मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

रंजिशों के साथ

सपनों की 

भव्य अट्टालिकाओं को 

ढह जाना होता है

नयनों में उमड़े 

दर्दीले आँसुओं को 

बस बह जाना होता है

उपवन के सौंदर्य में लवलीन

रसिक मन को 

काँटों का चुभना 

सह जाना होता है

चन्द्रिका बिखर जाती है 

अँधेरी राहों को 

रौशन करने 

तब 

जुगनुओं के दिल को 

रंजिशों के साथ 

कृष्णपक्ष तक 

चुप रह जाना होता है।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

    

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

न राहत की सुबह न चैन की दुपहरी है



बसंत को विदा हुए

कुछ अरसा ही बीता है 

कुछ पत्ते झड़ गए 

कुछ को नए रंगों में

खिलने का सुभीता है

बकाइन, पीपल, सेमल को देखो 

पुराने पत्तों के झरने के उपरांत 

कैसे सुनहले-हरे पल्लवों से 

लजाते हुए ख़ुद को ढक रहे हैं  

सुदूर अमराइयों में 

कोकिला की कूक है 

पकती फ़सल देख 

किसान को एमएसपी की हूक है

ख़ून-पसीने की कमाई 

कितनी अनिश्चित है 

किसान की समृद्धि 

किसी और के हाथ में सुरक्षित है 

आसमान में उमड़ते बादल 

दूर-दूर तक उठते धूल के ग़ुबार 

बेमौसमी बेचैनी के विस्तार 

नितांत ठूँठ को भी नहीं सुहाते 

विपरीतताओं से हम कब अघाते 

अन्न के दाने 

खेत से घर 

घर से बाज़ार-दर-बाज़ार 

लिए डोलता है कृषक 

इस सफ़र में 

घात लगाए बैठे लुटेरों से 

दिन-रात जूझता है कृषक 

पतझड़ के बाद 

फिर उगाएगा नए पौधे 

रोपेगा उम्मीद के नए पौधे

यह नियति-चक्र में 

शोषण-चक्रव्यूह की 

साँठगाँठ गहरी है

न राहत की सुबह 

न चैन की दुपहरी है। 

 © रवीन्द्र सिंह यादव 

 




सोमवार, 22 मार्च 2021

मत लिखो कि...

मत लिखो कि सरकार 

भ्रष्ट है 

मत लिखो कि 

निरीह जनता 

सरकारी नीतियों से त्रस्त है

मत लिखो कि 

धूर्त पाखंडी

उन्माद के बीज बो रहे हैं 

मत लिखो कि 

युवा षड्यंत्र के मोहरे हो रहे हैं

मत लिखो कि 

न्याय सहज सुलभ नहीं है 

मत लिखो कि

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब नहीं है 

मत लिखो कि 

व्यवस्था सड़-गल गई है 

मत लिखो कि 

सत्ता संवेदना को मसल गई है

मत लिखो कि 

ऑक्सीजन के अभाव में बच्चे मर रहे हैं 

मत लिखो कि 

दंगाई संरक्षण में हरी घास चर रहे हैं 

मत लिखो कि 

क़ानून का पालन मनमाना हो रहा है  

मत लिखो कि 

भूख से व्याकुल इलाक़ा रो रहा है 

मत लिखो कि 

शोषण के सूत्र शातिर दिमाग़ों की पूँजी है 

मत लिखो कि 

शिक्षा में मनगढंत विषयों को लाने की क्यों सूझी है

मत लिखो कि 

117 दिन से किसान आंदोलनरत क्यों हैं?

मत लिखो कि 

सरकारी संपत्तियाँ ख़रीदनेवालों संग 

सरकारी उँगलियाँ मित्रवत क्यों हैं?

मत लिखो कि 

दलों को चंदा कैसे मिल रहा है?

मत लिखो कि 

आदमी का ईमान कैसे हिल रहा है?

मत लिखो कि 

गवाह डराए धमकाए ख़रीदे जा रहे हैं 

मत लिखो कि 

पेड़ क्यों काटे जा रहे हैं? 

लिखो कि 

समय का सच 

अचर्चित रहकर गुज़र जाने का हामी है 

स्वतंत्रता खोकर जीवन जीना तो बस नाकामी है!  

