आशा जन्म लेती है
स्वप्निल स्वर्णिम सुखी आकाश-सा कैनवास लिए
जुड़ जाती है
नवजात के साथ जन्म से
तीव्र हो उठती है
किशोर वय में
युवाओं में चहकती है / फुदकती है
सुरमई लय में
न जलती है
न दफ़्न होती है
बुढ़ापे की
अंतिम सांस के स्थिर होने पर
कमज़ोर नहीं पड़ती
जाऱ-ज़ार रोने पर
सुखकारी परिवर्तन की आशा
कभी नहीं मरती
इंसान में
भटकाव के भंवर से उबरने की आशा
कभी नहीं मरती
आशा बनी रहेगी
बेहतर संसार के लिए
फूल खिलते रहेंगे
भंवरों-तितलियों के
अनंत अतुलित प्यार के लिए।
साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
गुरुवार, 30 अप्रैल 2020
मंगलवार, 28 अप्रैल 2020
लॉक डाउन में दादी का प्रश्न
दादी दबी आकांक्षाएँ लिए
पेशानी पर तेवर लिए
बेकसी का दौर
चेहरे पर लिए
बूढ़ी आँखों में
प्रश्न-ख़ंजर लिए
पूछती पोती से
पैंतीसवें दिन
लॉक डाउन
कब ख़त्म होगा?
अपने गाँव जाना है
अपनों के बीच मरना है
बची सांसें ओसारे में पूरी करनी हैं
शहरी घुटन में क्या उम्र पूरी करनी है?
अजीब शहर है
न धूप खुली
न हवा खुली
न खुला मन
मोबाइल में व्यस्त
अबाल-वृद्धजन
दिखती ज़िंदा हूँ
मरी-सी हूँ!
समझी...!
©रवीन्द्र सिंह यादव
पेशानी पर तेवर लिए
बेकसी का दौर
चेहरे पर लिए
बूढ़ी आँखों में
प्रश्न-ख़ंजर लिए
पूछती पोती से
पैंतीसवें दिन
लॉक डाउन
कब ख़त्म होगा?
अपने गाँव जाना है
अपनों के बीच मरना है
बची सांसें ओसारे में पूरी करनी हैं
शहरी घुटन में क्या उम्र पूरी करनी है?
अजीब शहर है
न धूप खुली
न हवा खुली
न खुला मन
मोबाइल में व्यस्त
अबाल-वृद्धजन
दिखती ज़िंदा हूँ
मरी-सी हूँ!
समझी...!
©रवीन्द्र सिंह यादव
टीवी पर समाचार
विदूषक / मसख़रे / जोकर की कल्पना
मनोरंजन के लिए
हँसकर व्यंग्य की सचाई
स्वीकारने
भटकी सोच को
मानवीय बनाने
हमने की
कला-साहित्य / लोक-संस्कृति में
कँटीली / पथरीली ज़मीन पर
हमें हँसने-हँसाने की
चपल चुनौती दी
किनारे पर
उथले पानी में
तैरने का कोई अभिनय करे
तब आप क्या करेंगे?
टीवी पर समाचार
एंकर / एंकरनियों को
दाँत पीसते हुए
देखा करेंगे!
© रवीन्द्र सिंह यादव
मनोरंजन के लिए
हँसकर व्यंग्य की सचाई
स्वीकारने
भटकी सोच को
मानवीय बनाने
हमने की
कला-साहित्य / लोक-संस्कृति में
कँटीली / पथरीली ज़मीन पर
हमें हँसने-हँसाने की
चपल चुनौती दी
किनारे पर
उथले पानी में
तैरने का कोई अभिनय करे
तब आप क्या करेंगे?
टीवी पर समाचार
एंकर / एंकरनियों को
दाँत पीसते हुए
देखा करेंगे!
