शनिवार, 20 अगस्त 2022

भयादोहन


तपकर तीव्र तपिश में
अपने सम्मोहनयोद्धा की 
सभा से लौटे
हारे-थके पंछी
कुछ देर के लिए 
छायादार वृक्षों की शरण में
ठहर गए हैं
सभा की सीख 
और संदेश का पुनःस्मरण
अब बहस में बदल गया है
स्मृतिलोप और नाकारापन ने
भावी भय के भयावह सपने ने
विवेक कुंद कर डाला है
सहिष्णुता के सत्व को सुखाकर
आक्रामक और हिंसक 
हो जाने का उकसावा
अस्तित्व बचाने के लिए दे डाला है
अपनी ही प्रजा का 
शिकार करनेवाले सिंह का
मजबूरन महिमामंडन
चींटियों की 
सामूहिक एकता का खंडन
समाज को 
ग़ुलाम बनाए रखने के
चालाक उपक्रमों पर मंथन
जल के 
वैकल्पिक स्रोतों का अन्वेषण
भावनात्मक आदर्शों का 
चतुर संप्रेषण  
हवा के सदियों पुराने स्वरुप को
बहाल करने की चिंताएँ
अपने-अपने संवैधानिक गणराज्य
स्थापित करने की चर्चाएँ
अपने-अपने नशेमन की ओर
उड़ान भरने से पहले 
पंछी
वैज्ञानिक शिक्षा पर 
विमर्श करने लगे
हालाँकि आज उन्हें 
स्वादिष्ट भोजन
सभा-स्थल पर ही 
छककर खाने को मिला था  
पंछियों की निरर्थक चिंतन-बहस से 
जीभर उकताकर
वृक्ष की छाया में बैठी बूढ़ी गाय
रूखी-सूखी घास चरने 
घाम से जलते खेत में चली गई।
© रवीन्द्र सिंह यादव  

सोमवार, 4 जुलाई 2022

गुलमेहंदी,जूही और गेंदा

नीले फूलों लदी  

गर्वीली गुलमेहंदी  

की 

मोहक मुस्कान 

मानसिक थकान को 

सोख न सकी 

तब 

तिरस्कार की चुभन 

तीव्र करती  

श्वेत सुमन के साथ 

इतराने लगी जूही

अंततः 

केसरिया पुष्प धारण किए 

आत्मविस्मृत 

एकाकीपन में गुम गेंदे ने 

उपेक्षा की दहलीज़ पर 

स्वयं को समर्पित किया 

क्षितिज पर दृष्टि गढ़ाए 

कोई बढ़ गया आगे 

कोमल फूलों को कुचलता हुआ!

किसी ने देखा... 

मासूम महकता फूल 

अनिच्छा से मिट्टी में मिलता हुआ?

© रवीन्द्र सिंह यादव  

   

बुधवार, 25 मई 2022

समय का वज्र

 व्यथा का तम 

और कितना 

सघन होगा? 

अँधेरे-उजाले के मध्य 

प्रतीक्षा के पर्वत के छोर पर 

कब प्रभात के तारे का 

सुखद आगमन होगा?  

लोक-मानस में 

अधीरता के आयाम 

इतिहास की उर्वरा माटी पर 

संप्रति 

कोई  तो

सर्जना के संवर्धन की 

तबीयत समझ    

लिखता जा रहा है

बहारों की आहट

अभी दूर है 

वक़्त को यही मंज़ूर है

इस कठोरता को 

रेखांकित कर दिया गया है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव




  


रविवार, 24 अप्रैल 2022

नासूर

वो जो आप 
दूसरों की 
तबाही
देख  
आहें-चीख़ें
बेबस चीत्कार  
सुन 
मन ही मन 
ख़ुश हो रहे हो 
सदियों पुरानी
कुंठा का
नासूर 
सहला रहे हो!
लानत है 
आपके
सभ्य होने पर 
सामाजिक मूल्य
खोकर जीने पर!

© रवीन्द्र सिंह यादव       



शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

ओखली और मूसल

 

जानते हो?

