आक्रोश आवेश में थी वह भारत की बेटी
देखकर पुलिस की क्रूर बर्बरता
निहत्थे अहिंसक आंदोलनकारियों /महिलाओं पर
पंद्रह वर्ष आयु पाने से नौ दिवस पूर्व
दे आयी थी गाली प्रधानमंत्री को जंतर-मंतर पर
पहचान उजागर कर दी
डिजिटल हिंसा के ठेकेदारों ने
एक स्त्री ही खड़ी हो गयी
उस बेटी को क़ानूनी सबक़ सिखाने को
धँसे गले से नज़र झुकाये आयी वीडिओ में
सिटपिटाई-सी सार्वजनिक माफ़ी माँगने को
आत्मग्लानि से भर गया समूचा देश
देख क्रूर अट्टहास का वीभत्स परिवेश
विकृत राजनीति के समक्ष विवश-लाचार हुई प्रबुद्ध मानवता
माँ-बेटी स्वयं लड़ीं दहशत-घृणा से, दबाये भाव-विह्वलता
भीड़-तंत्र के न हो हवाले हमारा प्यारा देश
शराफ़त अब और न रहो अपाहिज-ख़ामोश!
©रवीन्द्र सिंह यादव

आक्रोशित अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ११ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सोचनीय
जवाब देंहटाएंभीड़-तंत्र के न हो हवाले हमारा प्यारा देश
जवाब देंहटाएंसार्थक आह्वान
विचरणीय विषय
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