© रवीन्द्र सिंह यादव
सोमवार, 27 अप्रैल 2020
कसाईघर
कसाईघर / कसाई-ख़ाने से
करोना-काल में
निरीह पशुओं की
बेबस चीख़
अब शांत शून्य में
नहीं गूँजती होगी
नाली की ग़ाएब लाली
अर्थ ढूँढ़ती होगी
मांसाहार के लिए
दुकानों में सजाकर रखे
पशु-पक्षी / जानवर
कुछ दिन और सुरक्षित हैं
मनुष्य द्वारा
लायसेंसशुदा
मौत का फंदा
कसने की क्रिया-प्रक्रिया
अभी अक्रिय है
हाँ,लॉक डाउन में
कुछ पराधीन परवश जीव
भूख / बीमारी से
दुनिया छोड़ गए होंगे।
© रवीन्द्र सिंह यादव
करोना-काल में
निरीह पशुओं की
बेबस चीख़
अब शांत शून्य में
नहीं गूँजती होगी
नाली की ग़ाएब लाली
अर्थ ढूँढ़ती होगी
मांसाहार के लिए
दुकानों में सजाकर रखे
पशु-पक्षी / जानवर
कुछ दिन और सुरक्षित हैं
मनुष्य द्वारा
लायसेंसशुदा
मौत का फंदा
कसने की क्रिया-प्रक्रिया
अभी अक्रिय है
हाँ,लॉक डाउन में
कुछ पराधीन परवश जीव
भूख / बीमारी से
दुनिया छोड़ गए होंगे।
© रवीन्द्र सिंह यादव
रविवार, 26 अप्रैल 2020
फ़सल और बारिश
यह घनघोर घटा
काली-काली
मुझे नहीं लगी
कतई निराली
करोना-काल में
आफ़त की क्या कमी थी
जो फ़सल बर्बाद करने
असमय बारिश भी आ गई
आसमान में लपलपाती
मेघप्रिया सौदामिनी
खलिहान जलाती
गूँजती भरपूर
डरावनी गड़गड़ाहट
किसान के दुश्मन
सरकारी फ़रमान
हुआ करते
अरे बादल तुम तो
थोड़ा संयम धरते।
© रवीन्द्र सिंह यादव
काली-काली
मुझे नहीं लगी
कतई निराली
करोना-काल में
आफ़त की क्या कमी थी
जो फ़सल बर्बाद करने
असमय बारिश भी आ गई
आसमान में लपलपाती
मेघप्रिया सौदामिनी
खलिहान जलाती
गूँजती भरपूर
डरावनी गड़गड़ाहट
किसान के दुश्मन
सरकारी फ़रमान
हुआ करते
अरे बादल तुम तो
थोड़ा संयम धरते।
© रवीन्द्र सिंह यादव
इतिहास
इतिहास पढ़ा
ज़्यादातर ब्यौरा
सत्ता के
उत्थान और पतन का
सत्ता और संपत्ति के
हस्तांतरण का
अमीरों की जीवनशैली
दर्शन,कलाप्रियता,क्रूरता
और चरित्र के क़िस्से
सामाजिक राजनीतिक वातावरण के
पुख़्ता दस्तावेज़
सभ्यता-संस्कृति के बीज-वृक्ष
कुछ शासकों की नीतियाँ
उत्पन्न करतीं खीझ
बहुत कुछ
दर्ज होने से छूट गया है
ऐसा पुरखे बताते रहे
समृद्ध इतिहास पर गर्व है
यह तो पुरखों की की देन है
हमारा किया-धरा
भावी पीढ़ियाँ पढेंगीं
मजबूरन भुगतेंगीं
सराहेंगीं या धिक्कारेंगीं
वक़्त तय करेगा।
© रवीन्द्र सिंह यादव
ज़्यादातर ब्यौरा
सत्ता के
उत्थान और पतन का
सत्ता और संपत्ति के
हस्तांतरण का
अमीरों की जीवनशैली
दर्शन,कलाप्रियता,क्रूरता
और चरित्र के क़िस्से
सामाजिक राजनीतिक वातावरण के
पुख़्ता दस्तावेज़
सभ्यता-संस्कृति के बीज-वृक्ष
कुछ शासकों की नीतियाँ
उत्पन्न करतीं खीझ
बहुत कुछ
दर्ज होने से छूट गया है
ऐसा पुरखे बताते रहे
समृद्ध इतिहास पर गर्व है
यह तो पुरखों की की देन है
हमारा किया-धरा
भावी पीढ़ियाँ पढेंगीं
मजबूरन भुगतेंगीं
सराहेंगीं या धिक्कारेंगीं
वक़्त तय करेगा।
© रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 25 अप्रैल 2020
किनारे नदी के
सौंदर्यमयी स्रोतस्विनी
उतर रही है
अल्हड़ चंचला-सी
पर्वत-श्रृंखला को
छेड़ते श्वेत बादलों कीं
अठखेलियों के बीच
प्रीत पगे प्रियदर्शन पर्वत से
पावन अश्रुधारा-सी
उदधि में अवसान तक
बसाती गई है
किनारे-किनारे कालजयी सभ्यताएँ
मैदानों को करती गई है
ख़ुशहाल आबाद
फैलाए विस्तृत अयाचक बाहें
विकास की सीढ़ियाँ
भारी पड़तीं जा रहीं हैं
नदी के नैसर्गिक किनारे
जबरन सिकोड़तीं जा रहीं हैं
अपनी अभूतपूर्व दुर्दशा पर
लज्जित है पराजित है
कल-कल बहता उज्जवल नीर
पर्वत से कुछ दूर बहकर
दुर्गंधयुक्त विषाक्त स्याह होकर
लाचार नाविक की
किनारे बँधी नाव को
मासूम नई पीढ़ी को
नहीं समझा सकेगा कोई
सदानीरा की पर्वत-सी पीर!