ओखली और मूसल 

गाँव में घर-घर हुआ करते थे

वह रिदम 

आज भी 

गूँजती रहती है 

मेरे भीतर 

एक ही ओखली में 

अम्मा-चाची 

अपने-अपने 

मूसल से धान कूटती थीं 

साथ-साथ...  

एक मूसल नीचे आता 

तो दूसरा ऊपर जाता

कोई आपस में न टकराता  

बीच-बीच में 

ओखली में 

हाथ का सरपट करतब 

अनकुटे धान को 

मूसल की चोटों के केन्द्र में लाता 

मूसल-प्रहार से 

उत्पन्न ध्वनि 

कर्कश नहीं 

संगीतमय हो जाती

मूसल की धमक 

चूड़ियों की खनक

सुरीला राग बन 

परिवेश में एकाकार हो जाती  

देखते-देखते 

धान की रूह फ़ना हो जाती

चावल अलग 

और भूसी विलग हो जाती  

चावल के दाने  

चिड़िया के बच्चों के गले उतरना  

आसान हो जाते

पंसेरी-दो-पंसेरी धान कूटकर 

मूसल शांत हो जाते

सुकोमल कोंपलों को 

छूकर आती बसंती बयार 

स्नेह का स्पर्श लिए 

डोलती आ जाती घर-द्वार 

तब... 

मूसल चलानेवाले पसीने में भीगे हाथ 

निर्विकल्प पावन हो जाते 

जब भूख और स्वाद 

घुल-मिल तृप्ति हो जाते     

कमाल का सामंजस्य था

तारतम्य और अभ्यास था

भावनाओं की उर्वरा खाद

बढ़ाती जीवट का स्वाद  

हल्की हठीली 

हँसी-ठिठोली 

हास-परिहास था 

बड़ी गृहस्थी 

और संयुक्त परिवार के 

ताने-बाने को 

बिना टकराहट 

संजोए रखने का 

विराट भाव सहअस्तित्व का 

परिवार से ग़ाएब क्या हुआ 

तो दुनिया भी 

उसे अनुभव करना 

भूल गई

अपने-पराये के भेद में 

निपुण हो गई

ख़ाली बासनों-सी 

बजने लग गई!   

© रवीन्द्र सिंह यादव   


शब्दार्थ 

पंसेरी = पाँच सेर वज़्न (एक सेर = 933 ग्राम ) 

विलग = पृथक, अलग, जोड़ा फूटना, साथ छूटना, विभक्त,असंबद्ध    

  

सोमवार, 24 जनवरी 2022

रिक्शेवाले

रिक्शेवालों को 

आलीशान बाज़ारों से 

दूर 

कर दिया गया है

झीने वस्त्र को 

लौह-तार से सिया गया है 

बहाना 

बड़ा ख़ूबसूरत है

वे 

पैदल चलनेवालों का भी 

स्थान 

घेर लेते हैं

सच तो यह है 

कि 

वे 

अवरोधों से आक्रांत ग़रीब 

मख़मल में टाट का पैबंद नज़र आते हैं

मशीनें 

मानवश्रम का 

मान घटाती ही चली जा रही हैं 

रोज़गार के अवसरों पर 

कुटिल कैंचियाँ  

चलती ही चली जा रही हैं 

भव्यता का 

क़ाइल हुआ समाज 

वैचारिक दरिद्रता ओढ़ रहा है 

संवेदना को 

परे रख 

ख़ुद को 

रोबॉटिक जीवन की ओर मोड़ रहा है।  

© रवीन्द्र सिंह यादव       



शनिवार, 1 जनवरी 2022

अमन का गीत मेरा खो गया है...

