जीवन के
रीते
तिरेपन बसंत
मेरे बीते
तिरेपन बसंत
बसंत की
प्रतीक्षा का
हो न कभी अंत
प्रकृति की
सुकुमारता का
क्रम-अनुक्रम
चलता रहे
अनवरत अनंत
नई पीढ़ी से पूछो-
कब आया बसंत?
कब गया बसंत...?
कलेंडर पत्र-पत्रिकाओं में
सिमट गया बसंत!
© रवीन्द्र सिंह यादव
साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
जीवन के
रीते
तिरेपन बसंत
मेरे बीते
तिरेपन बसंत
बसंत की
प्रतीक्षा का
हो न कभी अंत
प्रकृति की
सुकुमारता का
क्रम-अनुक्रम
चलता रहे
अनवरत अनंत
नई पीढ़ी से पूछो-
कब आया बसंत?
कब गया बसंत...?
कलेंडर पत्र-पत्रिकाओं में
सिमट गया बसंत!
© रवीन्द्र सिंह यादव
समाचार आया है-
"इंदौर में बेघर बुज़ुर्गों को नगर निगम के ट्रक में भरकर शहर से बाहर..."
महादेवी वर्मा जी कहानी 'घीसा' स्मृति में घूम गई
जब इंदौर का यह समाचार पढ़ा
संवेदना ने खींचकर
गाल पर तमाचा जड़ा
महादेवी जी नदी पार करके
ग़रीब ग्रामीण बच्चों को पढ़ाने
चलीं जाया करतीं थीं
एक बार अबोध बच्चों को
शारीरिक स्वच्छता का पाठ पढ़ाया
बच्चों को ख़ूब भाया
अगले दिन महादेवी जी ने देखा
ख़ुद को मन ही मन कोसा
बच्चों ने मैल की मोटी परत
पत्थर से घिसकर हटाई
तो कुछ बच्चों की चमड़ी तक खुरच गई
ऐसा ही कुछ जूनून सवार है
इंदौर नगर निगम के मुलाज़िमों पर
देश का सबसे स्वच्छ शहर
होने का तमग़ा क्या मिला
वे तो संवेदनाविहीन होने की
हदें पार कर गए
मानवता को तार-तार कर आगे बढ़ गए
अतिक्रमण हटाने के नाम पर
असहाय बेघर कृशकाय वृद्धजनों को
उनके गुदड़ी-चीथड़ों सहित
नगर निगम के डंपर में जबरन लादकर
शहरी सीमा से दूर क्षिप्रा नदी के किनारे
उतार दिया समझकर कचरे
शहरी चमक-दमक से दूर रहते
स्थानीय निवासियों ने
वीडियो बनाकर वायरल किया
राष्ट्रीय मीडिया कहलाने वालों को
डूब मरने के लिए चुल्लूभर पानी दिया
असर
सरकार तक पहुँचा
क्या हमारी सोई संवेदना तक पहुँचा?
मैं चाहता हूँ
अतिक्रमण का सामान,आवारा कुत्ते,मृत पशु आदि
ढोनेवाले डंपर में बैठकर
एक दिन
इंदौर नगर निगम के अधिकारी
सपरिवार सैर करें
बेघर होने की पीड़ा को महसूस करें
नई पीढ़ी को सिखाएँ
ज़िंदगी से नफ़रत नहीं की जाती है
जीवन मूल्यों की हिफ़ाज़त की जाती है
ग़रीबी ईश्वरीय देन नहीं है
समाज ने इनका हक मार लिया है
और तुमने इन्हें हाड़ कँपाती सर्दी में
नदी किनारे उतार दिया है?
© रवीन्द्र सिंह यादव
धुंध में धूमिल हैं दिशाएँ
सीखे-पढ़े को क्या सिखाएँ
विकराल विध्वंस की सामर्थ्य
समाई उँगलियों में
सघन कुहाँसे से
फिर-फिर लड़ा जाएगा
रवि रोपता जा रहा है विचार
अपनी उज्जवल रश्मियों में
भीड़ के जयकारे
उत्साह उमंग नहीं
व्यस्त हैं भय उगलने में
रौंद डालने को आतुर है
तुम्हारा स्थान
केन्द्र हो या हाशिए
भीड़ को तो बस इशारा चाहिए!
