| वो जो आप दूसरों की तबाही देख आहें-चीख़ें बेबस चीत्कार सुन मन ही मन ख़ुश हो रहे हो सदियों पुरानी कुंठा का नासूर सहला रहे हो! लानत है आपके सभ्य होने पर सामाजिक मूल्य खोकर जीने पर! © रवीन्द्र सिंह यादव |
साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
रविवार, 24 अप्रैल 2022
नासूर
शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022
ओखली और मूसल
जानते हो?
ओखली और मूसल
गाँव में घर-घर हुआ करते थे
वह रिदम
आज भी
गूँजती रहती है
मेरे भीतर
एक ही ओखली में
अम्मा-चाची
अपने-अपने
मूसल से धान कूटती थीं
साथ-साथ...
एक मूसल नीचे आता
तो दूसरा ऊपर जाता
कोई आपस में न टकराता
बीच-बीच में
ओखली में
हाथ का सरपट करतब
अनकुटे धान को
मूसल की चोटों के केन्द्र में लाता
मूसल-प्रहार से
उत्पन्न ध्वनि
कर्कश नहीं
संगीतमय हो जाती
मूसल की धमक
चूड़ियों की खनक
सुरीला राग बन
परिवेश में एकाकार हो जाती
देखते-देखते
धान की रूह फ़ना हो जाती
चावल अलग
और भूसी विलग हो जाती
चावल के दाने
चिड़िया के बच्चों के गले उतरना
आसान हो जाते
पंसेरी-दो-पंसेरी धान कूटकर
मूसल शांत हो जाते
सुकोमल कोंपलों को
छूकर आती बसंती बयार
स्नेह का स्पर्श लिए
डोलती आ जाती घर-द्वार
तब...
मूसल चलानेवाले पसीने में भीगे हाथ
निर्विकल्प पावन हो जाते
जब भूख और स्वाद
घुल-मिल तृप्ति हो जाते
कमाल का सामंजस्य था
तारतम्य और अभ्यास था
भावनाओं की उर्वरा खाद
बढ़ाती जीवट का स्वाद
हल्की हठीली
हँसी-ठिठोली
हास-परिहास था
बड़ी गृहस्थी
और संयुक्त परिवार के
ताने-बाने को
बिना टकराहट
संजोए रखने का
विराट भाव सहअस्तित्व का
परिवार से ग़ाएब क्या हुआ
तो दुनिया भी
उसे अनुभव करना
भूल गई
अपने-पराये के भेद में
निपुण हो गई
ख़ाली बासनों-सी
बजने लग गई!
© रवीन्द्र सिंह यादव
शब्दार्थ
पंसेरी = पाँच सेर वज़्न (एक सेर = 933 ग्राम )
विलग = पृथक, अलग, जोड़ा फूटना, साथ छूटना, विभक्त,असंबद्ध
सोमवार, 24 जनवरी 2022
रिक्शेवाले
रिक्शेवालों को
आलीशान बाज़ारों से
दूर
कर दिया गया है
झीने वस्त्र को
लौह-तार से सिया गया है
बहाना
बड़ा ख़ूबसूरत है
वे
पैदल चलनेवालों का भी
स्थान
घेर लेते हैं
सच तो यह है
कि
वे
अवरोधों से आक्रांत ग़रीब
मख़मल में टाट का पैबंद नज़र आते हैं
मशीनें
मानवश्रम का
मान घटाती ही चली जा रही हैं
रोज़गार के अवसरों पर
कुटिल कैंचियाँ
चलती ही चली जा रही हैं
भव्यता का
क़ाइल हुआ समाज
वैचारिक दरिद्रता ओढ़ रहा है
संवेदना को
परे रख
ख़ुद को
रोबॉटिक जीवन की ओर मोड़ रहा है।
© रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 1 जनवरी 2022
अमन का गीत मेरा खो गया है...