अमन का गीत 

मेरा खो गया है

देश का युवा चेहरा

पर कटे पंछी-सा  

गर्दिश में खो गया है

वो फ़ाख़्ता 

जो गुलिस्तां में 

ग़म-ख़ोर गीत गाती है 

उसका गला 

अब तो रुँध-रुँधकर 

थर्राकर भर्रा गया है

वो चित्रकार 

रंग, कूची; कल्पना के साथ 

बस बेबस खड़ा है 

हालात के नारों को 

सुन-सुनकर घबरा गया है

वाणी पर नियंत्रण 

क़लम पर पाबंदी 

मतभिन्नता की आज़ादी

अभिव्यक्ति के आयाम

सत्ता से तीखे सवाल पर 

लेखक का वजूद चरमरा गया

गाँधी की हत्या से 

सब्र नहीं जिन्हें 

वे अब रोज़-रोज़ 

चरित्रहत्या कर रहे हैं

यह कौन है 

जो शांत माहौल में

उकसावे का परचम लहरा गया?

© रवीन्द्र सिंह यादव       


शनिवार, 4 दिसंबर 2021

क्रोध

सूनी यामिनी में 

जलते-जलते क्रोध में 

नज़र चाँद पर जा ठहरी 

सर्दियों की रात में 

न जाने क्यों लगा ज्यों तपती दोपहरी 


शुभ्र शांत शीतल चाँदनी की आभा में 

क्रोध समाता गया 

समाता ही चला गया...

ग्लानिभाव उत्सर्जित हुआ

नहीं होते जब  

चाहे मुताबिक़ 

चीज़ें 

घटनाएँ 

परिस्थितियाँ 

आँकड़े 

हथियार 

लेखनी 

संमुख-वाणी 

लोगों का व्यवहार

जेब का वज़्न

सोचे परिणाम 

तब क्रोध का ज्वालामुखी फूट पड़ता है 

क्रोधित के मस्तिष्क से न्यूरॉन नष्ट करता है 

लक्षित को विचलित करता है 

क्रोधावेग वक्री होने पर 

आकलन होता है 

शारीरिक 

व्यावहारिक 

आर्थिक 

सामाजिक 

वैश्विक नुकसान की अंधी गली का 

आगे बिछा मिलता है असहयोग के रेशों से बुना ग़लीचा 

कितना कोसा गया 

दबाया गया 

आलोचा गया 

बेचारे क्रोध को 

एक विद्रूप मनोविकार 

क्रोधी को 

पछतावे के सरोवर में डुबो देता है 

क्रोध-वृक्ष की जड़ों में 

ईर्ष्या 

राग-द्वेष 

बदलाभाव 

अहंकार 

घृणा

अपमानित करने की मंशा

असफलता से उत्पन्न कुंठा

नकारात्मक बारम्बारता 

स्वयं को सही सिद्ध करने की ठेठ ज़िद 

ग़लत को सही कहने का ढीठपन 

न जाने कब समझेगा इंसान 

क्रोध भी सकारात्मक चादर ओढ़ लेता है 

जब 

खड़ा हो जाता है 

पीड़ित पक्ष के साथ

ताकतवर पर क्रोध करके

निरीह का थाम लेता है हाथ

क्रोध को वृहद उद्देश्यों में

ढलते हुए 

हमने पाया है

क्रोध कुछ सार्थक कथाएँ भी लाया है 

शिव का राजा दक्ष पर क्रोध  

ऋषि वाल्मीकि का

क्रोंच पक्षी के जोड़े से

एक को मारते बहेलिए पर क्रोध

ब्रह्मऋषि विश्वामित्र का महर्षि वशिष्ठ पर क्रोध 

क्रोधी-ऋषि दुर्वासा के श्राप-वरदान में लिपटा क्रोध 

राम का सागर और लक्ष्मण पर क्रोध

रावण का विभीषण पर क्रोध

ऋषि मुचुकुंद का कालयवन पर क्रोध 

कृष्ण का शिशुपाल, दुर्योधन और अश्वास्थामा पर क्रोध 

धृतराष्ट्र का भीम के लौह पुतले पर क्रोध

विद्योत्मा का कालिदास पर क्रोध

रत्नावली का तुलसीदास पर क्रोध

चाणक्य का राजा घनानंद पर क्रोध

कबीर का पाखंडियों पर क्रोध

दंगाइयों का निरीह नागरिकों पर क्रोध 

सम्राट अशोक का कलिंग युद्ध में हाहाकार! 