© रवीन्द्र सिंह यादव  

   

रविवार, 21 मार्च 2021

आम की गुठली का मासूम प्रश्न


1. 

पथिक ने एक गुठली ठुकराई,

लू के मौसम में बहती पुरवाई। 

   

गुठली उछली खेत की मेंड़ पर आई,

ठोकर खाकर आपे से बाहर आई,

रे पथिक! 

जड़ नहीं चेतन हूँ- कहकर चिल्लाई,

सृजन का बीज हूँ 

मुझमें सोई समर्थ अमराई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई। 

2. 

सुनो, ख़ुदग़रज़ आदमी!

क्या भरी है मुझमें ख़ामी?

फेंकी जाती हूँ 

अक्सर घोर उपेक्षा से,

ढूँढ़ा करता है 

कोई मीत मुझे सदेच्छा से,

कभी जा गिरी पथरीली सतह पर,

दब जाती हूँ प्लास्टिक की तह पर,

मिलें अनुकूल मौसम में 

हवा मिट्टी पानी धूप,

अंकुरित हो निखरे 

किसलय संग मेरा नन्हा रूप,

परवश हूँ 

न जानूँ मानव-सी चतुराई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई।

 3. 

कहा पथिक ने 

आत्मग्लानिवश होकर,

क्षमा करो! 

अनजाने में मारी है ठोकर,

सृष्टि की महिमा में 

उसका उर द्रवित हुआ,

अंतरमन को 

गुठली की गहन वेदना ने छुआ,

कहो! कहानी 

शेष रही जो ए गुठली!

मेरे भीतर अब तो  

उत्कट उत्कंठा अकुलाई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई। 

4. 

सुनो! बाग़ में खड़ा है 

एक बूढ़ा मीठा आम, 

मेरा जनक होने पर 

है उसको अभिमान,            

अमराई में गीत सुने हैं 

कोमल कोकिला के, 

छाया में बैठे देखे 

पीर से पीड़ित पथिक महान,

बसंत में मंजरियों पर छाया यौवन, 

अमियाँ झुलाने बहती पुरवाई पवन,

खेल-खेल में बढ़ते-बढ़ते,

तेज़ घाम में बढ़ते-बढ़ते, 

कच्ची अमियाँ रसीला आम हो गई, 

मैं भी अंदर ही अंदर कठोर हो गई,

आम-कैरी मंडी हाट-बाज़ार पहुँचकर 

पेटों में पच गए,

कदाचित दो आम 

आदमी की लालची दृष्टि से 

वृक्ष पर बच गए,

एक दिन आए 

कुछ बच्चे नादान बाग़ में,

झुलस रहे थे 

जून की झुलसाती आग में,

मेरे साथी पर पड़ी थी 

उत्सुक दृष्टि उनकी,

कदाचित थी 

आम तोड़ने की योजना उनकी,

पत्थर-डंडे फेंक-फेंककर 

साथी उनके हाथ लगा,

मेरा मन विचलित होने से 

अब रुक न सका,

टुकड़े-टुकड़े मीठा आम खाया,

कोई ख़याल उनके मन आया,

गुठली को तोड़ा पत्थर से,

अंदर थी मिगी बड़ी सलोनी-सी,

थी सूरत अब उसकी रोनी-सी, 

एक बच्चे ने दबाई मिगी 

तर्जनी और अँगूठे से, 

सब मिलकर बोले- 

उछाल! उछाल!!

तेरी शादी आएगी उसी दिशा से,

उछलकर जाएगी गुठली 

जिस दिशा में फिसलकर बंधन से, 

जाते-जाते 

वे मिगी के टुकड़े-टुकड़े कर गए,

कुछ राह में फेंके उन्होंने 

कुछ चटपट चट कर गए,

खेल-खेल में वे नादान 

एक वृक्ष की संभावना ख़त्म कर गए,

कहते-कहते आत्मकथा 

रुआसी आवाज़ हुई भर्राई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई।  

5. 

पथिक बोला-

तुम्हारे साथ क्या घटित हुआ?

तब गुठली की बातों से 

रहस्य उद्घाटित हुआ। 

होता क्या रे! 