अमन का गीत
मेरा खो गया है
देश का युवा चेहरा
पर कटे पंछी-सा
गर्दिश में खो गया है
वो फ़ाख़्ता
जो गुलिस्तां में
ग़म-ख़ोर गीत गाती है
उसका गला
अब तो रुँध-रुँधकर
थर्राकर भर्रा गया है
वो चित्रकार
रंग, कूची; कल्पना के साथ
बस बेबस खड़ा है
हालात के नारों को
सुन-सुनकर घबरा गया है
वाणी पर नियंत्रण
क़लम पर पाबंदी
मतभिन्नता की आज़ादी
अभिव्यक्ति के आयाम
सत्ता से तीखे सवाल पर
लेखक का वजूद चरमरा गया
गाँधी की हत्या से
सब्र नहीं जिन्हें
वे अब रोज़-रोज़
चरित्रहत्या कर रहे हैं
यह कौन है
जो शांत माहौल में
उकसावे का परचम लहरा गया?
© रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 4 दिसंबर 2021
क्रोध
सूनी यामिनी में
जलते-जलते क्रोध में
नज़र चाँद पर जा ठहरी
सर्दियों की रात में
न जाने क्यों लगा ज्यों तपती दोपहरी
शुभ्र शांत शीतल चाँदनी की आभा में
क्रोध समाता गया
समाता ही चला गया...
ग्लानिभाव उत्सर्जित हुआ
नहीं होते जब
चाहे मुताबिक़
चीज़ें
घटनाएँ
परिस्थितियाँ
आँकड़े
हथियार
लेखनी
संमुख-वाणी
लोगों का व्यवहार
जेब का वज़्न
सोचे परिणाम
तब क्रोध का ज्वालामुखी फूट पड़ता है
क्रोधित के मस्तिष्क से न्यूरॉन नष्ट करता है
लक्षित को विचलित करता है
क्रोधावेग वक्री होने पर
आकलन होता है
शारीरिक
व्यावहारिक
आर्थिक
सामाजिक
वैश्विक नुकसान की अंधी गली का
आगे बिछा मिलता है असहयोग के रेशों से बुना ग़लीचा
कितना कोसा गया
दबाया गया
आलोचा गया
बेचारे क्रोध को
एक विद्रूप मनोविकार
क्रोधी को
पछतावे के सरोवर में डुबो देता है
क्रोध-वृक्ष की जड़ों में
ईर्ष्या
राग-द्वेष
बदलाभाव
अहंकार
घृणा
अपमानित करने की मंशा
असफलता से उत्पन्न कुंठा
नकारात्मक बारम्बारता
स्वयं को सही सिद्ध करने की ठेठ ज़िद
ग़लत को सही कहने का ढीठपन
न जाने कब समझेगा इंसान
क्रोध भी सकारात्मक चादर ओढ़ लेता है
जब
खड़ा हो जाता है
पीड़ित पक्ष के साथ
ताकतवर पर क्रोध करके
निरीह का थाम लेता है हाथ
क्रोध को वृहद उद्देश्यों में
ढलते हुए
हमने पाया है
क्रोध कुछ सार्थक कथाएँ भी लाया है
शिव का राजा दक्ष पर क्रोध
ऋषि वाल्मीकि का
क्रोंच पक्षी के जोड़े से
एक को मारते बहेलिए पर क्रोध
ब्रह्मऋषि विश्वामित्र का महर्षि वशिष्ठ पर क्रोध
क्रोधी-ऋषि दुर्वासा के श्राप-वरदान में लिपटा क्रोध
राम का सागर और लक्ष्मण पर क्रोध
रावण का विभीषण पर क्रोध
ऋषि मुचुकुंद का कालयवन पर क्रोध
कृष्ण का शिशुपाल, दुर्योधन और अश्वास्थामा पर क्रोध
धृतराष्ट्र का भीम के लौह पुतले पर क्रोध
विद्योत्मा का कालिदास पर क्रोध
रत्नावली का तुलसीदास पर क्रोध
चाणक्य का राजा घनानंद पर क्रोध
कबीर का पाखंडियों पर क्रोध
दंगाइयों का निरीह नागरिकों पर क्रोध
सम्राट अशोक का कलिंग युद्ध में हाहाकार!
