हत्या की  

चिट्ठी हाथ लग गई

अब तलाक़ का 

केस चल रहा है

कइयों का घर 

झगड़े में पल रहा है  

यह जो तीसरी है 

दूसरी को 

तलाक़ की डिग्री 

मिलने पर 

विधिवत पत्नी हो जाएगी।"



मित्र की 

पहेलीनुमा बातें सुनकर 

मेरा सर 

चकरा गया

चलते-चलते 

लैम्प-पोस्ट से 

टकरा गया

सोचने लगा-

हत्यारे-

कलाप्रेमी

कलापारखी 

संगीतप्रेमी

प्रकृतिप्रेमी

पर्यावरणप्रेमी 

पक्षीप्रेमी

समाजसेवी

चेहरे पर 

शालीन मुस्कान लिए होते हैं!

उस घर में दिखी 

एक-एक वस्तु

मेरे ज़ेहन में 

ज़ोर-ज़ोर से 

हथौड़े-से 

निर्मम प्रहार करती हुई 

पूछ रही थी-

क्यों आए थे

एक हत्यारे के साथी के साथ 

हत्यारे के घर में?

©
रवीन्द्र सिंह यादव


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