© रवीन्द्र सिंह यादव
देख रहा है सारा आलम
खेतों में सरसों फूली है
ओस से भीगी शाख़ पर
नन्ही चिड़िया झूली है
परेड की चिंता न समिति की फ़िक्र
हँसिया के बियाह में खुरपी का ज़िक्र
खेत के पहरेदारों संग अनशन में बैठे
सत्ता की नज़रों में वे गाजर-मूली हैं
ख़ुद के कंधों पर ख़ुद को ढोना
उनसे सीख लो मगर-सा रोना
लज्जाहीन न समझेंगे अब वो
दंभ में अक्ल राह अब भूली है।
© रवीन्द्र सिंह यादव
स्थाई स्थान ढूँढ़ना था
तो राजनीति में समा गईं
हताशाओं को
तलाश थी मुकम्मल ठिकाने की
तो कापुरुष में समा गईं
चतुराई चपला-सी चंचल
भविष्य बनाने निकली
तो बाज़ारों की रौनक में बस गई
जीने की चाह
भटकती रही
सन्नाटोंभरे खंडहरों में
लड़खड़ाकर गिरने से पहले
सँभल गई
मानवता पूँजी के अत्याचार झेलते-झेलते
क्षत-विक्षत होकर ख़ुद से आश्वस्त हुई
तो विचार-क्रांति के साथ कोहरे को चीरती चली गई।
© रवीन्द्र सिंह यादव
मढ़ा अब कहीं नहीं दिखता
माटी की भीतों का अँधेरा कक्ष
था बिना झरोखों का होता
बिना दरवाज़ों के घरों में
आँगन में सूखते अनाज को
भेड़-बकरियाँ खा जातीं
माँ को एक उपाय सूझा
तीन सूखीं-सीधीं बल्लियाँ मँगवाईं
एक बल्ली के एक-एक हाथ लंबे
कुल्हाड़ी से टुकड़े करवाए
दो बल्लियों को समानांतर रखा
टुकड़ों को उनपर आड़ा रखकर
ठोक दिया सिलबट्टे से
कील के बड़े भाई कीले को
एक -एक हाथ के अंतर से
मढ़ा की भीत से सटाकर
उपयुक्त कोण पर रखी गई सीढ़ी
बचपन में सीढ़ी पर चढ़कर
मढ़ा की छत पर पहुँचने का रोमांच
ज़ेहन में अब तक कुलाँचें भर रहा है
नई पीढ़ी के लिए सीढ़ी के अनेक विकल्प मौजूद हैं
आड़ी-तिरछी ऊर्ध्वगामी-अधोगामी
सीधी-घुमावदार या फोल्डेबल सीढ़ी
वास्तुशिल्प के अनुरूप आदि-आदि वजूद हैं
सफलता की सीढ़ी
स्वर्ग की सीढ़ी
सभ्यता की सीढ़ी
फ़ायर ब्रिगेड की सीढ़ी
स्वचालित सीढ़ी
बिजली विभाग की सीढ़ी
भवन-मज़दूर की सीढ़ी
दुकानदार की सीढ़ी
कुएँ-बावड़ी की सीढ़ी
पहाड़ों में बने खेत सीढ़ी
सड़क का अतिक्रमण करती सीढ़ी
लताओं-बल्लरियों का सहारा सीढ़ी
पर्वतारोहियों की सीढ़ी
सैनिकों की सीढ़ी
बाढ़ में बने सैनिक सीढ़ी
हवाई जहाज़ की सीढ़ी
हेलीकॉप्टर से लटकती सीढ़ी
चोरों-आतंकवादियों की सीढ़ी
सब सीढ़ियों में श्रेष्ठ रही
दिल में उतरनेवाली सीढ़ी
ख़ुद में झाँकने को बननेवाली काल्पनिक सीढ़ी
जो बनी जान बचानेवाली सीढ़ी।
© रवीन्द्र सिंह यादव
हक माँगने दिल्ली की सीमा पर आए हो
अगहन गुज़र गया धीरे-धीरे
सतह पा गए बीज सभी कारे-पीरे
धरती ने ओढ़ा दुकूल हरियाला
फ़सल माँगे पानी भर-भर नाला
बिजूका कब तक करे अकेला रखवाली
चरे आवारा मवेशी जहाँ न किसान न माली
क्यारी-क्यारी की करुण अनुगूँज सुनो
मिलजुलकर फ़सल खड़ी-बड़ी करो
श्रम-उत्पादन ख़ून-पसीना सब किसान के पाले में
दाम मुनाफ़ा और तरक़्क़ी जा पहुँचे किसके पाले में?
पूस की रातें बड़ी कठिन हैं कृशकाय निरीह किसान कीं
चर्चा अब फैली है गली-गली क्रूर-निष्ठुर सरकारी ईमान की
एकता एक दिन करती है झुकने को मजबूर
मज़बूत इरादों के आगे होगा दंभ सत्ता का चूर
माघ मास में फिर फ़सलें माँगेंगीं पानी
संभव है हो जाए क़ुदरत की मेहरबानी
पकने लग जाएँगीं फ़सलें फागुन आते-आते
ले आना नया अनाज मंडी में चैत-बैसाख जाते-जाते
मत भूलना शहीद हुए जो साथी संघर्षों की राहों में
वो सुबह भी आएगी जब ख़ुशियाँ झूलेंगीं अपनी बाहों में
आंदोलन की राहें भले अब और कठिन हो जाएँगीं
सत्ता के आगे ख़ुद्दार आँखें दया की भीख नहीं माँगेंगीं।
© रवीन्द्र सिंह यादव
नाविक नैया खेते-खेते
तुम चले गए उस पार
बाट तुम्हारी हेरे-हेरे
थके नयन गए हार
बादल ठहरे होंगे कहीं
कहे क्षितिज की रेखा
संध्या का सफ़र शुरू होगा
हो न सकेगा अनदेखा
नदी शांत है आ जाओ
होगा मटमैला पानी
सांध्य-दीप साथ जलाना
होगी परिपूर्ण कहानी।
© रवीन्द्र सिंह यादव
जल जीवन है और मृत्यु भी बहार है तो विभीषिका भी जल किलकारी है और चीख़ भी इंसानी दंभ को तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा, दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...