दिल्ली में नादिर शाह का चालीस दिनों तक नरसंहार!!

इन क्रोधों की कहानियाँ 

साथ लिए फिरता है समाज

फिर भी क्रोध के अंधकूप में बैठा है आज  


बस...बस...बस...!

फ़सादात में 

समाज के सतत उलझते-झगड़ते लड़ते रहने से  

लाभ की पोटली कौन उठा रहा है?

वो जो छिपकर तुम्हें क्रोधी बना रहा है 

अपने लिए अनुकूल माहौल बना रहा है 

तुम तो फटेहाल कंगाल हो जाओगे! 

और क्रोध के कारण को जानकर 

अंत में ख़ुद को ही कोसते रह जाओगे...

© रवीन्द्र सिंह यादव   

 

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

साधन-संपन्न और साधनहीन

एक पौधा 

रोपा गया 

सबने दिया 

खाद-पानी

सुरक्षा देने की 

सबने ठानी 

पोषित पौधा पल्लवित पुष्पित हुआ

विशाल वृक्ष में तब्दील हुआ 

फलदार हुआ 

फलों को पाने की आशा में 

साधनहीन 

नीचे खड़े-खड़े 

रसीले फलों को 

निहारते रहे 

हवाई पहुँचवाले 

क्रेन आदि लाए

साथ सुरक्षा भी लाए  

सारे फल तोड़ ले गए

साधनविहीन शोर मचाते रह गए।   

© रवीन्द्र सिंह यादव 

मंगलवार, 3 अगस्त 2021

जासूसी का लायसेंस लो...


निजता की गरिमा तार-तार 

साख़ रो रही है ज़ार-ज़ार

देशी जासूसी तक तो 

मनाते रहे हम ख़ैर 

विदेशियों को ठेका 

और अपनों से बैर

अब जनता की अनुमति से 

जासूसी का लायसेंस लो

जनता की गाढ़ी कमाई से 

जासूसी कंपनी का मुँह भर दो

शर्त रखो...    

पेगासस स्पाइवेयर का कैमरा क़ैद करे-

साँसों के लिए तड़पते  

सरकारी अस्पताल के पलंग पर 

एक से अधिक मरीज़ों के दृश्य

अवसर का लाभ उठाते 

संवेदनाविहीन सफ़ेदपोश लुटेरे गिरोहों के रहस्य

ऑक्सीजन के लिए साँसें गिनते मरीज़ 

जो अपने प्रियजनों से 

अंतिम साँस तक 

मोबाइल फोन पर क्या कह रहे हैं

भरा मेडीकल ऑक्सीजन सिलेंडर लेने 

कतारों में खड़े तीमारदार क्या कह रहे हैं 

श्मशान में अंतिम संस्कार के लिए 

प्रतीक्षारत लाशें ही लाशें 

गंगा में बहती अधजली लाशें 

किनारे/ रेत में  दबी लाशें

कुत्ते-कौए नोंचते लाशें  

करोना महामारी में 

भूख और बेकारी से जूझते लोग 

बेकसूर जो जेलों में हैं 

उनके परिजनों को 

न्याय की दिलाशा देकर लूटते लोग

स्त्री-अस्मिता पर होते बर्बर प्रहार

क़ानून कब कहाँ कैसे होता लाचार

दंगाइयों के पोषक हैं कौन 

इंसाफ़ के सवाल पर कौन हैं मौन   

ख़ून-पसीने की कमाई 

औने-पौने दाम में लुटाते किसान 

हज़ारों किलोमीटर पैदल चलते 

मज़दूरों के छालों के निशान 

हताश युवाओं के बिखरते अरमान 

सीमा पर जान करते सैनिक क़ुर्बान 

पेगासस स्पाइवेयर के वीडियो / ऑडियो में 

ये सब देश देखना चाहेगा

सत्ता जनहित में समर्पित हो 

तो उसे कौन हिलाना चाहेगा?

© रवीन्द्र सिंह यादव 

  

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जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...