मैं भी एक दिन 

एक चरवाहे की नज़र चढ़ गई,

बहुत दिनों छिपी रही पत्तों में 

उस दिन उघड़ गई,

गिरा न पाए थे 

आँधी तोते और गिलहरियाँ,

मेरा पालक 

रोज़-रोज़ लेता रहा बलैयाँ, 

आम हुआ था 

पककर पूरा पीला रसीला,

चरवाहा ही जाने 

ज़बान के चटख़ारे की लीला,

नियति-चक्र की समझो 

जानी-अनजानी भरपाई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई।

6. 

हे गुठली! मैं शर्मिंदा हूँ! 

सृष्टि की गोद में ज़िंदा हूँ!

ऐसी क्रूर अशिष्टता 

अब न होगी मुझसे,

क्या तुम 

दोस्ती कर सकोगी मुझसे?

सुनकर प्रश्न पथिक का 

गुठली ने ली अंगड़ाई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई।

7. 

सुनो पथिक! शेष अभी है कहानी,

मेरे जनक की कथा तुम्हें है सुनानी। 

कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती है,

मैं जिसकी संतान हूँ 

उसकी कथा 

मुझमें स्वाभिमान का बीज बोती है,

वह तब गुठली होने पर 

इतराई, इठलाई थी, 

जब अमीर घर से 

मीठे आम की गुठली 

ग़रीब किसान के हाथ आई थी,

गमले में हुआ सहज अंकुरण 

बाग़ में हुई कुशल हाथों से रोपाई थी,

पशुओं से बचा-बचाकर बड़ा किया 

पेड़ बनने तक खाद-पानी दिया

क्या ऐसा आदमी क़ुदरत ने 

अब पैदा करना बंद कर दिया...?

गुठली का गंभीर मासूम प्रश्न सुन 

पथिक तो हुआ निरुत्तर, 

सोचा, बनना होगा जग में 

इंसान को और भी बेहतर!

गुठली की बात सुनो रे! 

नहीं तो इत कुआँ उत खाई!

पथिक ने एक गुठली ठुकराई।

© रवीन्द्र सिंह यादव     







शुक्रवार, 19 मार्च 2021

विकास और भारत


याद करो 

पिछले पचास वर्ष 

हम 

इतने स्वकेन्द्रित तो नहीं थे

मानसिकता के धरातल पर 

जहाँ आज हैं 

तब इतने तो नहीं थे  

दुनिया 

विकास करती रही

परमाणु बम बनाने की 

अंधी दौड़ चलती रही 

भौतिकता के विस्तार में

संवेदनाविहीन हुई

व्यक्ति की पाशविक कुंठा 

उत्तरोत्तर विकसित हुई 

भूख की चिंता 

अब व्यर्थ का चिंतन है

हथियारों की होड़ में 

लुट रहा धन है   

भारत ने 

वर्ण-व्यवस्था का 

निरर्थक विकास किया 

और वर्गों में बँटी 

दुनिया में 

कुछ आगे हुआ 

तो कहीं 

बहुत पीछे रह गया 

व्यवस्था बदलने आए 

'तीस मार ख़ान' 

'बंदर के हाथ लगी मशाल'

कहावत चरितार्थ करते रहे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

बुधवार, 3 मार्च 2021

फिर जंगली हुआ जाय?

जंगली जीवन से उकताकर 

समाज का सृजन किया 

समाज में स्वेच्छाचारी स्वभाव के 

नियंत्रण का विचार और इच्छाशक्ति 

सामाजिक नियमावली लाई 

नैतिकता की समझ भी आई 

सामाजिक मूल्यों की सुधि आई 

ज्ञान,न्याय,समता,विकास,स्वतंत्रता 

और दंड पर बहस हुई

क़ानून का प्रावधान स्वीकार हुआ 

राजा बादशाह से होते हुए 

जनसेवक का विचार लोकतंत्र लाया 

लोगों ने सोचा अब उन्हें जीना आया 

लोकतंत्र में कब तानाशाही आ गई 

आज़ादी / अभिव्यक्ति जब नियंत्रित हुई

तब होश आया 

लालच और भय की दुदुंभी की गूँज में 

चतुर-चालाक वर्ग को 

सत्ता और पूँजी के साथ खड़ा पाया

तो क्या आज़ादी के लिए 

फिर जंगली हुआ जाय?