दिल्ली में नादिर शाह का चालीस दिनों तक नरसंहार!!
इन क्रोधों की कहानियाँ
साथ लिए फिरता है समाज
फिर भी क्रोध के अंधकूप में बैठा है आज
बस...बस...बस...!
फ़सादात में
समाज के सतत उलझते-झगड़ते लड़ते रहने से
लाभ की पोटली कौन उठा रहा है?
वो जो छिपकर तुम्हें क्रोधी बना रहा है
अपने लिए अनुकूल माहौल बना रहा है
तुम तो फटेहाल कंगाल हो जाओगे!
और क्रोध के कारण को जानकर
अंत में ख़ुद को ही कोसते रह जाओगे...
© रवीन्द्र सिंह यादव
मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021
साधन-संपन्न और साधनहीन
एक पौधा
रोपा गया
सबने दिया
खाद-पानी
सुरक्षा देने की
सबने ठानी
पोषित पौधा पल्लवित पुष्पित हुआ
विशाल वृक्ष में तब्दील हुआ
फलदार हुआ
फलों को पाने की आशा में
साधनहीन
नीचे खड़े-खड़े
रसीले फलों को
निहारते रहे
हवाई पहुँचवाले
क्रेन आदि लाए
साथ सुरक्षा भी लाए
सारे फल तोड़ ले गए
साधनविहीन शोर मचाते रह गए।
© रवीन्द्र सिंह यादव
मंगलवार, 3 अगस्त 2021
जासूसी का लायसेंस लो...
साख़ रो रही है ज़ार-ज़ार
देशी जासूसी तक तो
मनाते रहे हम ख़ैर
विदेशियों को ठेका
और अपनों से बैर
अब जनता की अनुमति से
जासूसी का लायसेंस लो
जनता की गाढ़ी कमाई से
जासूसी कंपनी का मुँह भर दो
शर्त रखो...
पेगासस स्पाइवेयर का कैमरा क़ैद करे-
साँसों के लिए तड़पते
सरकारी अस्पताल के पलंग पर
एक से अधिक मरीज़ों के दृश्य
अवसर का लाभ उठाते
संवेदनाविहीन सफ़ेदपोश लुटेरे गिरोहों के रहस्य
ऑक्सीजन के लिए साँसें गिनते मरीज़
जो अपने प्रियजनों से
अंतिम साँस तक
मोबाइल फोन पर क्या कह रहे हैं
भरा मेडीकल ऑक्सीजन सिलेंडर लेने
कतारों में खड़े तीमारदार क्या कह रहे हैं
श्मशान में अंतिम संस्कार के लिए
प्रतीक्षारत लाशें ही लाशें
गंगा में बहती अधजली लाशें
किनारे/ रेत में दबी लाशें
कुत्ते-कौए नोंचते लाशें
करोना महामारी में
भूख और बेकारी से जूझते लोग
बेकसूर जो जेलों में हैं
उनके परिजनों को
न्याय की दिलाशा देकर लूटते लोग
स्त्री-अस्मिता पर होते बर्बर प्रहार
क़ानून कब कहाँ कैसे होता लाचार
दंगाइयों के पोषक हैं कौन
इंसाफ़ के सवाल पर कौन हैं मौन
ख़ून-पसीने की कमाई
औने-पौने दाम में लुटाते किसान
हज़ारों किलोमीटर पैदल चलते
मज़दूरों के छालों के निशान
हताश युवाओं के बिखरते अरमान
सीमा पर जान करते सैनिक क़ुर्बान
पेगासस स्पाइवेयर के वीडियो / ऑडियो में
ये सब देश देखना चाहेगा
सत्ता जनहित में समर्पित हो
तो उसे कौन हिलाना चाहेगा?
