शनिवार, 17 नवंबर 2018

चिड़िया और इंसान



चिड़िया और इंसान

हैं सदियों पुराने मित्र,

सभ्यता के सफ़र में

चिड़िया वही इंसान विचित्र।


छोटी-सी ज़िंदगानी में

चिड़िया अपने बच्चों को

सिखाती है ढेरों उपाय

बाज़, उल्लू, बिल्ली, साँप-से

शिकारियों से बचाव।


दूर क्षितिज तक उड़ना

पानी-धूल में नहाना

दाना चुगना 

नीड़ का निर्माण करना   

फुदकना चहचहाना 

साँझ-सकारे सामूहिक गान

सामूहिकता में सौहार्द सहमति 

समृद्धि हेतु क़ाएम रखना।


इंसान अपने बच्चों को

जीवनभर सिखाता है

जीने की गूढ़ कला,

फिर भी अब तक

इंसानी-समाज  

मन-मुआफ़िक़ क्यों नहीं ढला?
   
© रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

आईना


छींक अचानक आयी 
सामने था आईना,
क्या रखते हो अन्दर  
धुँधला हुआ आईना।

वक़्त--तपिश 
लेकर आयी गर्म हवा,  
धुँध छँट  गयी और 
साफ़ हुआ आईना। 

देखकर ख़ुद को 
ग़ुरूर था आसमान पर,
अपने-सा दिखा तो 
ना-गवार हुआ आईना।  

दरकतीं हैं बुलंद से बुलंद 
इमारतें ज़माने में
टूटा फिर भी पहचान से 
महरूम हुआ आईना। 

सहम जाते हैं लोग 
देखकर अपनी हक़ीक़त
बेरहम कभी मुद्दई 
कभी मुंसिफ़ हुआ आईना। 

औरों की आँखों में 
देख लेते हैं अक्स अपना
फिर भी ज़माने की 
दरकार हुआ आईना। 

जमती रहती है धूल 
गर रोज़ साफ़ किया
 हो अपनी नज़रों से गिरना    
निहायत ज़रूरी हुआ आईना। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

साँसें दिल्ली में (वर्ण पिरामिड)

ये 
स्मोग
श्वसन 
दमघोंटू 
छाया हवा में 
धुआँ-केमिकल 
प्रदूषण  का  फल। 


ये 
जानो 
पीएम* 
सूक्ष्म कण 
चालीस गुना 
बाल से महीन 
टू  पॉइंट  फाइव। 



है 
फैला 
ज़हर 
शरीर में 
खींचते हवा 
ज़िन्दगी के लिये 
धुंध  ही   प्राणवायु। 


ले 
आया 
बाज़ार 
समाधान 
साँस के लिये 
ख़रीदो मास्क या 
वायु    प्यूरीफायर।


है 
कौन 
जो देगा 
शुद्ध हवा 
पक्की गारण्टी
सोती     सरकार 
विवश    नागरिक। 


क्या 
आप 
दायित्व 
निभायेंगे 
पर्यावरण 
बचाना चुनौती 
दिल्ली रण भीषण। 


है 
दिल्ली 
आसरा 
आते लोग 
बसते जाते 
रोज़ी-रोटी नाम 
रोती  अंधी  सुरंग।



ये 
कैसे 
पड़ोसी 
राजधानी 
ढकी स्मोग से  
जलाते      पराली 
कोसते      सरकार। 


वे  
नादाँ 
पटाखे 
जलाते हैं 
भेजते ख़ुशी 
दूर-दूर   तक 
बढ़ाते प्रदूषण। 


हैं 
ख़ुश 
डॉक्टर 
प्रदूषण 
रोगी बढ़ाता
टूटती साँसें भी 
अदा करेंगी बिल। 


© रवीन्द्र सिंह यादव 



पीएम* = PARTICULATE MATTER 2.5 (बाल की मोटाई से चालीस गुना छोटा सूक्ष्म कण ) साँस के लिये घातक कण 










शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

प्रकृति को आने दो घर-द्वार

मन भर मन पर भार 

चल नहीं पाते उठाकर 

अब हम क़दम दो-चार 

पूर्वाग्रही सूचनाओं की 

आयी अजब  भरमार 

कहते फिर भी हम उसे 

निर्भीक  निष्पक्ष अख़बार 

ज़ेहनियत होती जाती बीमार 

समाया रग-रग में भ्रष्टाचार 

नैतिकता बेबस खड़ी उस पार

बदल गया है क़ायदा कारोबार

कहीं पौ-बारह कोई हुआ लाचार    

मन पर बढ़ता क्रोध का अम्बार 

परे होंगे त्रासद मनोविकार 

आओ छेड़ें सरगम के तार 

प्रकृति को आने दो घर-द्वार

सुनो बच्चों की चुलबुली पुकार

भरेगा भावुक ह्रदय  में प्यार।

© रवीन्द्र सिंह यादव



गुरुवार, 1 नवंबर 2018

माँ (वर्ण पिरामिड)