या संयमी और समझौतावादी हुआ जाय...? 

© रवीन्द्र सिंह यादव    

 

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

पीली चिड़िया

वह आकाश से उतरी  

नीम की फुनगी पर 

हौले से आ बैठी

थोड़ी देर सुस्ताकर   

मुंडेर पर आ बैठी

नन्ही पीली चिड़िया

बसंती धूप की छमछम ने   

बच्चों से कहा देखो 

आई अजनबी चिड़िया 

बच्चे उत्साहित हो 

लगे वीडियो बनाने 

चिड़िया लगी 

प्यारे स्वर में चहचहाने

फुदक-फुदककर 

लगी मुंडेर पर 

मोहिनी नाच दिखाने 

तभी आसमान में 

बाज उड़ता दिया दिखाई

देखकर मासूम बच्चों को 

आ गई सजल रुलाई

पीली चिड़िया ने 

दिखलाई अपनी चतुराई 

छितराई थी छप्पर पर 

लौकी की अनमनी बेल  

शंकु-से मुड़े 

सूखे पीले पत्ते ने 

शिकारी का बिगाड़ा खेल

चुपके से पीली चिड़िया 

शंकु में आ समाई   

डरी सहमी नन्ही जान ने 

चैन की साँस पाई

देखकर यह नज़ारा 

ताली बच्चों ने ख़ूब बजाई।  

© रवीन्द्र सिंह यादव    

 

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

बालू पर लिखा था एक नाम

सिंधु तट पर 

एक सिंदूरी शाम 

गुज़र रही थी

थी बड़ी सुहावनी  

लगता था 

भानु डूब जाएगा 

अकूत जलराशि में 

चलते-चलते 

बालू पर पसरने का 

मन हुआ 

भुरभुरी बालू पर 

दाहिने हाथ की 

तर्जनी से 

एक नाम लिखा 

सिंधु की दहाडतीं 

प्रचंड लहरें 

अपनी ओर आते देख 

तत्परता से लौट आया 

अगली भोर फिर गया 

सुखद अचरज से देखा 

एक घोंघा 

वही नाम 

बालू पर लिख रहा था... 

© रवीन्द्र सिंह यादव


मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

तुम्हें पत्थर होने में कितने वर्ष लगे?


पृथ्वी की उथल-पुथल 

उलट-पलट

कंपन-अँगड़ाई  

परिवर्तन की चेष्टा 

कुछ बिखेरा 

कुछ समेटा

भूकंप 

ज्वालामुखी 

बाढ़ 

वज्रपात 

सब झेलती है 

सहनशीलता से 

धधकती धरती

जीवन मूल्यों की 

फफकती फ़सल 

देख रहा है 

आकाश मरती  

पत्थर का कोयला  

बनने में 

पेड़ों को 

करोड़ों वर्ष लगे

ओस को देखो

गेंहूँ की हरी पत्तियों पर  

सुबह-सुबह सत्य-सी 

धूप बढ़ते-बढ़ते 

चेतना अदृश्य-सी  

मानव रे!

तुम्हारा 

कोई हिसाब है...

जीते जी 

तुम्हें 

पत्थर होने में 

कितने वर्ष लगे? 

©रवीन्द्र सिंह यादव  




गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

जेलों में जिस्म तो क़ैद रहे...

जेलों में 

जिस्म तो क़ैद रहे 

मगर जज़्बात 

आज़ाद रहे

महामूर्खों के 

दिमाग़ की उपज 

बेवक़ूफ़ कीड़े-मकौड़े 

खाए जा रहे

काँटों के बीच 

मनोमालिन्य से परे 

आशावान अंतरात्मा के 

पलते मीठे बेर  

चीख़-चीख़कर

अपने पकने की 

मौसमी ख़बर  

सैटेलाइट को ही 

बार-बार बता रहे

भूख का सवाल 

बड़ा पेचीदा है 

कंप्यूटर में घुसपैठ 

संगीन षडयंत्र के 

सबूत बता रहे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव




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