© रवीन्द्र सिंह यादव
रविवार, 11 जुलाई 2021
ऑक्सीजन और दीया
उमसभरी दोपहरी गुज़री
शाम ढलते-ढलते
हवा की तासीर बदली
ज्यों आसपास बरसी हो बदली
ध्यान पर बैठने का नियत समय
बिजली गुल हुई आज असमय
मिट्टी का दीया
सरसों का तेल
रुई की बाती
माचिस की तीली
उत्सुक मुनिया के नन्हे हाथ
सबने मिलकर जलाई ज्योति पीली
सरसराती शीतल पवन बही
दीये की लौ फरफराती रही
हवा से जूझती रही लौ
दिल की धड़कन हुई सौ
ध्यान लौ पर हुआ केन्द्रित
आई माटी की गंध सुगंधित
दीया ढक दिया काँच के गिलास से
दीया जलता रहा हुलास से
अनुकूल समय बीत रहा था
दीये का दम घुट रहा था
अचानक घुप्प अँधेरा
मैंने मुनिया को टेरा
मोबाइल-टॉर्च जली तो देखा
दीये में तेल भी बाती भी...भाल पर संशय की रेखा
निष्कर्ष के साथ मुनिया बोली-
"ऑक्सीजन ख़त्म होने से बुझ गया है चराग़।"
मेरे ह्रदय ने सुना विज्ञान का नीरस राग।
©रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 10 जुलाई 2021
सूखती नदी और बादल की चिंता
सूखती नदी
नदियों पर बनते बाँध आधुनिकता से परिपूर्ण मानव जीवन के लिए ऊर्जा की तमाम ज़रूरतें पूरी करते हैं वहीं बाँधों से निकलीं नहरें विस्तृत क्षेत्र में कृषि हेतु सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करातीं हैं। एक नदी बाँध से आगे के अपने मार्ग पर बहते-बहते सिकुड़ते किनारों को लेकर व्यथित है। बादल नदी के ऊपर मड़राते हैं तब नदी की पीड़ा कुछ यों उभरती है-
सुनो बादल! फिर आ जाओ एक बार!
जल-दर्पण में मुखड़ा फिर देखो एक बार।
सिमट रहे तटबंध
उदास है नाविक,
बरसो आकर
ऋतु-चक्र स्वाभाविक,
बँधी है नाव
रेत पड़ी पतवार!
सुनो बादल! फिर आ जाओ एक बार!
क़द मेरा लघुतम हुआ जाता है,
मुझे अस्तित्त्व का संकट सताता है,
पंछी उड़े जा पहुँचे किसी और पड़ाव,
लहराती लू आती करती जल में ठहराव,
नभ से धरती पर आ जाओ
सूने खेतों में पड़ गई गहरी दरार!
सुनो बादल! फिर आ जाओ एक बार!
भँवर स्मृतियों का
मेरे भीतर पागल हो रहा है,
संगीत सृष्टि का
जाग जाएगा
बसंत के बाद सो रहा है,
मगरमच्छ घड़ियाल भी
एक दिन साथ छोड़कर चल देंगे,
मेरे अब तक पालन-पोषण का
निष्ठुर बेस्वाद कसैला फल देंगे,
चीज़ें तो नीचे ही गिरतीं हैं
बरसो! जुड़े रहें सहअस्तित्त्व के तार!
सुनो बादल! फिर आ जाओ एक बार!
बादल की चिंता
बादल ने नदी की पीड़ा को शिद्दत से समझा और दूरदृष्टा के किरदार में आकर कुछ यों कहा-
सुन! ओ भोली नदी!
यह तो दुखों की सदी!