©रवीन्द्र सिंह यादव
शब्दार्थ-
स्रोतस्विनी = नदी ( किसी स्रोत से निकली जलधारा )
अयाचक = जो याचना न करे, न माँगे, कामनारहित
सदानीरा = ऐसी नदी जिसमें सदैव नीर बहता रहे
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020
भ्रष्टाचार-सहमति-असहमति-सम्मान
रंकों के लिए
आपात योजना बनी
डाका डालने की
सहमति पर बात बनी
मुर्दों की शिनाख़्त
सरकारी दस्तावेज़ में
रहस्यमयी बनाई गई
सिर्फ़ काग़ज़ पर
हड़प योजना
सफ़ाई से बनाई गई
डाके में मिली
भारी-हल्की हिस्सेदारी
बिना डकार पचाई गई
अनैतिक योजना में
जो शामिल नहीं हुए
उन्हें आदर्शवाद की
चोखी चटनी चटाई गई
ज़ुबान खोलने
क़लम चलाने की
कलुषित क़ीमत बताई गई
एक भव्य समारोह में
अंगवस्त्रम ओढ़ाकर
प्रशस्ति-पत्र थमाकर
निर्लज्ज आँखों से
चेहरा घूरते हुए
अंदर धू-धू जलती
ईर्ष्यालु आग
होंठों से दबाते हुए
बेईमान हाथों से
बेमन की ताली बजाई गई।
©रवीन्द्र सिंह यादव
आपात योजना बनी
डाका डालने की
सहमति पर बात बनी
मुर्दों की शिनाख़्त
सरकारी दस्तावेज़ में
रहस्यमयी बनाई गई
सिर्फ़ काग़ज़ पर
हड़प योजना
सफ़ाई से बनाई गई
डाके में मिली
भारी-हल्की हिस्सेदारी
बिना डकार पचाई गई
अनैतिक योजना में
जो शामिल नहीं हुए
उन्हें आदर्शवाद की
चोखी चटनी चटाई गई
ज़ुबान खोलने
क़लम चलाने की
कलुषित क़ीमत बताई गई
एक भव्य समारोह में
अंगवस्त्रम ओढ़ाकर
प्रशस्ति-पत्र थमाकर
निर्लज्ज आँखों से
चेहरा घूरते हुए
अंदर धू-धू जलती
ईर्ष्यालु आग
होंठों से दबाते हुए
बेईमान हाथों से
बेमन की ताली बजाई गई।
©रवीन्द्र सिंह यादव
युद्ध
अतीत में युद्ध हुए हैं
महत्त्वाकाँक्षा मुनाफ़ा का
मातमी मुकुट धरकर
या अपमान और कुंठाओं से त्रस्त
मानवीय प्रकृति की
बिडंबनाओं में उलझकर
करोना-काल में स्थगित है
युद्ध-सामग्री क्रय-विक्रय
संयुक्त युद्धाभ्यास
परमाणु बम परीक्षण
अवैध हथियारों की खेप
मौन है विप्लवी लय
मानवता को आहत करने
कैसे रचें महाभीषण
युद्धक-षड्यंत्र
गोपनीय मंत्रणाओं को
कैसे आयोजित करे
हलकान शासन-तंत्र
अलसाई सरहदों पर
सन्नाटा और शांति
शिद्दत से महसूसकर
प्रबुद्ध मानवता लेती है
पुरसुकून की सांस
बेज़मीरी इंसान की
बन गयी है तारीख़ी फांस।
©रवीन्द्र सिंह यादव
बुधवार, 22 अप्रैल 2020
मृत्यु
महाभारत में
युधिष्ठिर से यक्ष-प्रश्न-
"संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात क्या है?"
"मृत्यु"
"रोज़ दूसरों को मरता हुआ देखकर भी
ख़ुद की अमरता के सपने देखता है मानव।"
युधिष्ठिर ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया।
अकाट्य सत्य है मृत्यु
जिसे देर-सबेर आना ही है
मृत्यु का डर
समाया है रोम-रोम में
फिर भी निर्विकार
दौड़ रहा होता है
भय को परास्त करने के वास्ते
सत-चित-आनंद के
दुर्गम हैं रास्ते
हर पल अकेले ही
लड़ी जाती है जंग
पास आती मृत्यु से
करोना वायरस लील गया है
दुनियाभर में
1,76,860 जानें अब तक
यह भयानक आँकड़ा
बढ़ता रहेगा कब तक?
© रवीन्द्र सिंह यादव
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