माँ  
सृष्टि 
स्पंदन  
अनुभूति 
सप्त-स्वर में 
गूँजता संगीत 
वट वृक्ष की छाँव।  


माँ 
आँसू 
ममता 
संवेदना  
गोद में लोक 
जीवन आलोक
निर्झर-सा प्रवाह। 


माँ 
शब्द 
क़लम 
रचना है 
कैनवास है 
सनी है रंग में  
कूची चित्रकार की। 


माँ 
बीज 
फ़सल 
खलिहान 
रोपती गुण 
काटे अवगुण 
संयम का भंडार। 


माँ 
थामे 
अँगुली 
देती ज्ञान 
मिथ्या संसार 
चरित्र-निर्माण 
संस्कारवान पथ। 


माँ 
फूल 
महक
बग़िया में 
मोहक कूक   
पालती उसूल 
दे थपकी गा लोरी।


माँ 
राग 
प्रकृति
अरुणिमा 
भावों का गाँव
प्यारी धूप-छाँव
गौरव जीवन का।       

© रवीन्द्र सिंह यादव


सोमवार, 29 अक्टूबर 2018

#MeeToo मी टू सैलाब ( वर्ण पिरामिड )


ये

मी टू

ले आया

रज़ामंदी

दोगलापन

बीमार ज़ेहन

मंज़र-ए-आम पे !



वो

मर्द

मासूम

कैसे होगा

छीनता  हक़

कुचलता रूह

दफ़्नकर ज़मीर !



क्यों

इश्क़

रोमांस

बदनाम

मी टू सैलाब

लाया है लगाम

ज़बरदस्ती को "न"





मानो

सामान

औरत को

रूह से रूह

करो महसूस

है ज़ाती दिलचस्पी।



है

चढ़ी

सभ्यता

दो सीढ़ियाँ

दिल हैं ख़ाली

तिजोरियाँ भरीं

भौतिकता है हावी।



हो

तुम

बौड़म

मानते हो

होठों पर न

स्त्री के दिल में हाँ

बे-बुनियाद    सोच।

© रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

जंगल में आग



जंगल की राजधानी  में


अचानक 

शरद ऋतु में 

गर्मी बढ़ी

हुई हवा से 

नज़ाकत नमी नदारत 

साँसों में बढ़ती ख़ुश्की 

बहुत हलकान ज़िन्दगी 

झरे पीले पत्ते पेड़ों से 

घाम में घिसटती घास 

तपन से मुरझा गयी

गर्म हवा ने रुख़ किया 

अपने आसमान का 

दबाव क्षेत्र निर्मित हुआ 

ठंडी हवा गर्म हवा का 

ख़ाली स्थान भरने 

प्रचंड वेग से बही 

सुदूर से आती हवा 

तीव्र तूफ़ान बनी 

विशाल वरिष्ठ वृद्ध वृक्षों की 

वक्र शुष्क टहनियाँ 

बाँस के गगनचुम्बी झुरमुट 

रगड़ने लगे आपस में 

चिंगारियाँ लम्बी हुईं 

उड़ने लगे पलीते 

दहकने लगे शोले 

सूखी घास सहायक हुई

जंगल में फैल गयीं 

आक्रामक आग की लपटें 

छा गया धुआँ ही धुआँ हर सू 

मासूम वन्य जीव 

जलकर टोस्ट बन गये 

जंगल का राजा सोता रहा 

सुरक्षित महल-सी माँद में 

पर्याप्त भोज्य भंडार के साथ 

अधजले घायल प्राणी

निकाल रहे थे भड़ास 

अपने निकम्मे गुप्तचर तंत्र पर 

माँद में भरा धुआँ 

बढ़ी असहनीय तपिश 

तब खाँसते हुए 

वनराज बाहर आया 

कराहते प्राणियों की पीड़ा देख 

मन ही मन ख़ुश हुआ 

अगले पल भावी भोजन की

गहन चिंता में मग्न हुआ 

जंगली मीडिया फूला समाया 

देखकर अपने पापों के सबूत

जलकर राख होने की 

प्रबल सम्भावना पर 

सुलगते भयावह जंगल को देख 

सजग सक्रिय बुद्धिजीवियों ने 

चिंतन बैठक आयोजित की 

सरकार से हवाई बौछार का 

विनम्र आग्रह किया 

पर्यावरणप्रेमी आगे आये 

हरियाली के झंडे बैनर लिये।
  

 © रवीन्द्र सिंह यादव

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...