मैं पतझड़ के पत्ते-सा न गिरता हूँ,
यायावर-सा ठेठ सच लिए फिरता हूँ,
सत्ता सन्नाटे का जाल
चुपचाप बुन रही है,
उन्माद के अंधड़ में
मानवता सर धुन रही है
सुनो नदी!
तुम्हारा प्रवाह
अनवरत रह सकता है,
तुम्हारा निर्मल नीर
कल-कल बह सकता है
आदमी से पूछो...
क्या वह
तुम्हारे बिन रह सकता है?
तुम्हारे तटबंध
सुषमित सौंदर्यवान हरे-भरे हो सकते हैं,
किनारे कर्णप्रिय कलरव से भरे हो सकते हैं,
आदमी से कहो!
बस, तूने हद पार कर दी!
सुन! ओ भोली नदी!
मैं बरसूँ
तुम्हारे रूप-लावण्य के लिए!
या सहेजूँ अपना नीर
परम ध्येय धन्य के लिए!
क्या पता किस दिन
किसी सत्ताधीश का विवेक मर जाए!
उसकी चपल चंचला उँगली से
परमाणु-बटन दब जाए!
परमाणु बम की असीमित ऊर्जा से
जल सकते हैं ज़मीं-आसमां,
उस दिन तुम्हें ही पुकारेंगे पीड़ा से भरे लोग
हाय! नदी माँ, हाय! नदी माँ!
मुझे तो बरसना ही है,
मत कहो बेदर्दी!
सुन! ओ भोली नदी!
© रवीन्द्र सिंह यादव
रविवार, 20 जून 2021
पिता की स्मृति
6 फरवरी 2008 से
अब तक
एक अधूरापन
मेरे भीतर
घर कर गया है
करते होंगे लोग
बरसी पर स्मरण पिता को
मेरी स्मृति से
वह पल जाता ही नहीं
जब मुखाग्नि दी थी
बड़े भैया ने चिता को
एक काया
अपना सफ़र
मुकम्मल कर रही थी
देखते-देखते
पिता जी की पार्थिव-देह
पंचतत्त्व में विलीन हो गई थी
उन्हें लेकर गए थे
सजी हुई उदास अर्थी पर
शमशान-घाट
लौट आए थे
उनकी स्मृतियों के साथ
बेबस बस ख़ाली हाथ
संस्कारों की फ़सल
मूल्यों की अक्षय पूँजी
कुल के दायित्त्व
विश्वास का घनत्त्व
इच्छाओं की गठरी
बोध-कथाओं की लायब्रेरी
जीने की कलाओं का विस्तार
देकर छोड़ गए हो संसार!
आपकी स्मृति
सघन परछाइयों में
शून्य लिख जाती है
जिसके अर्थ तलाशता हुआ
अपने पिता होने के
अर्थ तलाशता हूँ
तस्वीर हो जाने के ख़याल में
ख़ुद को खँगालता हूँ
नब्बे वर्ष की आयु
निरोग जीवन जीकर
आपका महाप्रस्थान
आपका साथी बूढ़ा नीम
है अब मेरा मित्र महान।
©रवीन्द्र सिंह यादव
विशिष्ट पोस्ट
जलप्रलय
जल जीवन है और मृत्यु भी बहार है तो विभीषिका भी जल किलकारी है और चीख़ भी इंसानी दंभ को तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा, दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...
-
मानक हिंदी और आम बोलचाल की हिंदी में हम अक्सर लोगों को स्त्रीलिंग- पुल्लिंग संबंधी त्रुटिय...
-
माँ सृष्टि स्पंदन अनुभूति सप्त-स्वर में गूँजता संगीत वट वृक्ष की छाँव। माँ आँसू ममता संवेदना गोद में लोक जीवन...
-
बीते वक़्त की एक मौज लौट आयी, आपकी हथेलियों पर रची हिना फिर खिलखिलायी। मेरे हाथ पर अपनी हथेली रखकर दिखाये थे हिना के ख़...




